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SPIRITUAL BENEFACTOR
VAISHNAVACHARYA HDH PUJYA GOSWAMI 108 SHRI VRAJRAJKUMARAJI MAHODAYASHRI
Kirtan Title | Kirtan | Category | Book-Page# | Raag |
|---|---|---|---|---|
Bhor hii valllabh kahiye. | भोर ही वल्लभ कहिये।
आनंद परमानंद कृष्णमुख सुमर सुमर आठों सिद्धि पैये ॥१॥
अरु सुमरो श्रीविद्दल गिरिधर गोविन्द द्विजवरभूप ।
बालकृष्ण गोकुल-रघु-बदुपति नव घनश्याम स्वरूप ॥२॥
पढो सार बलल्लभवचनामृत जपो अष्ठटाक्षर नित धरी नेम |
अन्य श्रवणकीर्तन तजि, निसदिन सुनो सुबोधिनी जिय धरि प्रेम ॥३॥|
सेवो सदा नंदयशोमतिसुत प्रेम सहित भक्ति जिय जान ।
अन्याश्रय, असमर्पित लेनो, असद् अलाप, असत् संग, हान ॥४॥
नयनन निरखो श्रीयमुनाजी और सुखद निरखो ब्रजधाम |
यह संपत्ति वल्लभतें पैये, रसिकनको नहि औरसों काम ॥।५॥। | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-001 | Bhairav |
Praatsamay uthh kariye shrilakshmansut gaan .. | प्रातसमय उठ करिये श्रीलक्ष्मणसुत गान ॥
प्रकट भये श्रीवल्लभप्रभु देत भक्तिदान ॥१॥
श्री विद्लेश महाप्रभु रूपके निधान ।॥
श्रीगिरिधर श्रीगिरिधर उदय भयो भान ॥ २॥
श्री गोविंद आनंदकंद कहा वरणो गुणगान॥
श्रीबालकृष्ण बालकेलि रूप ही सुहान ॥ ३॥
श्रीगोकुलनाथ प्रकट कियो मारग वखान ॥
श्रीरधुनाथलाल देख मन्मथ ही लजान ॥४॥।
श्रीयदुनाथ महाप्रभु पूरण भगवान ॥
श्रीधनश्याम पूरणकाम पोधीमें ध्यान ।।५॥
पांडुरंगविट्डलेश करत वेदगान ॥
परमानंद निरख लीला थके सुर विमान ॥।६।। | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-001 | Bhairav |
Shree valllabh santat suyash nitya uthh gaaruun... | श्री वल्लभ संतत सुयश नित्य उठ गारऊं।॥
मनक्रमवचन क्षण एको न विसराऊं ॥१॥
श्रीपुरुषोत्तम अवतार सुकृतफल जगतबंदन श्रीवि्ठलेश हुलराऊं ॥
परस पदकमलरज निरख सुंदरनिधि प्रेमपपुलकत कलेश कोटिक नशाऊं॥२॥
श्रीगिरिधर देवपतिमानमर्दन करन घोखरक्षक सुखद लीला सुनाऊं॥।
श्रीगोविंद ग्वालसंग गाय ले चलत वन विशद अंबुज हाथ शिर परशाऊं।॥।३॥
श्रीबालकृष्णसहज बालकदशा कमललोचन रंग रुचि बढाऊं ।।
भक्तिमार्ग प्रकटकरण गुणराशि ब्रजमंडल श्रीगोकुलनाथ लडाऊं ॥।४॥
श्रीरघुनाथ धर्मधीर शोभासिं धु दुख दूर बहाऊं।॥
पतितउद्धारण महाराज श्री यदुनाथ रसनाचातक ज्यूं रटाऊं ॥५॥
श्रीघनश्याम रूप अभिराम रसिकरस निरख नयन सिराऊं ॥
चतुर्भुजदास पर्यो द्वारे प्रणपति करें श्रीवललभकुलचरणामृत भोर उठ पाऊं ॥६॥। | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-001 | Bhairav |
Jaya jaya jaya srivallabhnath .. sakal padarath jaake haath .. 1.. | जय जय जय श्रीवललभनाथ ।। सकल पदारथ जाके हाथ ।। १॥
भक्तिमार्ग जिन प्रकट कर॒यो | नामविश्वास जगत उद्धरूयो |२॥
सब मत खंड निरूपे वेद ॥ प्रेमभक्तिको जान्यो भेद ॥३॥
कारण करण समरथ भुजदंड ॥॥ मायावाद कियो मत खंड ।।४॥
परमपुरुष पुरुषोत्तम अंशी ॥ भक्तजनन मनकरत प्रशंसी ॥५॥।|
