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Makar Sankranti Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Atee udaar mohan merey nirasitri nainn phule ree .. | NityaPad-245 | अति उदार मोहन मेरे निरसित्रि नैंन फुले री ॥
बिच बिच बरुहाचंद: फूलनको सेहरों बन्यों कमक कुंडल सो सोभादेत निगम नेत मुलेरी॥१॥
चंदन को लेपकीये गुलाब की बन मालही । ये: पीतांबर कट बाधें अंगन पट दकुलें ॥
छीत-स्वामी गिरिवर धर गायम को नाम धोरी टेरत सब ठाड़ी भई तरु कदंम मुलें ॥२॥ | Saarang |
Sudin sumangal jaani jasoda laal koun pahiraavati bagau .. | Part1-317 | सुदिन सुमंगल जानि जसोदा लाल कों पहिरावति बागौ ॥
अँग-अँग भूषन ललित मनोहर लटकि जवारें पागौ ॥ व्रज-सुंदरी निरखि मन
हरषतिं सगन होत मन फूलत । रूप-रासि रस-रसिक लाडिलौ देखियतु नव तन
भूलत ॥ मैया देखति लेति बलैया मुख चूँवति सचु पावति । 'परमानंददास'
मन हरषत सुमिरि-सुमिरि गुन गावति ॥ | Saarang |
Silaa pakhaaro bhojan keeje .. | NityaPad-203 | सिला पखारो भोजन कीजे ॥
नीके व्यंजन बने कौनके चारत्र धाख सबहिनकों दीजे॥१॥
अहो अहो सुबल अहो श्री श्रीदामार्जुन भोज विशाल ॥
अपने अपनेओदन लाओ आज्ञा दईहै गोपाल ॥२॥
फल अंगुरिन अंजलिनबिच राखे वांटवांट सबहिन को देत।।
परमानंदस्वामी रसरीझे प्रेमपुंज कों बांध्योसेत ॥३॥ | Saarang |
Vividh basant banaaen chalon sub daikhan kunwar kanhai .. mirighatiyan dramalata sugandh alie thaade saji sukhdai .. 1.. | Part3-070 | विविध बसंत बनाएँ चलों सब दैखन कुँवर कन्हाई ॥ मिरिघटियां द्रमलता सुगंध अलि ठाडे सजि सुखदाई ॥ १॥
बागों केसरी चोवा सोहै सुरंग गुलाल उडाई ॥
ब्रजबालक गावति कोलाहल धुनि “ब्रजाधीस' मनभाई ॥२॥
| Basant |
Shrilakshman bhupkumar prakate srivallabh | Part2-317 | श्रीलक्ष्मण भूपकुमार प्रकटे श्रीवललभ
पूरणकाम॥ परमकृपाल कृपाकर जनपर भक्तनके अभिराम॥१॥
प्रेमभ क्ति दिखाय निजजनकों ओर दीने परम सुखधाम ॥ जन मथुरा कहे
कहांलो वरनों जगत कृतारथ तुम्हारो नाम ॥२ | Kanharo |
Aaj mohi aagam agam janaayo .. sondhon | NityaPad-241 | आज मोही आगम अगम जनायो ॥ सोंधों
छानी अरगज़ा चंदन आंगन भवन लीपायों ॥१॥ आगम आवन जान प्रीतम
को गोपीजन मंगल मायो ॥ आनंद उर न समाय सखी नव साजि सिंगार
बनायों ॥२॥ तन सुख पाग पिछोरा झीनो केसर रंग रंगायो ॥ मुक्ता के आभूषन गुही मनी पहिरावत हुलसायो ॥३॥ पंखा बहु सिर प्रीतम को, नित राखुंगी
छिरकायों ॥ ग्रीषमऋतु सुख देति नाइक यह औसर चलि आयों ॥ आवेंगे महेमान
आज हरि भाग्य बडे दिन पायों ॥ 'कुंभनदास' नव नेह नई क्रतु आगम सुजस
