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Mahaprabhuji Ki Badhai
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Balihari aajki baanik parr. shwet kaachh kaachhe nandanandan evet | NityaPad-069 | बलिहारी आजकी बानिक पर। श्वेत काछ काछे नंदननंदन एवेत
टिपारो सोहत सीस पर ॥१॥ नख सीख लौं सिंगार कहा कहों जमुना पुलिन ठाड़े
हैं कदम तर।। सुघरराय' प्रभु बेनु बजावत मोहे सब ब्रज नारी नर ॥ २॥ | Saarang |
Thaadi liyein khilawat kaniyaan | pramudit munn gawat jasoda hari | Part1-162 | ठाड़ी लियें खिलावत कनियाँ | प्रमुदित मन गावत जसोदा हरि
लीला मोहनियाँ ॥१॥ काजर तिलक पीत तन झगुली क्वणित पाँइ पैंजनियाँ।
हैसुली हेम हमेल बिराजत झर लटकन मनि मनियाँ ॥२॥ हुलरावति हँसि कंठ
*ल्गावत प्रीति रीति अति धनियाँ । चुंबत मुख रघुनाथदास बलि बड़भागिन
नैंदरनियाँ ॥३॥ | Saarang |
Lalit tribhang laadilo lalana . vrindavan gahwar nikunjamen | Part1-111 | ललित त्रिभंग लाड़िलो ललना । वृंदावन गहवर निकुंजमें
. युवतिन भुज झूलतहै पलना ॥१॥ भामिनी सुरत राधा सुखसागर चितवन चारु
बिरह दुध्ख दलना । यमुना तट अशोक वीधिनमें कामिनी कं ध बाहुधर
चलना ॥२॥ नूपुर क्वणित चरण अंबुजपर मुखरिति किंकिणी शोभित चलना।
कृष्णदास प्रभु नखशिख मोहन गिरिधरलाल प्रेम रस खिलना ॥३॥ | Aasawari |
Bhor bhayo jaago nandanand .. sanga sakhaa thaadhe jug bund ..1.. | NityaPad-022 | भोर भयो जागो नंदनन्द ॥ संग सखा ठाढे जग बंद ॥१॥
सुरभिन पय हित वत्स पिवाये ॥ पंछी यूथ दसों दिश धाये ॥॥२॥
मुनि सरतके तमचर स्वर हारये | सिथिल धनुष रति पति गहि डार्ये ॥ ३॥
निशही घटी रविरथ रूचि राजे ॥ चंद मलीन चकई रति साजे ॥।४॥
कुमुदिनी सकुची वारिज झूले ॥ गुंजत फिरत अलिगण झूले ॥५॥
दरशन देहो मुदित नर नारी | सूरदासप्रभु देव मुरारी ॥६॥। | Bibhaas |
Bolat madangopal vinodi chalari nagri chhandadegju .. | NityaPad-123 | बोलत मदनगोपाल विनोदी चलरी नागरी छांडदेगजू ॥
मेरे जानगिरिधरन मिलनकों फूलेफूले तेरे अंगजू ।|१॥
तब उर पर युगल नारंगफलरंग छबीले स्यामरंगजू।।
कृष्णदासप्रभू गिरिधर नवरंग भू चपलमन्मथ
मानभंगजू।।२॥ | Bihagaro |
Bhaj sakhee bhaav bhaavik deva .. | NityaPad-365 | भज सखी भाव भाविक देव ॥
कोटि साधनकरो कोऊ तोऊ न माने सेव ॥१।॥
धूमकेतु कुमारमाँग्यो कौन मारगनीति॥
पुरुषते त्रियभाव उपज्यो सबै उलटी रीति ॥ २॥
बसन भूषण पलट पहरे भावसों संजोय ।।
उलटमुद्रा दईअंकन वरणसूधे होय ॥३।॥।
वेदविधिको नेमनाह ीं प्रीतिकी पहिचान ॥
ब्रजवधू वशकिये मोहन सूर चतुर सुजान॥४॥ | Bihaag |
Jaagi kahyau januni saun mohan ..| aaju kahaa | Part3-020 | जागि कह्यौ जनुनी सौं मोहन ॥| आजु कहा