जाके नाम गुण रूप अनंत ॥ निर् मल यश गावत श्रुति संत ॥६॥।
सुंदरस्थाम कमलदललोचन || कृपाकटाक्ष भक्तभबमोचन ।।७॥
कामनापूरण प्रणकाम ॥ अहर्निश जपूं तिहारो नाम ॥८॥
जाके पटतर ओर न कोय ॥ दास गोपाल भजें सुख होय ॥।९॥ | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-002 | Bhairav |
Srivallabh srivallabh dhyaaun ..| naam lait atee munn sachupaaun..1.. | श्रीवल्लभ श्रीवल्लभ ध्याऊं ॥| नाम लेत अति मन सचुपाऊं॥१॥
श्रीवल्लभ त्यज अनत न ध्याऊं ॥ ओर काज मन में न लाऊं॥२॥
श्रीवललभ त्यज अनत न जाऊं ॥ चरणसरोजमूल घर छाऊं ।। ३॥।
श्रीवल्लभ ही के गुण गाऊं॥ रूप निरख नयनन अधघाऊं ॥४॥
श्रीवल्लभकेमन जो भाऊं।॥। आनंद फूल्यो मन समाऊं ।।५॥
श्रीवल्लभ को गाऊं भाऊं॥ यशोमतिसुतकों लाड लडाऊं ॥६॥
श्रीवल्लभके चरण रहाऊं।। भूखें महासुख भोजन विसराऊं ॥७॥
श्रीवल्लभको दास कहाऊं ॥ रसिक सदा यह नेह निभाऊं ॥८।॥। | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-002 | Bhairav |
Jaya jaya jaya shree valllabh prabhu vidvalesh saathen | nijajan parr karat kripa dharat haath maathen .. | जय जय जय श्री वल्लभ प्रभु विद्वलेश साथें | निजजन पर करत कृपा धरत हाथ माथें ॥
दोष सब दूर करत भक्तिभाव हिये धरत काज सब सरत सदा गावत गुणगाथें ॥१॥|
काहेको देह दमत साधन कर मूरख जन विद्यमान आनंद त्यज चलत क्यूं अपाधें।
रसिक चरण शरण सदा रहत हे बडभागी जन अपनो कर गोकुलपति भरत ताहि बाधें ॥२॥ | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-002 | Bhairav |
Bhor bhaye bhaavson leey srivallabhanam. haye rasna tuu or vritha bakey kyon nikaam ..| | भोर भये भावसों ले श्रीवल्लभनाम। है रसना तू ओर वृथा बके क्यों निकाम ॥|
कीजे सेवा रसस्वाद पावें निशदिन गुण गावें ओर सब रसविसराबें यह मन आठो याम ॥१॥
रसिक न कछु ओर करें इन ही में भाव धरें अतिरस अनुपान करें ओर कपट वाम ।।
हरिवश छिनही में होत सगरों भक्तिमारगरूप हृदय वसें अरु रससमूहधाम ।।२॥। | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-002 | Bhairav |
Jayati shriradhikaramanparicharadhillavisharasharativilishatharararivishararamamathathararisharathisharishamararamatharamalararashisharararathivararararararisheeeeeeeshararararararararararararathathishishish ..| | जयति श्रीराधिकारमणपरिचरणरतिवल्लभाधीशसुतविद्ठलेशे ॥|
दासजनलौकिकालौकिके सर्वदा कैब चिंतोदबति हृदयदेशे ॥॥१॥
स्थापयति मानसं सततकृतलालसं सहजसुषमारुचिररूपवेशे ॥
भालयुततिलकमुद्रादिशो भासहितमस्तकाबद्धसितकृष्णकेशे ॥२॥।
सहजहासादियुतवदनपंकज _ सरसवचनरचनापराजितसुधेशे ॥
अखिलसाधनरहितदोषशतसहितमतिदासहरिदासगतिनिजबलेशे ॥३॥ | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-003 | Bhairav |
Gaauun srivallabh dhyaaun srivallabh valalbhacharanraj tunn lapataaun.. | गाऊं श्रीवल्लभ ध्याऊं श्रीवललभ वललभचरणरज तन लपटाऊं॥
बललभसंतति नित्यप्रति निरखूं वललभदासन दास कहाऊं ।।१॥
