Annakut Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Shree Vrushbhaan ladeti gaayein keerati
Part1-269
श्रीवृषभान लड़ेती गाइयें कीरति कुल मंडनबाल हो ॥ सोनेकीसी बेलिहो प्यारी चंपेकीसी माल हो ॥१॥ हंसगमनी मृगलोचनी शोमित सहज सिंगार ॥ चमकत चंचल चीकने सिर सटकारे बार ॥२॥ पूँधरवारे बारन ऊपर शोभित सुंदर साल ॥ चंदके फंद परे अहिनंदन उरझे कंचन जाल ॥३॥ अतलसकौ लहेंगा कटि गाढ़ो दरियाई की अँगिया पीत ॥ उरज सुभट कंचनकवच सजि आये रति रणजीत ॥४॥ कृश कटि केहरि देखिदुरै हरि जेहर तेहर पाय ॥ गजगमनी कमनी अवनी रखनी रति लेत बलाय ॥५॥ कर चूरौ ललकै झलक पलकै न लगै छबि देख |! अँगुरिन मुँदरी पोंहीची गजरा बाजूबंद विशेख ॥६॥| चंपकली चौकी चमकै दमकै दुलरी पिय पोति ॥ चितकों लेत चुराय चाहिकें बदन चंदकी जोति ॥७॥ अरुण अधर दमकत दशनावलि श्याम चपलता सार ॥ कमलकोशमें बैठी पंगति मानो भृंगकुमार ॥८॥ बेसर को मोती लटके मटके खटके प्रिय प्रान ॥ श्रवन बनी रुचि मनी कनककी तनक तरकुली कान ॥९॥ पियतृखमोचन रतिर्स रोचन चंचल लोचन नार ॥ कुँवर किशोर चकोर चेंहें टुबा पढ़त चंद चटसार ॥१०॥ अलिकुल गंजन रतिरसरंजन नयनन अंजन दीन ॥ क्रीड़त सुधा सरोवर महियाँ मानो मनसिजके मीन ॥११॥ समर सहायक नवरस नायक सायक घायक नयन ॥ कुँवर कुरंग सुरंग कमल काननसों ठानत टैन ॥१२॥ कारी झपकारी भारी बरुनी बरनें कवि कौन ॥ भ्रोहें सुठि सोहें मोहें मानो हावभाव के भौन ॥१३॥ शुभ बिरियाँ दुपेहेरियां के फूलनकी बेंदी दीनी भाल ॥ इंदुबधू मानों नवलचंदकों आय मिली ततकाल ॥१४॥ शीश फूल सोहै मोहे बनी तनक कनककी आड़ ॥ चिबुक चारु मुसिकाय हँसत जब परत कपोलन गाड़ ॥१५॥ यह विधि छबि अगाधा साधा राधाजू सखियन माँझ | बिटियाँ बहुत जो गोपनकी संगखेलत सांझी सांझ ॥१६॥ गोधूलकी बिरियाँ डलियाँ फूलनकी ले च्लीं हाथ ॥ बीनत फूलन यमुना कूलन श्यामाजूके साथ ॥१७॥ एक लिये ओली चोली पर चाँप चिबुकतर चीर ॥ फूलन तोरत तनहिं मरोरत जहाँ भ्रमरनकी भीर ॥१८॥ एकन लै लावन्य ललित पटकी अटकी कटि छीन ॥ रमक - झमक पललव नवाय चढ़ बीनत फूल प्रवीन ॥१९॥ कुंदी कुंद करन कोमल निरवारत बाला बेलि ॥ ललित लवंग लता बनिता पर रहे झूमका झेलि ॥२०॥ जाई जुही केतकी निवारी चमेली रायबेल ॥ फूलन की कर गेंदुक बाला बनमें खेलत खेल ॥२१॥ बौरसरीके फूलबकी नकफुली बनावत एक ॥ श्यामा अभिरामा सुख थामा खेलत खेल अनेक ॥२२॥ तिहिं छिन कुंजबिहारीजू दुरि देखत कुंजनओट ॥ रहे हैं चित्र कैसेजु चितेरे लगी द्रगनकी चोट ॥२३॥ कियौ सखीको रूप लालने भर गुलाबदल गोद ॥। त्रियारूप धर दरशन दीनों मनमें मानत मोद ॥२४॥ निरखि निरखि वृषभान नंदिनी बोली बचनरसाल ॥ सब सिंगार सोहै मोहै तू को हैरी नवबाल ॥२५॥ तू क्‍यों फिरत अकेली हेली यह बन यमुना कूल ॥ नंदगाम घर साँझी को हम बीनन आईं फूल ॥२६॥ उत्कंठित वृषभान नंदिनी कंठ भुजा उरमेल ॥ आज अबार भई साँझीकों तू संग हमारे खेल ॥२७॥ सखी लईं सब बोल बोल गौरंभन धुनि सुनि कान ॥ बड़ी बार घर जैहें तो खीजें बाबा वृषभान ॥२८॥ चंदा चंद्रभगा चंद्रावलि चंचलनयनी चली धाम ॥ बहुत फूल बीनै हैं भटू री पूजे मनके काम ॥२९॥ कमल फिरावत गीतजो गावत आवत घर ब्रजवाल ॥ फूलनकी कर गेंद लकुटिया फूलनकी उस्माल ॥३०॥ माय धाय उर लाय लई कीरतिजू परमप्रवीन ॥ अरग बढ़ाय लई घर भीतर आप आरती कौन ॥३१॥ मृगमद चंदन केसरसों श्यामाजू लीपी भींत ॥ कामधेनु के गोबरसों रचि साँझी फूलन चीति ॥३२॥ धूप दीप धरि भोग अमृतरस आप आरतौ उतारि ॥ गावत गीत पुनीत किशोरी श्रीवृषभानकुमारि ॥३३॥ करब्यारू सब संग खेलि चली अपने अपने धाम॥ श्यामाजू और नवल सखी सुख लूट्यौ चास्यो जाम ॥३४॥ त्रिय बागौ ललिताहिं दीयौ श्यामापति सुधर सुजान ॥ रसिकरूप धर केलि करी सुखसागर प्रानन ग्रान ॥३५॥ शरद निशा सुख यह विधि राधा माधौजूनित्यबिहार ॥ शोभापर बल जाय श्यामघन अवलोकत सुखसार ॥३६॥
Gori
Sab mil aayi laadili vrushbhaan nrupati ke dwaar ho
Part1-271
सबमिल आईं लाड़िली वृषभान नृषति के द्वार हो ॥धृ.॥ सब मिल आय कट कीरतिसों देहु लड़ेंती संग || बनमें फूल बिराज रहे हैं खेलन साँझी रंग ॥१॥ यह सुन कीरति बोल कुंवरिकों उबटिन्हवाई प्रीति ॥ अँग अँगोछ फुलेल केश बिच पाटी पारी चीति ॥२॥ बेनी सुरंग गूँथि माँगमें सेंदुरभरी बनाय ॥ बाँयें सीसफूल इत चंदा बिच लटकन लटकाय ॥३॥ टीकी कमलपत्र काजर दे बेसर चिबुक बिराज ॥ खुटिला खुभी और टेढ़ी बेंदी झूमक साज ॥४॥ कंटसरी तिमनी दुलरी चंपकली हार हमेल ॥ मुलकट अअगिया बाँह बिजोंढे बाजूबंदन पेल ॥५॥ चूरी गजरा कंकन पोंहोंची हाथ साँकरा मुँदरी ॥ कि लहेंगा सारी फु्फुदी बाजत किकिणी सगरी ॥६॥ पग नूपूर पायल जेहर अनबट बिछिया पगपान || यह सिंगार कर चली लड़ैती सब मिलि गावत गान ॥७॥ बनमें बीनत फूल हरखसों डलियों सोहे हाथ ॥ फूलगेंदकों आये लालन सखा न कोऊ साथ ॥८॥ खेलत गेंद परी इन बीचन प्यारी लई उठाय ॥ लालन आय गेंद माँगत हैं ललिता कह्ौ समुझाय ॥९॥ अब तो गेंद न पैहो लालन चतुराई के मूल ॥ पूछत लाल सबै क्‍यों आंई बनमें बीनन फूल ॥१०॥ कहाँ लड़ैती साँझी धरिहें फूल सबै लै चीति ॥ लाल कह्मौ मोहि आछी आवै देखो मेरी रीति ॥११॥ सबन कहा कैसें लै चलियें एकन कह उपाय ॥ पेहेरावा आभूषन सारी करीयें सखी सजाय ॥१२॥ सबै हरख सिंगार किये मिल चलीं आपने गेह ॥ नामधस्थौ श्यामाजू इनको तब बाँह परस्पर देह ॥१३॥ ललिता चंद्रभागा व्रजमंगल मैना नयना रूप ॥ करुणा मोहा कुमुदा रत्ना लोभा ललना अनूप ॥१४॥ रंभा कृष्णा दुर्गा ध्याना रूपा हरखा नाम ॥ रंगा हंसा दामा प्रेमा ज्ञाना जुहिला भाम ॥१५॥ चंपा बहोला सुमना नीला हीरा मुक्ता प्यारी ॥ कुंजा अमला समला विमला चंद्रावली सुकुमारी ॥१ ६) तारा कमला अमला यमुना वूंदा नंदा नारी ॥ अबला शीला सुखिया प्रमुदा नवला सुमति बिहारी ॥१७॥ चतुरा कामा रसिका श्यामा राधा लै घर आईं ॥| एक वेश एक रूप सबनकौ देखत रही लुभाई ॥१८॥ गावत आवत सब मन भावत आरती कीराति साज ॥ पूछत कह्मौ लड़ैती यह को जोरी भल्ी विराज ॥१९॥ बीनत फूल यह मैं देखी पूछी इनकी बात ॥ नंदगाममें बास बसत है श्यामा नाम कहात ॥२०॥ इनमें एक बड़ों गुण मैया जानत साँजझी चीति ॥ मन हरखित कीरति तब बोली खेलों सब मिलि प्रीति ॥२१॥ भुठिया वार आरती बारी भीतर गई लिवाय ॥ भीति लीप चंदनसों छिरकी साँझी धरत बनाय ॥२२॥ धूपदीप नेवेद्य धस्बौ पुनि आरती करत सँवारि ॥ कीरति कहा बियारू कीजै भूखी हो सुकुमारी ॥२३॥ भोजनकर सब हाथ पखारे बीरा रत्ना देत ॥ बीरा ले कह्मौ हम घर जैहैं कीरति कह्ौ सुहेत ॥२४॥ श्यामा तुम जिन जहु दूर घर यहाँई सोवो रात ॥ औरनसों यों कह्मौ बेगिही आवोगी उठ प्रात ॥२५॥ वे तब गईं रही है श्यामा खेलत चोपर रंग ॥ जीत परस्पर होत दुहुनकी राधा श्यामा संग ॥२६॥ एक सेज पौढ़े तब दोऊ उठे प्रात अरसाय ॥ बेऊ सब आँईं तिहिं अवसर निरख सबै मुसिकाय ॥२७॥॥ सौँझी डलिया में धर लीनी गावत चली सुभाय ॥ डलिया यमुनाजल पधराई सबै न्हात सुख पाय ॥२८॥ लाल कह्मौ अब हम घर जैहैं मैया जानतनाय ॥ यों कहि आवत जसुमति देखी रूखे भये लजाय ॥२९॥ जसुमति पूछत रात कहाँ रहे लालन कही बनाय ॥ दौरी गाय गयौ ता पाछें गोवर्द्धन लियौ बुलाय ॥३०)॥ आछे फल ले मोहि खवाये सोय रह्मौ ता पास ॥ द्वारकेश प्रभुकी बतियाँ सुन जसुमति आयौ हास ॥३१॥
Gori
Keerti kul mandan gaayiye vrushbhan nrupati ki baal ho
Part1-273
