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Mahaprabhuji Ki Badhai
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
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Prabhu mein sub patitan koo tiko. | NityaPad-371 | प्रभु में सब पतितन को टीको।
और पतित सब द्ोस चार के में तो जन्मन हीं को |
बधिक अजामिल गणिका तारी ओरे पूतनाही को ।
मोहि-छांडी तुम ओर उद्धारे मिटे शूल केसे जीको ॥
कोउ नसमर्थ शुद्ध करन को खेंचि कहत हों लीको।
मरीयत लाज सूर पतितन में कहत सबे मोहि नीको ॥ | Bihaag |
Shree vrishbhan prabhaavati jaaee haye. nirakh nripati vrishbhan sue deit | Part1-201 | श्री वृषभान प्रभावती जाई है। निरख नृपति वृषभान सु देत
बधाई है ॥॥१॥ खटदस साज सिंगार चली व्रजनागरी । पहोंची भानभवन मथी
रूप ऊप ऊजागरी ॥२॥ कुंवरी निरखि मन हरखि सबै तन फूल ही । नाचत
कर उत्साह गई उर सुल ही ॥३॥ घर घर त्तोरममाल बधाई सजाई । हेम
कलस नग जटित धुजा फहराई ॥४॥ बंदी मागध सुत सबै सुन धाये । वंस
प्रसंस असीस देत मन भाये ॥५॥ श्री वृषभानराय मन हरखाय के । देत बहु
दान सबै सनमानके ॥६॥ देव विमान आय कुसुम वरखावही । “जगन्नाथ!
मन मुदित विमल जस गावही ॥७॥ | Kafi |
Aaj merrie boondaavan dadhi looty .. kahaan merrie haar kahaan nakbesar | Part1-250 | आज मेरी बूंदावन दधि लूटी ॥ कहाँ मेरी हार कहाँ नकबेसर
कहाँ मोतियन लर टूटी ॥१॥ बरज यशोदा अपने मोहनकों झकझोरत मटुकी
फूटी ॥ सूरदासप्रभुके जु मिलनकों सर्वसु दे ग्वालिन छूटी ॥२॥ | Nat |
Mangalmangalam akhilbhuvi mangal mangalmay shree lakshmanand . | Part2-300 | मंगलमंगलं अखिलभुवि मंगल मंगलमय श्री लक्ष्मणनंद ।
मंगलरूप महालक्ष्मीपति जलनिधि पूर्णचंद॥१॥
मंगल मयकृत सात्मज गोपीनाथ मड्डलरूप रूक्मिणीश मड़ल पद्मावतीशं मड़ल
जनित तनुज श्रीगिरिधर गोबिंद बालकृष्ण गोकुलपति रघुनाथ जगदीशं ॥२ ॥
मड्ुलवर्धक श्रीयदुपति घनश्याम पितुः समान श्रीविद्ठल शुभाभिधानं।
मंगलमयकृत महाप्रियवल्लभ सेवनमत मंगलकृत देवीसंतानं ॥३॥
मड़ल मड्ुल गोवर्धनधर मंगलमय रसलीलासागर रससंपूरित भावं।
वंदेहं त॑ सततं मनन््मथ 'परमानन्द' मदनमय त्रजपति मुखगतमुरलीराबं ४ ॥ | Sarang |
Chhaando laal atapati baat || kaunein abdio kaunein abb manio | Part1-245 | छाँडो लाल अटपटी बात || कौनें अबदियो कौनें अब मानीयो
काहेकों रोकत मारग जात ॥१॥ वे न होंय हम झगरन हारी जिनकों कुँवर
करत नितघात ॥ बारबार तुम दान माँगत हौ काहू गली गलिन बिकात ॥२॥
कैसोहो दान कहा मायाकौ कौन ठौर वह दान लगात ॥ लगत जिन गॉठि कस
दीनी श्रीविद्रनगिरिधर मुसिक्यात ॥३॥ | Saarang |
Aho merrie laadili kunwari kanchan paalane jhoole . moodu musikani | Part1-205 | अहो मेरी लाड़िली कुंवरि कंचन पालने झूले । मूदु मुसिकानि