कृष्णलीला सेवा नित्य करके जगत सबे तृणतुल्य धराऊं।॥।
व्यासदासकी यही प्रतिज्ञा श्रीगोविंदकृपातें पाऊं ॥२॥ | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-003 | Bhairav |
Jup tapa teerath name dharam vrat . | जप तप तीरथ नेम धरम व्रत ।
मेरे श्रीवललभ प्रभुजी को नाम ।
साधन तज भज आठों जाम ॥१॥
रसना यही रटौं निसवासर ।
दुरित' कटें सुधरें सब काम ॥२॥|
आंगन बसों जसोदासुत पद ।
लीलासहित सकल सुखधाम |
रसिकन ये निरधार कियो है। | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-003 | Bhairav |
Srivallabhanam ratoon rasna nitya raho surat jiya aatho yaam .. | श्रीवल्लभनाम रटूं रसना नित्य रहो सुरत जिय आठो याम ॥
निरख नयन सकल सुंदरता श्रवणन सुन कीरतिगुणग्राम ॥। १॥।
पुष्पप्रसाद सुवास नासिका लेहु उगार सदा सुखधाम ॥
सेवा करूँ चरणकर मेरे वारवार हूं करूं प्रणाम ॥२।।
दुःख संसार छुडावन सुखनिधि आनंदकंद भक्तविश्राम ।।
रसिकशिरोमणि दीन जानके सीस बिराजे पूरणकाम ।। ३।। | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-003 | Bhairav |
Namo balallabhadhishpadakamalayugale sadaa vasatu mumm hridayam vividhbhaavarsavalitam .. | नमो बलल्लभाधीशपदकमलयुगले सदा वसतु मम ह॒ृदयं विविधभावरसवलितं ।।
अन्यमहिमा55भास वासनावासितं मा भवतु जातु निजभावचलितं ॥१॥
भवतु भजनीयमतिशबितरुचिरं चिरं चरणयुगल सकलगुणसुललितं ।|
बदति हरिदास इति मा भवतु मुक्तिरषि भवतु मम देहशतजन्मफलितं ॥२॥। | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-003 | Bhairav |
Srivallabhacharansharan jaay sub sukh tuun lahey ray ..| | श्रीवललभचरणशरण जाय सब सुख तूं लहे रे ॥|
रसना गुण गाय गाय दरशन प्रसाद पाय ओर काज त्याग भाग वल्लभरति गहे रे ॥१॥
रेन दिनचिंतत रहे “3 शी ५3 इनहीं के रूप रंग इनहीं रस वहि रे॥
श्री विद्डलगिरिधारी यहि रस भारी चाहेना जो चाहे जीये तो येही चाह चही रे ॥२॥ | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-003 | Bhairav |
Ruchirtar ballabhadhishcharanam .. | रुचिरतर बल्लभाधीशचरणं ॥
अस्तु में सर्वदा सुंदराकृति जगन्मोहनं हदि विरहकरणं ॥१॥
विहितमायावादवादिजन जारजन्यसंगतात्मजनकुमतिहरणं ।|
अखिलसाधनरहितदो षशतकलुषकर कुमतिभर भरितनिजदासशरणं ॥२॥।
अंजसा कदंबपादपबहुपत्रयुतवासनाभंगभवजलधितरणं ॥।
वद॒ति हरिदास इति सकलजनमात्रकृतिगोकुलाधीशपदकमलवरणं ॥ ३॥। | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-004 | Ramkali |
Srivallabh tanmandhan srivallabh sarvasva mein payeshrivallabhprabhu chintamani merey || | श्रीवल्लभ तनमनधन श्रीवल्लभ सर्वस्व में पायेश्रीवल्लभप्रभु चिंतामणि मेरे ||
श्रीवल्लभ मम ध्यान ज्ञान श्रीवल्लभ विनभजु न आन श्रीवल्लभ हें सुखनिधान प्राण जीवन केरे ॥१॥
श्रीवल्लभ मोहिइष्टदेव सदा सेवूं श्रीवललभ चरचो चरणकमल श्रीवल्लभजूके चेरे।।
