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Mahaprabhuji Ki Badhai
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Giridhar jaba apano curry jaane .. | NityaPad-369 | गिरिधर जब अपनो करि जाने ॥
ताको मन भक्तनकी सेवा भक्त चरन रज सदा लुभाने ॥ गिरिधर.॥
भक्तन में मति भकक्तनसु गति हरिजन हरि एक करि माने ॥
कृष्णदास मन वचन कर्म करि हरिजन सगे हरि उर आने ॥गि.।। | Kanharo |
Aaj kii vaanik kahee naan jaay .. | NityaPad-060 | आज की वानिक कही न जाय ।।
रही धस पाग लाल आधेसिर कुल्हे चंपक तापर हीरा लटकाय ।। १।॥।
वरुनी पीत पहरे छूटे बंद अरगजा मोजें तन बिंबित स्थाम झांई ।।
दरशनीय वनमाल तिलक देखिये बिथके कोटि मदन और गोबिंद बलबल बलजाई ।। २॥ | Kanharoo |
Tumare laal roop parr vaari | mrigamad tilak kanth kathula vali | Part1-163 | तुमारे लाल रूप पर वारी | मृगमद तिलक कंठ कठुला वलि
मुख मुसिकान पियारी ॥१॥ घूँघरवारे बार श्यामके लर लटकत गजमोती ।
देखि स्वरूप नैंदर्नैंदनकौ प्रान बारति सब जोती ॥२॥ कर पोर्होंची हँंसुली प्यारे
मोहन पीत झगुलिया सोहै । परमानंददासकौ ठाकुर देखि ब्रह्म हर मोहै ॥३॥
| Saarang |
Dekho adbhut avagati kii gati caso roop dharyau haye hoe . | Part1-026 | देखो अदभुत अवगति की गति कैसो रूप धरयौ है हो ।
तीन लोक जाके उदर बसत हैं सो सूपके कोने पस्यौ है ॥१॥ नारदादि ब्रह्मादिक
जाकों सकल विश्व सर सांधें ताकौ नार छेदत ब्रज जुबती बॉटि तगासों बांथे॥२॥
जा मुखकों सनकादिक लोचत सकल चातुरी ठाने | सोई मुख निरखत महरि जसोदा
दूध लार लपटाने ॥३॥ जिन श्रवनन सुनी गजकी आपदा गरुडासन विसराये।
तिन श्रवननके निकट जसोदा गाये और हुलराये ॥४॥ जिन भुजान प्रहलाद
उबार्थौ हरनाकुस उर फारे । तेई भुज पकरें कहत व्रजगोपी नाचौ नैक
पियारे ॥५॥ अखिल लोक जाकी आस करत हैं सो माखन देखि अरे हैं ।
सोई अद्भुत गिरिवरहूँ ते भारे पलना मांझपरे ह ैं ॥६॥ सुरनर मुनि जाकौ ध्यान
धरत हैं शंभु समाधिन टारी । सोई प्रभु सूरदासको ठाकुर गोकुल
गोपबिहारी ॥७॥ | Asawari |
Phooli phuli firat yashoda maiya . phoole nand jhulaavat lalana | Part1-109 | फूली फुली फिरत यशोदा मैया । फूले नंद झुलावत ललना
मनही मन हुलसैया ॥१॥ सुनत गोपिका यह आनंद चली बेग उठि थैया ।
नंदराय आँगन मधि आई गावत है जु बबैया ॥२॥ फूलनकौ अति बन्यौ
पालनौ झुलावत जसोमति मैया ॥ कृष्णदास यह छबि निरखतही परम हुलास
भयी मन मैया ॥३॥ | Aasawari |
Aaj hari khelan fagbani .. itgori rory | Part3-249 | आज हरि खेलन फागबनी ॥ इतगोरी रोरी
भरभोरी उत्गोकुल कोधनी ।॥|१॥ चोवा कोढो वाकर राख्यो केसर कीच
घनी ॥| अबीर गुलाल उडावत गावत सारी जातसनी ॥२॥ हाथन बनी कनक
पिकाई ग्वालन छूटतनी ॥ नंददास प्रभु संग होरी खेलत मुर्मुर जात
अनी ॥३॥
| Sarang |
Aichal jaaen jahaan hari khelat gopin sangaa . aanak | Part3-284 | एचल जांए जहां हरि खेलत गोपिन संगा । आनक
बहुबाजे ताल मुरज मुख चंगा ॥ गावत सुन भावत मंद मधुर स्वरबानी ॥