निरखि नैन सुख कीरतिजू मनहीं मन फूल ॥१॥ कबहुँक चटकोरी चटकावति
कुक बोलन बोले । सूरदास मदनमोहन पियकी आनंदकी रसखान | Bilawal |
Bhor bhayo jaago nandanand .. sanga sakhaa thaadhe jagwand ...1.. | NityaPad-015 | भोर भयो जागो नंदनन्द ॥ संग सखा ठाढे जगवंद ॥।१॥
सुरभिन पय हित वत्स पिवाये ॥ पंछी यूथ दसोंदिश धाये ॥२॥
मुनि सर तके तमचर स्वरहार्ये ॥ सिथिलधनुष रतिपतिगहि डार्ये ।। ३॥
निशिहीघटी रविरथ रुचिराजे || चंद मलीन चकई रतिसाजे ॥।४॥
कुमुदिनी सकुची वारिज फूले ॥। गुंजत फिरत अ लिगणझूले ॥५।॥
दरसनदेहो मुदितनरनारी॥ सूरदास प्रभुदेवमुरारी ।।६॥ | Bibhaas |
Badhaai vrishbhaanken pragati raadhe kumari | bhaadon sudi ashtami | Part1-181 | बधाई वृषभानकें प्रगटी राधे कुमारी | भादों सुदी अष्टमी
रसभरी आई बेगि बिचारी ॥१॥ गृहगृहते बनिता आईं सब भूषन अंग सिंगारी।
फूली ललितादिक गावत सब सौभय बदन निहारी ॥२॥ रावलि रैंगरे लिसों
भींजी भींजे सब नरनारी । भींजे नंद यशोदा दोऊ और सुत गिरिवरधारी ॥३॥
काहू सुधि न परे काहूकी घर वर रहे बिसारी | श्रीविहलगिरिधर को वैभव देखत
बल बलिहारी ॥४॥ | Dhanashri |
Aanju tein neeken curry jaani | NityaPad-332 | आंजु तें नीकें करि जानी
मैं देखी प्यारी अति हठु भारी ॥ मदनमोहन पिय हौं पठई और बहुत करी
मनुहारी ॥१॥। तुब हितसों कर ग्रधित कुसुम चोली बिच बिच जाड़ जुहीं चंपक
बकुल निवारी ॥ “गोविन्द प्रभु सुहाग बस कीने री उठि चलि बेगि मिलि
कुंजबिहारी ॥२॥ | Bihaag |
Jaya srivallabh charankamal shir naaiye.. | NityaPad-349 | जय श्रीवललभ चरणकमल शिर नाइये॥
परमानंद साकार शशि शरदमुख मधुरी बानी भक्तजनन संग गाइये | १॥
राजतमछांमध्य सत्त्वके संग हबै राखविश्वास प्रेमपंथको धाइये ॥
कहत ब्रजाधीश बृंदाविपिन दंपति ध्यानधर धर हिये दृगन सिराइये ॥२॥ | Bihaag |
Banate aavat gawat gori .. haath lakutia gayanpache dhota | NityaPad-107 | बनते आवत गावत गोरी ॥ हाथ लकुटिया गायनपाछे ढोटा
यशुमतिकोरी ॥१॥ मुरलीअधरधरें नंदनंदन मानों लगी ठगोरी || याहीते
कुलकानहरीहे ओढे पीतपिछोरी ॥२॥। ब्रजवधू अटन चढ देखत रूप निरख भई
बोरी ॥ नंददास जिन हरिम्ुख निरख्यो तिनको भाग्य बडोरी ॥। ३॥॥ | Gori |
Dekhari dekh rasik nandanandan .. | NityaPad-237 | देखरी देख रसिक नंदनंदन ॥
लटपटी पाग सुभग आधेसिर रहीढरक कछुवंदन ॥ १॥
मृगमद तिलक रुचिर बनमाला तनचरचित नवचन्दन।।
चितबनि चारु कमलदल लोच न युवती जन मन फंदन ॥२॥
कबहुंक सहज बजावत सारंग कल मूरली स्वरमंदन ।।
चतुर्भुजप्रभु सुखरास सकल अंग गिरिधर विरह निकंदन ॥३॥ | Saarang |
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