छीतस्वामिगिरिवरधर तेसेई श्रीविद्वलेश श्रीवललभकी बल बल जाऊं वेरेवेरे ॥२॥। | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-004 | Ramkali |
Praatasame smarun srivallabh srivitthalnath param sukhakaari .. | प्रातसमे स्मरुं श्रीवल्लभ श्रीविद्ठलनाथ परम सुखकारी ।।
भवदु:खहरण भजनफलपावन कलिमलहरण प्रतापहारी ॥ १॥॥
शरण आये छांडत नहिं कबहुं बांह गहेकी लाज विचारी ॥
त्यजो अन्यआश्रय भजों पदपंकज द्वारकेशप्रभुकी बलहारी ॥२॥। | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-004 | Ramkali |
Jopein srivallabh charan gahe !. | जोपें श्रीवललभ चरण गहे !।
तो मन करत वृधा क्यों चिंता हरि हियें आय रहे ॥१॥
जन्म जन्म के कोटि पातक छिनहींमांझ दहे ॥
साधन कर साधो जिनको उस सब सुख सुगम लहे ॥२॥|
कोटिकोटि अपराध क्षमा कर सदा नेह निवहे ॥
अब संदेह करो जिन कोऊ करुणासिंधु लहे ॥ ३॥॥
अबलो विन सेवें श्रीवललभ भवदु:ख बहुत सहे ॥
रसिक महानिधि पाय ओर फल मनवचक्रम न चहे ॥४॥। | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-004 | Ramkali |
Jaya shree vallabh charan kamal shir naaiye | | जय श्री वललभ चरन कमल शिर नाइये |
परम आनन्द साकार शशी शरदमुख मधुर वानी भक्त जनन संग गाइये ।जय.।।
राज तम छांड मध्य सत्व के संग गही राखि विश्वास प्रेम पंथ को धाइये।॥।
कहे ब्रजाधीश वृंदाविपिन दंपति ध्यान धर धर हिये दृगन सिराइये ।|जय.॥ | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-004 | Bhairav |
Srivallabh madhurakriti merey . | श्रीवल्लभ मधुराकृति मेरे ।
सदा बसो मन यह जीवनधन। सबहीनसों जु कहत हों टेरे ॥१॥|
मधुर बदन अति मधुर नयनयुग। मधुर भ्रोंह अलकनकी पांत।
मधु र भाल बीच तिलक मधुर अति। मधुर नासिका कही न जात ॥ २॥
मधुर अधर रसरूप मधुर छबि | मधुर मधुर अति ललित कपोल |
मधुर श्रवनकुंडलकी झलकन | मधुर मकर मानो करत कलोल ॥।३॥
मधुर कटाच्छ कृपापूरन अति। मधुर मनोहर वचन विलास।
मधुर उगार देत दासनकों। मधुर बिराजत मुख मृदु हास ॥४॥
मधुर कंठ आभूषणभूषित । मधुर उरस्थल रूपसमाज |
अति विशाल जानु अवलम्बित | मधुर बाहु परिरंभन काज ।।५॥
मधुर उदर कंटि मधुर जानुयुग | मधुर चरण गति सब सुखरास |
मधुर चरणकी रेनु निरन््तर। जनमजनम मांगत हरिदास ॥६॥ | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-005 | Ramkali |
Srivallabh srivallabh shree balalabh kripa nidhan atee udaar | श्रीवललभ श्रीवल्लभ श्री बललभ कृपा निधान अति उदार
करुनामय दीनद्वार आयो ॥
कृपाभर नयनकोर देखीये जु मेरी ओर जन्म जन्म
शोध शोध चरण कमल पायो ॥ १॥।
कीरति चहूं दीश प्रकाश दूर करत विरहताप
संगम गुण गान सदा आनन्द भर गाऊं ॥
विनती यह मान लीजे अपनो हरिदास
कीजे चरणकमल वास दीजे बलि बलि बलि जाऊं ॥।२॥ | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-005 | Bibhaas |
Srimadacharya key charannakh chihn koo dhyaan urmein sadaa rahat jinake. | श्रीमदाचार्य के चरणनख चिह्न को ध्यान उरमें सदा रहत जिनके।