मोहे बेनि जगायों सों कारण सब कहिए सोहन ॥ तब जसुमति कटद्मों आजु
पूरन दिन पून्यों सुख की रासी ॥ डांडो रोपन नंद जाईंगे सँग लीए ब्रज वासी ॥२॥ ऊत वृषभानु इतेई तैं नंदराई होड परेमी भारी ॥ इत प्यारो
उत प्यारी कों दल को जीते को हारी ॥३॥ ताते बिच मोहन बलदाऊ
सौं कही लीजे ॥ और गोप लेऊ रखबारी गोपी सब बस कीजे ॥४॥ यह
सुनि रबंकि उठे गिरिवरधर तव मैया पय पान पिवाबै ॥| देखो आज खेलि
होरी कों माखन मोहि खवाबे ॥॥५॥ तब जसुमती गुपाल लाल को ऊबट
नहवायो प्रीत ॥ करि सिंगार परम रूचिकारी ब्रजवासीन के मीत ॥६॥
यह सब बात जानि ब्रज वनिता चली सींगमारि सिंगारी ॥ मन हरखित
सोभित सुंदरि कोटी काम बलिहारी ॥७॥ सब मिलि इक ठौर न्हैं आई
जसुमति ग्रह के द्वार ॥ भीतर जाई लाल मुख निरखति हरखें लोचन चार
॥८॥ सेन समै सब भेद कह्मौ तब मुसिकाई मोहन मन हर लियो ॥ 'रसिक'
प्रीतम जानति अंतर गति मन भायों सब कियों ॥९%॥ | Bibhaas |
Aaj thaade laal mukut dharey . badan lasat makrakrit kundal | NityaPad-174 | आज ठाडे लाल मुकुट धरे । बदन लसत मकराकृत कुंडल
रतिपति मन जु हरे ॥ १॥॥ अरुन अधर ओर चिबुक चारु बन्यो दुलरी मोहनमाल
गरे। अति सुगंध अंग चन्दन खोर किये पोहोंची मोतीनकी लरे ।॥२॥ कर मुरली
कटि लाल काछनी कीकनी नूपुर शब्द करे। गुन भरे कृष्णदास प्रभु राधा निरखि
नेन उत न टरे ॥३॥ | Saarang |
Naachat laadili laalan raas mein suno hoe saheli rung raho .. | Pustak1-352 | नाचत लाड़िली लालन रास में सुनो हो सहेली रंग रहो ॥
ताही स मय रसरास सहायक सुखद मलयसौ पवन बह्यौ ॥१॥
उड्डपति किरण सुरंजित कानन नवकुसुमाबलि तिमिर दह्मौ ॥
युवती मंडल मध्य श्याम घन राग वारि निधि वेणु गह्मौ ॥२॥
बोलत तोहि सुरत मिलबनकौं उठ चल मान किन मेरौ कह्नौ ॥
कृष्णदास प्रभु गिरिधर नागर तेरौ बिलंब नहीं जात सहौ ॥३।॥। | Kedaro |
Ladile bolat haye tohi maiya .. | NityaPad-298 | लाडिले बोलत है तोहि मैया ॥
संझासमें गोधन संग आवत चुंबत लेकर गोद बैठेया ॥ १॥
मधुमेवा पकवान मिठाई दूधभात अरु दार बनाई।॥।
परमानंद प्रभु करत बियारू यशुमति देख बहुत सुखपाई।।२।॥। | Iman |
Madanmohan piya bhayonbhor... prathidish nahin arun dekhiyat | NityaPad-145 | मदनमोहन पिय भयोनभोर॥। प्राथीदिश नहिं अरुण देखियत
और सुनियत नहीं बन खगरोर ॥।१।| गृहीतकंठ परस्पर दंपति पिय
विषलेशकातरअतिजोर ॥ गोविंदप्रभु पिय रसिक शिरोमणि प्यारी के वचन
लीनो चित चोर ॥२॥। | Bibhaas |
Lahenga harryau chhabi deti . | Part3-005 | लहेंगा हर्यौ छबि देति ।
चुरी हरी तेरे बांह बिराजति सोहत बंगरी सेत ॥१॥
हरी अंगीयां उर राज रही हैं तातें भयो श्याम सँग हेत
“चतुरभुज' प्रभु तें मन हर्यौ प्यारी तातें बट संकेत ॥२॥ | Malkoos |
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