जानों हरख परस्पर मानो मदन गति ठानी ॥ एचल जाय जहाँ क्रीडत नंदनंदन
झांझ प्रणव डफ भारी ॥ बीन मृदंग उपंग चंगबहु देत परस्पर गारी ॥१॥
करपिचक विकचमुख कटिपट भेष बनायो ॥ जानों गुदरंदेनगुण बनबसंत
ब्रज आयो ।| हाटक मणि गण खचित विविध कर जेरी साजें ॥ रुंजमुरज
सहनाई ढोल ढोलक छबि छाजें ॥ आवज अति आतुरबजे गाबत ब्रज
जनफाग ॥ तान तरंणन बाहुज बांध्यो छाय रह्मो अनुराग ॥२॥ ध्वनि सुनत
पियारी कुंकुम मंजन कीनों ॥ बहुरंग वसन तन यावक चरणनदीनों ॥
कबरीकर जुसंबार निरख उपमा को हारी | मानो हाट कलतारही खगपन्नण
नारी ॥ श्रवण तार उरहार छबि उर मुक्ता सजल सुढार ॥ जनुयुग गिरिविच
देखिये छबि धसी सुरसरी धार ॥ ३॥। रचतिलक भालपर मृगदरेख संवारी ॥
जानों युगल जीभधर पन्नग पीवत सुधारी ॥ खंजन मीन आधीन देख दृग
सारंग लाजे ॥ वदन चंदभुवचांप स्वांति सुतनासाराजें उपमा कों अवलोक
कें छबि या समान नह्टि ओर ॥ मानों कीर उड़॒गण गहें चुगत नहीं सुनबोर
॥४॥ अति अरुण अधर छबि अर दशन न द्युति पाई ॥ जनु विज्वल वीजकी
विद्रुमवार बनाई ॥ कंठ कपोत्तत जात करण अंगद जग मगयो ॥ मानों
जरद मृणाल शरद शशि बालक लजयो ॥ पोंहोंचन अति पोंहोंची सघन
सुंदर श्याम सुपास ॥ मानो कंजके कंठलागकें भृंगरहे मधुआस ।।९॥ बनचली
सकलत्रिय पणनूपुर स्वर भारी ॥ जानों विविध केलिकल हंस करत
किलकारी ॥ साख जवाद सुगंध कुंकुमा केसर घोरी || भार लजनभेचली
सकल त्रिय गावत होरी ॥ नखशिखते अवलोक छंबि नागर रीझे गान ॥
मानो संगीत शाला पढी घट बढ परतन तान ॥६॥ छबि सिंघुललन तन
देखत लोचन भूले ॥ चितवत चित चोरत अंगअंग अनुकूले ॥ वरण वरण
सिरपाग श्रवण कुंडल मणिमय अति ॥ मनहूं श्याम नग शिखर तरणि युग
रमत तरल गति ॥ उरबन माल विशाल अति विविध सुमन बह्वेष || मानो
जलदव में प्रगट देख्ियत शतमख सारंगरेख ॥॥७॥ रचतिलकमलयका पियकर
खोंरबनाई ॥ मानो युगल अहिन शशि घन परदई दिखाई ॥ घनतन देख
लजात कंजदृग क्यों समपाबें ॥ मुख छबि स्याम सुजान देख अहिवपु हिल
जावें ॥ नख सिखतें अवलोक कें छबि कटिपट पीत सुदेश || मानो जलद
धुर्वा सखीरी दामिनि रही प्रवेश ॥८॥ छबि सिंधु मोहन तन लघु मति वरणी
न जाई ॥ चितवत चित चोरत मन्मथ रह्यो लजाई ॥ त्रियन परस्पर हरख
विविध कर डांगन राजें ॥ गोप उठे किलकार दुद्ूं दिशते बाजत बाजें ॥
एकन करकुंकुमलियो एकन घोर गुलाल ॥ चली सकल ब्रज सुंदरी पकरन
मदन गोपाल ॥९॥ सेनन स्यामाजू हलधर दिये हें बताय || गहिनील वसन
तनदोऊ बंद दिये छटकाय ।। सब मिल पकरे स्याम मुरलि का लई छिनाई ॥
तबहि तरूणी मुसिकाय साखभर भाजन लाई ॥ छांटत छिरकत हसत परस्पर
प्रेम छके नंदनंद ॥ मानो अबनि पर मेघकों घेर रहे बहुचंद ॥|१०॥ निरखत
विथकित भये जहां तहां अमर विमान ॥ बरखत सुर कुसुमन ओर बजाये
निसान ॥ रह्यो परस्पर रंग सकल त्रिय भवन न आईं ॥ तबहिं तिनें ब्रजराज
विविध पटदई मिठाई ।| बहुरि तरणि तनया सलिल मंजन कर बलबीर ॥
पहर वसन आये घरें संग सकल आभीर ॥|११॥ दुतिया मोहन तन राजत
सुंदर पीत सुवास ॥ बैठे कनक सिंघासन बल बल राघोदास ॥११२५॥ | Gouri |