कटत सब तिमिर महादुष्ट कलिकाल के भक्तिरस गूढ दृढ होत तिनके || १॥
जंत्र अरु मंत्र महातंत्र बहु भांति के असुर अरु सुरनको डर न जिनके।
रहत निरपेक्ष अपेक्ष नहि काहुकी भजन आनन्द में गिने न किनके ॥२॥
छांड इनको सदा औरको जे भजे ते परे संसूतिकूप भटके ।
धार मन एकश्रीवल्लभाधीश पद करन मनकामना होत जिनके ॥। ३॥
मत्त उन्मत्त सों फिरतअभिमान में जन्म खोयो वृथा रातदिनके |
कहत श्रुतिसार निरधार निश्चय करि सर्वदा शरण रघुनाथ जिनके ।।४॥। | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-005 | Bilawal |
Balallabh chaahe soee karey . | बलल्लभ चाहे सोई करे ।
जो उनके पद दृढ करि पकरे महारस सिंधु भरे ॥१॥
बेद पुर्नन सुघरता सुन्दर ये बातन न सरे।
श्रीवल्लभ के पदरज भज के भवसागरतें तरे ॥ २॥
नाथके नाथ अनाथ के बंधु अवगुण चित न धरें।।
पद्मनाभकुं अपनो जानिके डूबत कर पकरे ।। ३।। | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-005 | Ramkali |
Charan lagyo chita mero srivallabh charan lagyo chita mero .. | चरण लग्यो चित मेरो श्रीवललभ चरण लग्यो चित मेरो ॥
इन विन ओर कछु नहि भावे इन चरणनको चेरो ॥ १॥।
इनहि छांड ओर जो धावे सो मूरखजु घनेरों ॥
गोविंददास यह निश्चय कर सोड़ ज्ञान भलेरो ॥२॥ | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-005 | Bilawal |
Srivitthalnathjuke charansharan ..| | श्रीविद्डलनाथजूके चरणशरणं ॥|
श्रीवल्लभनंदनं कलिदु:खखंडनं पूरणपुरुषोत्तमं त्रयतापहरणं ॥१॥
सकलद ु:खदारणं भवसिंधु- तारणं जनहितलीलादेहधरणं ॥
कान्हरदासप्रभु॒ सबसुखसागरं भूतलदृढभक्तिप्रकटकरणं ॥।२॥ | Shree Gusainji | NityaPad-006 | Bhairav |
Praatasmein uthh srivallabhanandanke guna gaauun ..| | प्रातसमें उठ श्रीवल्लभनंदनके गुण गाऊं ॥|
श्रीगिरिधर गोविंदको नाम ले श्रीबालकृष्णजीकों शीश्ञ नाऊं॥ १॥|
श्रीगोकुलनाथजीको प्रणाम करत श्रीरघुनाथजीकों देख नयनन सुख पाऊं ॥
श्रीयदुनाथ संग खेलत घनश्यामजू इनकी प्रीति हों कहांलो सिराऊं॥।२॥
यह अवतार भक्तहितकारण जो परमपदारथ पाऊं ॥|
विनती कर मागत ब्रजपतिपें निशदिन तिहारो दास कहाऊं ।।३॥ | Shree Gusainji | NityaPad-006 | Bhairav |
Srivitthalnathjuke charansharan ..| | श्रीविद्डलनाथजूके चरणशरणं ॥|
श्रीवल्लभनंदनं कलिदु:खखंडनं पूरणपुरुषोत्तमं त्रयतापहरणं ॥१॥
सकलदु:खदारणं भवसिंधु- तारणं जनहितलीलादेहधरणं ॥
कान्हरदासप्रभु॒ सबसुखसागरं भूतलदृढभक्तिप्रकटकरणं ॥।२॥ | Shree Gusainji | NityaPad-006 | Bhairav |
Srivallabh prabhu atee dayal deeje darshan kripal, deen zaan | श्रीवललभ प्रभु अति दयाल दीजे दरशन कृपाल, दीन जान
कीजे आपनो दोष जिन विचारी।
होंतों अप राध भर्यो धर्म सबे परहयों कीयो न कुछ भलोकाज जाहिचित्त धारो ॥ १॥
दूरि परें पल पल दुख पावत हो प्राणनाथ,तुमही ते होड़ हे प्रभु रसिक को निवारो ॥
मेरो पकर्यो हे हाथ बांध्यो पद कमल साथ हाथ, हों अनाथ ताहि भूल जिन विसारो ॥२॥ | Ath Shree Mahaprabhuji | NityaPad-006 | Bilawal |