कीरति कुल मंडन गाईयें वृषभान नृपतिकी बाल हो ॥ कंचन तन सोहै मोहै उर पहेरें मुक्तामालहो ॥१।| सखी बूंद सब आय जुरी वृषभान नृषति के द्वार ॥ बीनन फूल चलौ बन राधे नवसत साजसिंगार ॥२॥ यह सुन कीरातिजु हँसिके प्यारीको कियो है सिंगार ॥ कंबरी कुसुम गुही है मानौ उड़ुगणकी अनुहार ॥३॥ शीशफूल जिम चंद विराजत शोभा कही न जाय॥ कोटि चंद वारों मुसिकन पर काम रहो मुरकझ्षाय ॥४॥ बंक बिराज रहे भृकुटी तट खुटिला श्रवनन पास ॥ यों लपटाय रहे दोऊ जनु नयन दरशकीआस।।५॥ करनफूल झूमक अरु बंदी लटकन बेंदि लिलार ॥ नकबेसर मोती अति सोहै लटकन परम सुढार ॥६॥ मुखही तमोल अधर अरुनाई दशन लसन अति सार ॥ चिबुक बिंदु मधुकर सुत मानौ बैठ्यो आसन मार ॥७॥ अंजन ऊपर खंजन वारों नयन चपलता मीन || कीरतिजू छबि निरखि निरखिकें दीठदिटौना दीन ॥|८॥ चौकी चमक तिमनियाँ दुलरी घंपकली उपहार ॥ बाजूबंद पछेली चूरी कंकन गजरा चार ॥९॥ पोंहोंची रत चौक और मुँदगी नखभूषण छबि देत ॥ श्रीकर कमल बिराजत मानों उडुगण चंदसमेत ॥१०॥ श्रुद्रघंटिका कटि तट राजत जेहरि नूपुर पाय ॥ अँगुरिन बिछिया अनवट सोहें शोभा कही न जाय ॥११॥ हरे कसबकौ लेहेंगा सोहे कंचुकी केसरि अंग ॥ सारी सुही रैंगी है मानों गुलाबॉसके रंग ॥१२॥ कर सिंगार कह्मौ कीरतजू जाउ लड़ैती साथ ॥ अली यूथमें चली परस्पर फूलन इलिया हाथ ॥१३॥ चलत चाल मराल बाल श्रीराधाजू सखियन माँझ ॥ बीनत फूलन यमुना कूलन खेलत सॉझीसाँझ ॥१४॥ जालरंध्र देखत है मोहन दृष्टिपरी व्रजबाल ॥ त्रियारूप कियौ है तबहीं आय मिले ततकाल ॥१५॥ छबि निरखत वृषभान ढुलारी बहुत करी मनुहारि ॥ बीनत फूल अकेली हेली तू को है सुकुमारि ॥१६॥ कौन गाम बसति हो सुंदरि कहा तिहारी नाम ॥ आज अबार भई है प्यारी चलो हमारे धाम ॥१७॥ नंदगाममें बास बसति हूँ सावरी मेरी नाम ॥ साँज्ञी मिस आई हों या बन पूजे मनके काम ॥१८॥ सौनजुही चमेली चंपा रायवेलि अरुबेलि ॥ गुलाबॉसकी गेंद लिये कर करत परस्पर केलि ॥१९॥ कमल कनेर केतकी निवारौ सेवत्ती सदा गुलाब ॥ गुलतुर्रा सदा सुहागिन फूलनकी भरि छाब ॥२०॥ ललिता चंपकलता विशाखा स्यामा भामा जेह ॥ चंद्रभगा तुंगा चंद्रावलि राधा माधव नेह )२१॥ ठौर ठौर सब कहत सखिनसों चलौ भटू घर जाँह ॥ श्यामाजू अरु नवल सखी दोऊ गेह परस्पर बाँह ॥२२॥ सौंधे सानि मध्य चंदन मिल करत केलि मनभाये ॥ निरख देव दुंदुभी बजावत पुष्पन वृष्टि कराये ॥२३॥ फूल गेंद सबहिन लियें कर गावत साँझी गीत ॥ गजगति चाल चलत ब्रजसुंदरि बढ़ी पस्म रस प्रीत ॥