Badhaai deeje hoe vrishbhan deeje deeje deeje . jachakjanaki bidaa | Part1-208 | बधाई दीजे हो वृषभान दीजे दीजे दीजे । जाचकजनकी बिदा
भइ है एक ठाडो ढाढ़ी छीजे ॥१॥ कुंवरि जनम तिहारे सुनके हों उठि धायो
वेगि । कोटि कल्प लों को छल छूट्यो गयो आज उद्वेगी ॥२॥ वेरी विरह
बहुत दुख दीनो कीनो छात्ती छेग । ताते मदमात्यो न रहायो परे ते रीते तेग
॥३॥ यह अब शिव विरंचि नहीं जानत मानत अमर अधाई । चंद सुर नटवायां
नाचे पंचम दरकी माई ॥४॥ उपमा नाही करी करता कोऊ कहासों कहों
समताई । कौन पुण्य गिरिधर ताके वस तिहारे सुता कहाई ॥५॥ धेनु धान
. धन अवतरी दाता गोपनमें बडभागी । मासन बंध रच्यो मन हि मन अपनो सो
अनुरागी ॥६॥ दे न सकोगे ढरि कछु नाही बात बनाऊ ताग । रच्यो नहीं
कनक मुकता लेहु कछु मोहि लाग ॥७॥ हरखि कहत महर मुसक्यानि जो
चाहो सो लीजे । असीस दई धन्य चिरजीयो देकर प्रान पतीजे ॥८॥ दुलहनि
बुल्हे नंदघर ढोटा ब्याह बड़े कर लीजे | मंगल चोरी मंगल गावत दास “चत्रभुज'
जीजे. ॥९॥ | Maru |
Chandanhiki kunjabanai .. | NityaPad-236 | चन्दनहीकी कुंजबनाई ।।
चन्दन छिरके गादीतकीया चन्दन सेज विछाई ॥|१॥
चन्दनछिरके पाग पिछोरा चन्दन छिरकी सारी ॥
चन्दनहीको लेप कींये तन श्रीविद्धल गिरिधारी ॥२॥ | Saarang |
Dhanya dhanya ritu dhanya tere joban janam karam guna lachchan .. | NityaPad-052 | धन्य धन्य ऋतु धन्य तेरे जोबन जनम करम गुन लच्छन ॥
प्रेमरूप रसराज दुलारी उठ चल तुही विचिच्छन ॥१॥ पठई तोहि लेन साँवरे मान
छांड हठ रच्छन ॥ तें बस कर लियो धोंधीको प्रभु साज भूखन पट दच्छन ।। २॥
| Lalit |
Dekho vraj kii veethini bithini hoe hoe karati khelati jwal baal .. | Part3-140 | देखो ब्रज की वीथिनि बिथिनि हो हो करति खेलति ज्वाल बाल ॥
साजि रबाब बीन बाजे अधवट उपंग चंग बिच बिच मुरली
धुनि मृदंग ताल ॥१॥ जोई जोई निकसत तिन कौं पकरि लेति, छतियाँ
लगावति करति ख्याल ॥ यह विधि होरी खेले रँग भरे रस सिंधु झेले
बलि बलि जाई तहाँ 'लघु गुपाल' ॥२॥
ताल मृदंग उपंग ॥ झांझझालरी किन्नरी || आबजकर मुखचंग ।। ३॥|
उतहि समाज गोपालके ।। बलियुत नंदकुमार ॥ इतगोपी नवजोबना | अंबुज लोचन
चारु ॥४॥ गारीदेत सुहावनी प्रमुदित गोप कदंब ॥ युवति यूथ एकन्न भये ॥
गावत मदन विटंब ॥५॥| रतनजटित पिचकाईयां ॥ कर लीये गोकुलनाथ ॥
तकि छिरकें बनिताबुंदकों ।। जे राधाके साथ ॥|६॥ केसू कुसम निचोयकें ॥
भरत परस्पर आनि ॥ मृगमद चोवा कुंकुमा ॥ चारुचतुर सबसानि ॥७॥
सुरंग गुलाल उडावहीं ॥ बूका बंदनधूलि || चंढिं विमान सुरदेखहीं ॥ देह
दिसा गई भूलि ॥८॥ खेल मच्यो अति गहगद्यो ॥ चितवत ब्रज बधूधाय ॥
राधा रसिक गुपालकी ॥ आसकरन बलिजाय ॥९११ | Todi |
Dhauryon satuba rotty sanga arogat vrajrajkumar . madhur misht sunder | NityaPad-216 | धौर्यों सतुबा रोटी संग अरोगत ब्रजराजकुमार । मधुर मिष्ट सुंदर
अति ग़ाढो लाई परम चतुर ब्रजनार ॥१॥ सखी सहचरी ले कर अपने ढोरत विजन
बदन निहार । कृष्णदास' प्रभु कुंज भवनमें जेबत उपजी रुचि अपार ॥२॥
| Saarang |
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