Srivitthalesh vitthalesh vivalesh kahi ray . | श्रीविद्डलेश विद्उलेश वि्वलेश कहि रे ।
इनके संबंध विना दृश्यमान वस्तुमात्र ताको तू जियमें कलेश कहि चहि रे ॥ १॥
रसना गुणरूपको निशवासर कर यह सुख निरंतर अहार जेसे लहि रे॥
श्रीविद्डलिशके श्रीवल्लभके पदको पराग पावे जहां तिनके तू दासनको दास भयो रहि रे ॥।२॥ | Shree Gusainji | NityaPad-006 | Bhairav |
Gaauun srivallabhanandan key guna laauun sadaa munn angsarojan |. | गाऊं श्रीवल्लभनंदन के गुण लाऊं सदा मन अंगसरोजन |।
पाऊं प्रेम प्रसाद ततछिन गाऊं गोपाल गहे चितचोजन ॥।१॥
नवाऊं शीशरिझाऊं लाल आयो शरण यह जो प्रयोजन ॥
छीतस्वामी गिरिधरन श्रीविद्डल छबि पर बारूँ कोटि मनोजन ॥२॥। | Gokulnathji | NityaPad-007 | Ramkali |
Jaya jaya jaya srivallabhanand .. sakalkala bundavanchand ...1.. | जय जय जय श्रीवल्लभनंद ॥ सकलकला बुंदावनचंद ॥।१॥
वाणी वेद न लहे पार ॥ सो ठाकुर श्रीअंकाजीद्वार ॥ २॥
शेष सहस्रमुख करत उच्चार ॥ ब्रजजन जीवन प्राण आधार ॥३॥
लीला ही गिरिधार्यो हाथ ॥ छीतस्वामी श्रीविद्डलनाथ ।।४॥। | Shree Gusainji | NityaPad-007 | Bhairav |
Shree vidvalesh vitthallesh rasna rutt merrie .. | श्री विद्वलेश विद्ललेश रसना रट मेरी ॥
ग्रंथन को यह सार याहिते होत पार वारबार तोसों कहूं तुव हितकेरी । १॥
चाहे जो भलो तेरो कह्यो वेग मान मेरो भजि लें श्रीघोषनाथ धन्य जीवन तेरी ॥
जगनाजनको सहाय प्रेमपुंज सुयश गाय असत वात दूर करो विषया अरुझेरी ॥२॥
| Shree Gusainji | NityaPad-007 | Bhairav |
Praatahi shree gokulesh gokulesh naam . | प्रातहि श्री गोकुलेश गोकुलेश नाम ।
सकल सुख निधान मान करत त्रिबिध दुःख की हान यह जिय जान भजो अष्टयाम ।॥।१॥
इन विना योग यज्ञ करत वैराग्य त्याग विविध भाँत नेम धर्म करत सब निकाम ।।
निश्चय गहि चरण कमल भक्ति भाव हिये अमल गावत मुख निरख दास वारूँ कोटि काम ॥२॥। | Gokulnathji | NityaPad-007 | Bhairav |
Praatahi srigokulesh gokulesh gaauun .. | प्रातहि श्रीगोकुलेश गोकुलेश गाऊँ ॥
पूरण पुरुषोत्तम वपु धरे बदत त्रैलोकनाथ श्री विट्ठलेश नंदन निरखनयन सिराऊं ॥ १॥
श्री वल््लभजू के शरण आये कलियुग के जेते जीव उद्धेरे समूह तिनहीं कहालों गिनाऊँ।।
जे कबहूँक नामलेत तिनहूं को अभयदेत मांगत रघुनाथ दास निकट रहन पाऊँ ॥२॥। | Gokulnathji | NityaPad-007 | Bhairav |
Srigokulgamko pendo hii naanyaaro ..| | श्रीगोकुलगामको पेंडो ही न््यारो ॥|
मंगलरूप सदा सुखदायक देखियत तीन लोक उजियारो ॥१॥
जहां वल्लभसुत निर्भय बिराजत भक्तजनके प्राणनप्यारो ॥
माधोदास बल बल प्रतापबल श्रीविट्ठल सर्वस्व हमारो ॥२॥ | Gokulnathji | NityaPad-007 | Bhairav |
Jaya jaya jaya srivallabhanandan. | जय जय जय श्रीवल्लभनंदन।
सुर नर मुनि जाकी पदरजवंदन ॥। १
मायावाद किये जू निकंदन।॥।
नाम लिये काटत भवफंदन ॥२॥।
प्रकट पुरुषोत्तम चरचत चंदन ॥
कृष्णदास गावत श्रुतिछंदन ॥। | Gokulnathji | NityaPad-007 | Bhairav |