२४॥ चहुँदेशि तैं सब आय जुरी वृषभान नृपतिके द्वार ॥ कीरतिजू तब करत आरती राई लौन उतार ॥२५॥ कीरति बिहँसि कही मूदुबानी लली चली यह कौन ॥ प्यारी कह्मौ नंदगाम बसति हैं खेलन आई भौन ॥२६)॥ केसर चंदन अगर अरगजा मृगमद कुंकुमगार॥ कामधेनुकौ गोबर लैकें साँझी धरत सँवार ॥२५॥ धूप दीप कर भोग धस्थों आरती करी है बनाय ॥ माँगत सीख सबै व्रजबाला हाथ जोर शिर नाय ॥२८॥ ब्यारू आज करी मिल हाँहीं राधा जूके साथ ॥ कीरतिजु यों कहत सबनसीं परसूँ अपने हाथ ॥२९॥ कर ब्यारु गृह गई सहेलीं रह्मौ खेलनकौ रग ॥ कमल सेज पर पौढ़े दोऊ मिल सॉँवरी राधा संग ॥३०॥ कहा कहूँ कछु कहत न आदे प्रभुकौ यही स्वरूप ॥ त्रियाबसन ललिताहीं दीये कीये हैं निजरूप ॥३१॥
Gori
Shyam Sneha hi gaayiyo yaatein
Part1-275
श्याम सनेही गाइये यातें श्रीवृंदावन रज पाइये हो ॥प्रु.॥ राधा जिनकी भामती कुंजन कुंजन केलि ॥ तरु तमाल ढिंग अरुझी मानों लसत कनककी बेलि ॥१॥ महामोहनी मन हस्यौ रसबस कीने लाल ॥ कुचकलशन पर मन मल्यो लट बॉध्यौ मैन मराल ॥२॥ नयन सैन दे तन बेध्यो मन बेध्यौ कल गान ॥ अंजन फंदन कुँवर कुरंगन चलें दोऊ भ्रींह कमान ॥३॥ नकबेसर बड़सी लगी चित्त चंचल मनमीन ॥ अधर सुधा दे बेधियौ चकृत किये आधीन ॥४॥ अंग अंग रसरंगमें मगन भये हरि नाह ॥ व्यास स्वामिनी सुख दियौ पिय संगमें सिंधु प्रवाह ॥५॥
Gori
Sakhiyaan sang radhika beenat sumanan ban maanha
Part1-275
सखियन संग राधिका बीनत सुमनन बनमाँह ॥ साँझी पूजनकों आतुरही ठाढ़े कब की छोँह ॥१॥ सखी भेष दे मोहनकों लै चली आपने गेह॥ पूछी कीरति यह को सुंदारि तब कहो मेरी सनेह ॥२॥ सॉँझी खेल बिदाकर सबकों दोऊ पौढ़े सेज मझार ॥ सगरी राति सूर के स्वामी बसि सुख कीयो अपार ॥३॥
Gori
Radha Pyaari kahamayo sakhinsoun saanzhi dhari
Part1-275
राधाप्यारी कह्मयौ सखिनसों साँझी धरौ री माई ॥ बिटियाँ बहुत अहीरन की मिल गई जहाँ फूल अथाई ॥१॥ यह बात जानी मनमोहन कहो सबन समुझाय ॥ भैया बछरा देखें रहियों मैया छाक धराय ॥२॥ ऐसें कहि चले श्याम सुंदरवर पोंहोंचे जहाँ सब आई || सखीरूप है मिले लाड़िले फूल लिये हरखाय ॥३॥ करसों कर राधा संग शोभित साँझी चीती जाय ॥ खटरसके बिंजन अरपे तब मन अभिलाष पुजाय ॥४॥ कीरतिरानी लेत बलैया विधिसों विनय सुनाय ॥ सूरदास अविचल यह जोरी मुख निरखत न अधघाय ॥५॥
Gori
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