सुनायों ॥४॥ | Saarang |
Balihari raas biharin kii | | Pustak1-330 | बलिहारी रास बिहारिन की |
मरकत मनि कज्वन-मनिमाला ग्रथन नन्दकुमार की ॥१॥
सारंग राग अलापत गावत बिच मिलवतयतति ताल
की नाचत गावत बेन बजावत लेत उदार उगाल की ॥२॥
यमुना सरस मल्लिका मुकुलित त्रिविध समीर सुढ़ार की ।
'क्ृष्णदास” बलि गिरिधर नवरंग सुरतनाथ सुकुमारा की ॥३॥ | Saarang |
Seetal sadanmein seetal bhojanbhayo seetal curran koo aisab sakhiyaan.. | NityaPad-221 | सीतल सदनमें सीतल भोजनभयो सीतल करन को आइसब सखियां।।
छीरक्यो गुलाबजल नीले पीरे पाननमें बीरी अरोगत नाथ सीतल हो त अखियां॥१॥
जल गुलाबघोर लाई अरगजा चंदन में नेक लगावो कंठ लपटाई॥
कुंभनदास प्रभु गोबरधनधर कीजे सुख सनेह हाथ पंख ढुराई ।॥२॥ | Saarang |
Krishna shrikrishna mammahi gati jaaniye... | NityaPad-358 | कृष्ण श्रीकृष्ण मममाहि गति जानिये।॥
देह इंद्रिय प्राण दारागारादि वित्त आत्मा सकल श्रीकृष्ण की मानिये ॥१॥
कृष्ण मम स्वामीहों दास मनवचकरम कुष्णकर्ता येही सदा जिय आनिये ॥
कृष्णदासनि नाथ हरिदासवर्य धरचरण रजबललभाधीश मन सानिये ॥२॥। | Gori |
Kajarwari gori jwaari .. yaa sanwaliya | Part3-119 | काजरवारी गोरी ज्वारि ॥ या सांवलिया
की लगवारि ॥ निसदिन रहेत प्रेमरंगभीनी ।। हरि रसिया सों यारी कीनी
॥ १॥ मदनगुपाल जानि रिझवार ॥ नानाविधिके करत सिंगार ॥ मिलनकाज
रहे अंग अंगोछें || सरस सुंगधन तेल तिलीछें ॥ २॥ अंजन नाहि भटवेंदीये ॥
स्यामरंग ननन में पीये ॥ गावतद्दू जसुमति ग्रह आबे ॥ कृष्ण चरित्र बह
गाय सुनावे ॥ ३॥ सुंदरस्याम सुनेंढडिगआय || चितवत ही चित हरि लेजाय ॥
कोऊ कहे काड्ू की न माने ॥ अपने मनकी गायवखाने ॥४॥ रामरायप्रभु
योंसमुझावे || कहि भगवान् कोऊनीके गावे || ५॥ लखिइनस्याम कहेनिरधार ॥
यह लगणवारिन यह लगवार ॥६॥ | Bilawal |
Chorikarat kanhgharpaye .. | NityaPad-183 | चोरीकरत कान्ह्घरपाये ॥
निशवा सरमोहि बहुतसतायो अबहरि हाथहि आये ॥१॥
माखनदधि मेरोसबखायो बहुत अचगरीकीन्हीं ॥
अबतो हाथपरेहोलालन तुमहीभलेमैंचीन्हीं ॥ २॥
दोऊभुजपकरकेंकह्ञों माखन लेहों मँगाय ॥
तेरीसों मैनेंकनचाख्यो सख्ागयेसबखाय ।॥३॥
मुखतनचिते विहँसहँसदीनो रिसत बगईबुझाय ||
लियेस्थाम उरलायग्वालिनी सूरदास बलजाय ॥॥४॥ | Ramakali |
Srijmunajiki mahima mopein varani naan jaaee .. | NityaPad-011 | श्रीजमुनाजीकी महिमा मोपें वरनी न जाई ॥
सूरसुता घनश्यामवरन प्रफुल्लित रूप निकाई।॥। १॥
श्रीहरि गोपवधू द्विज सब श्रीगोकुलके लरकाई ॥
ब्रजाधीश प्रभु आदि भक्तनकों सकलसिद्धि सुखदाई ॥।२॥ | Ramkali |
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