Praat samein shree vallabh sutako punya pavitra vimal yash gaauun... | प्रात समें श्री वललभ सुतको पुण्य पवित्र विमल यश गाऊं॥।
सुंदर सुभग बदन गिरिधर को निरख निरख दोऊ नैन शिराऊं ॥ १॥
मोहन बचन मधुर श्री मुख के श्रवण सुनि सुनि हृदय बसातुं ॥।
तनमन प्राण निवेदन यह विधि अपने को सुफल कहाऊं ॥ २॥
रहो सदा चरण के आगे महाप्रसाद उच्छिष्ट हों पाऊं॥ नंददास प्रभु यह मांगत है श्रीवल्लभ कुल को दास कहाऊं ॥ ३॥ | Gokulnathji | NityaPad-008 | Bibhaas |
Praat samein shree vallabhasutake vadan kamal koo darshan keeje .. | प्रात समें श्री वललभसुतके वदन कमल को दर्शन कीजे ॥
तीन-लोक-बंदित पुरुषोत्तम उपमाहि पटतर दीजे ।।१॥
श्रीवल्लभकुल उदित चंद्रमा यह छबि नयन चकोर पीजे ॥
नंददास श्री वललभसुत पर तनमनधन न्योछावर कीजे ॥२॥। | Gokulnathji | NityaPad-008 | Bibhaas |
Praatasmein srimukh dekhanko sevakjan thaade singhdwar . jaya | प्रातसमें श्रीमुख देखनको सेवकजन ठाडे सिंघद्वार । जय
जय जय श्रीवल्लभनंदन दरशन दीजे परमउदार ॥ १॥ सौभगसीमा सुंदरता शोभा
मेघगंभीर गिरा मृदु धार ॥ निरखत नयनन मोह्यो मनन््मथ श्रवणन सुनत वचन
अपार ॥२॥ नयनमंगल श्रवणन मंगल यश पुरुषोत्तमलीला अवतार ॥ जन
भगवान पिय कुंजविहारी अगणितमहिमा अगम अपार ॥। ३॥ | Gokulnathji | NityaPad-008 | Bibhaas |
Praat samein srivallabh suta koo uthtahin rasna leejiye naam .. | प्रात समें श्रीवललभ सुत को उठतहिं रसना लीजिये नाम ॥
आनंदकारी प्रभु मंगलकारी अशुभहरण जनपूर णकाम ॥| १॥ याहि लोक परलोक
के बंधु को कहि सके तिहारे गुण ग्राम ॥। नंददास प्रभु रसिक शिरोमणि राज
करो श्री गोकुलसुखधाम ॥२॥। | Gokulnathji | NityaPad-008 | Bibhaas |
Visad sujas srivallabh sutkau, praatah uthat nita anudin gaauun. | विसद सुजस श्रीवल्लभ सुतकौ, प्रातः उठत नित अनुदिन गाऊं।
कलिमल-हरन चरन चित धरिके, उपजै परम सुख दुःख बिसराऊं ॥
भक्ति भाव अरू, भक्तनि कौ रस, जानें मान तिनहिं को ध्याऊं।
छीत-स्वामी' गिरिधारीजू के सुमिरत, अष्ट सिद्धि, नव निधि को पाऊं॥ | Gokulnathji | NityaPad-008 | Bibhaas |
Merey kulkalmash sabahi naase dekh prabhaat prabhakarkanya ... | मेरे कुलकलमष सबही नासे देख प्रभात प्रभाकरकन्या ॥।
वे देखो पाप जात जिततितते ज्यौं मृगराज देख मृगसन््या ॥१॥
पोषत दे पयपान पुत्रलों हे जगजननी धन्य सुधन्या ॥
दियो चाहे गदाधरहुकों चरनकमलनिजभक्ति अनन्या ॥२॥ ' | Shree Yamunaji | NityaPad-009 | Bibhaas |
Douu coole khambh tarang seedhi sriyamuna jagat baikunthanishreni .. | दोऊ कूल खंभ तरंग सीढी श्रीयमुना जगत बैकुंठनिश्रेनी ॥
अति अनुकूल कलोलनके भर लियें जात हरिके चरणन सुखदेनी ॥१।।
जन्मजन्मके पाप दूरकर काटत कर्मधर्मधारपैनी । छीत-स्वामि गिरिधरजूकी
प्यारी सांवरेअंग कमलदलनैनी ।।२॥॥ | Shree Yamunaji | NityaPad-009 | Bibhaas |
Deen zaan mohi deeje yamuna .. nandkumar sadaa barr mango gopinki daasi mohi keeje ....|1.... | दीन जान मोहि दीजे यमुना ॥ नंदकुमार सदा बर मांगो गोपिनकी दासी मोहि कीजे ।॥।|१॥॥
तुम तो परम उदार कृपानिधि चरण शरणसुखकारी ॥ तिहारे वश सदा लाडलीवर तब तट क्रीडत गिरिधारि ॥२॥
सब ब्रजजन विरहत संग मिल अद्भुतरासविलासी ॥ तुमारे पुलिन निकट कुंजनद्रम कोमल शशी सुबासी | ३॥।
ज्यौं मंडलमें चंद बिराजत भरभर छिरकत नारी॥ श्रमजल हसत नहात अतिरसभर जलक्रीडा सुखकारी ॥।४॥
रानीजीके मंदिरमें नित उठ पाय लाग भुवनकाज सब कीजे | परमानंददास दासीव्हे नंदनं दन
सुख दीजे ॥॥५॥। | Shree Yamunaji | NityaPad-009 | Bibhaas |
Atimanjul jalpravaah manohar sukh avagaahat vidit raajatati taraninandini .. | अतिमंजुल जलप्रवाह मनोहर सुख अवगाहत विदित राजतअति तरणिनंदिनी ॥
श्यामवरन झलक रूपलोललहरवर अनूप सेवितसंतत मनोजवायुमंदिनी ॥१॥
कुमुदकुंजजन विकास मंडित दिसदिस सुबवास कुंजत अलिहंसकोक मधुरछंदिनी ॥
प्रफुल्लित अरविंदपुंज कोकिलकलसारगुंज गावत अलिमंजुपुंज विविधवंदिनी ॥२॥
नारदशिवसनकथध्यास ध्यावत मुनि धरत आस चाहत पुलिनवास सकलदुःख निकंदिनी ॥
नाम लेत कटत पाप मुनिकिन्ननऋषिकलाप करत जाप परमानंद महाआनंदिनी ॥३॥ | Shree Yamunaji | NityaPad-009 | Ramkali |
Prafullit bunn vividharang jhalkat yamunatanrag saurabh ghana aamodit atisuhavno .. | प्रफुल्लित बन विविधरंग झलकत यमुनातंरग सौरभ घन आमोदित अतिसुहावनो ॥
चिंतामणि कनकभूमि छबिअद्भुत लता झूमि सीतलमद अतिसुगंध मरुत आवनो ॥ १॥
सारसहंस शुकचकोर चित्रित नृत्यत सुमोर कलकपोत कोकिलाकल मधुर गावनो ॥
जुगल रसिकवर विहार परमानंदछबिअपार जयति चारुवृंदावन परम भावनो ॥। २॥॥ | Shree Yamunaji | NityaPad-009 | Ramkali |
Sriyapunaji patit paavan karye || | श्रीयपुना जी पतित पावन कर्ये ||
प्रथमही जब दियो दरसन सकलपातक हर्ये ॥१॥
जलतरंगन परस कर पयपान सो मुख भर्ये ॥
नाम सुमरत गई दुरमति कृष्णजस विस्तर्ये ॥ २॥
गोपकन्या कियो मजन लालगिरिधर
बर॒यो ॥ सूर श्रीगोपाल सुमरत सकल कार्य सर्ये ॥। ३॥। | Shree Yamunaji | NityaPad-010 | Ramkali |
Yeh jamuna gopalahi bhaaven .. | यह जमुना गोपालहि भावें ॥
जमुना जम्तुना नाम उचारत धर्मराज ताकी न चलावबें ॥१॥
जे जमुनाको जान महातम वारंवार प्रणाम करे |॥।
ते जमुना अवगाहनमज्जन चिंतित ताप तनकेजु हरे ॥२॥
पद्मपुराण कथा यह पावन धरनी प्रति वाराह कही ॥
तीर्थमहातम जान जगतगुरु सो परमानंददास लही ॥३॥ | Shree Yamunaji | NityaPad-010 | Ramkali |
Yeh prasaad houn paaruun sreejmunaji .. | यह प्रसाद हों पारऊं श्रीजमुनाजी ॥
तुम्हारे निकट रहा निशवासर रामकुष्णगुन गाऊं।।१॥
मजन करूं विभलजलपावन चिंताकलेस बहाऊं ॥
तिहारी कृपातें भानुकी तनया हरिपद प्रीत बढाऊं ॥२॥
बिनती करोंयही बर मागों अधमन संग बिसराऊं ।॥।
परमानंदप्रभु सबसुखदाता मदनगोपाल लडाऊं ॥३॥ | Shree Yamunaji | NityaPad-010 | Ramkali |
Tihaaro daras mohi bhaave sriyamunaji .. |
