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Kirtan Title | Kirtan | Category | Book-Page# | Raag |
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Seetal khaskhaanau atee hii suhaanon maanon .. maanon hemant ritu | सीतल खसखानौ अति ही सुहानों मानों ॥ मानों हेमंत ऋ तु
गेह रूप धरे आय ता मधि बेठें बालकृष्ण सारंग मधुरे धुनि बीन सरस राग रंग
बरसानों ॥१॥ छूटत फुहारे नाना बिथि हौद भरे भारे चादरन की धुनि चहूं
औरनों ॥ निरतत मोर कोकिला सोर दामिनि सी प्यारी घनस्याम संग रंग भरी
सावन सौं सुख सरसानों ॥२॥ | Khaskhane | NityaPad-249 | Saarang |
Assie dhoopanmein piyajaane naan | एसी धूपनमें पियजाने न
देऊंगी ॥ विनती करजोर प्रियाके हांहां खात तेरे पैयां परुगी ॥१॥ तुमतो कहावत
फूल गुलाबके संगके सखा ग्वालन गारी दऊंगी ॥ परमानंददास को ठाकुर करतें
मुरलीयां अचक हरुगी॥२॥ | Khaskhane | NityaPad-249 | Saarang |
Usirmahal bethe piyapyari | उसीरमहल बेठे पियप्यारी
गावत तान तरंग ॥ सा री ग म प ध नि अलाप करत सुर तीनग्राम इकबीस
मूरछना संग ॥१॥ कंठबांह जोरि नवलघूंघट खोल नैनन सैनन बहुरंग ॥
तानसेनके पिया हे बहुनायक रीझरीझ बार देत मानिनी मानभंग ॥२॥ | Khaskhane | NityaPad-250 | Saarang |
Apane apane gharke kinwar dekein soy rahey | अपने अपने घरके किंवार देकें सोय रहे
ऐसेमें तू क्यों न रहीरी।। सूर आयो सिर पर छाया आई पायन तर बाटके बटाउ
धूप देखके झूकेरी ॥१॥। पहेरे तन श्वेत सारी मोतिनकी मालगरे सोल्हे सिंगार
अंग क्यों न सजेरी ॥ सूरदास मदन मोहन तलफत जेसे चात्रक मीन माघकी
मध्यरात्र जेसें ज्येष्ठ की दुपहरी ॥२॥ | Khaskhane | NityaPad-250 | Saarang |
Kese kese aaye merey | केसे केसे आये मेरे
गेहठीक दुपहरिकी झकनिमें ॥| चंबर ढुराउं सेज बिछाउं श्रमकनि झलकत देह ॥१९॥
श्रमनिरवारीये अरगज़ा लेपन करो काहेको करत संदेह ॥ रसीक प्रीतम याहीतें
कहावत सूर सुफल करो नेह॥२॥ | Khaskhane | NityaPad-250 | Saarang |
Jyeshth maas tapat ghaam | ज्येष्ठ मास तपत घाम
कहांकुं सिधारो लाल ऐसी कोन चतुर नार बाको बीरा लीनों ॥ नेंकतो कृपा
कीजे हमहुँको दरश दीजे जाईये फीर बाके धाम जासु नेह नवीनों ।।९॥ बांह
पकर भवन लाई शबय्यापर दीये बेठाई अरगजा लगाय अंग हियो सीतलकीनो ।।
रसिक प्रितम कंठलाय लीनों रससों मिलाय अरस परस केलि करत प्रीतम
बसकीनों ॥२॥ | Khaskhane | NityaPad-250 | Saarang |
Rachyon khaskhaanon aaj atee taamein raaje | रच्यों खसखानों आज अति तामें राजे
रावटी उसीर नीर छीरक छबीली ॥ छुटत फुहारे चार जल गुलाब भरि
अपार निरख थकित छबि जोबन खीली ।॥॥९॥ अरगजा चर्चति चंदमुख ी
चहुं ओर ठाडी चतुर चमेली बेला राय बेली मालती कर सोहे ॥ श्वेत बसन
अति सुवास बरनत छबि नंददास निपट निकट कोटि मनमथ मोहे ॥२॥ | Khaskhane | NityaPad-250 | Saarang |
Searey tahakhaane taamein khaase khaskhaane seenche attar gulabaki | सीयरे तहखाने तामें खासे खसखाने सींचे अत्तर गुलाबकी
ब्यारहु लसतहे ॥ भुधर भुहारे भारे छूटत फुहारे सारे तामें बैठे दंपति डुब
दपटतहे।॥। १ ॥ एसेमें गवन कैसे कीजेहो मेहवासि कान्ह सोंधेकी तरंग प्यारी
अंग लपटत हे ॥ चंदन किंवार घनसारकी गार मानों ताउ आन ग्रीष्मकी झार
झपटतहे ॥॥२॥ | Khaskhane | NityaPad-250 | Saarang |
Saurabh saras sunny seetal nava banaa rawati subhag useer .. | सौरभ सरस सनी सीतल नव बना रावटी सुभग उसीर ॥
बारबार छिरकत चंद्रावलि निरख नेंन सुंदर बलवीर ॥१॥ पंखा करत नार
रसभीनी पहर अरगजा स्वेत सुचीर ॥ निरख निरख बलजाय गदाधर छूटत
धार फुआरन नीर ॥२॥ | Khaskhane | NityaPad-251 | Saarang |
Sur sutaa key kull douu | सुर सुता के कुल दोऊ
मिल बेहेरत ॥ गुलाब कुसम कुसमनजो सवारी सेज हींडोरा करत ॥१॥ धर्यों
अरगजा सुगंध मिलाप ॥। त्रिविध पवन मन हरत ॥| कुसम माल ताहा: गुहें गुहें
राखी कुसम बिजना हलत ॥२॥ सखी सबे छीरकाव करतहे मानो पावस बरखत ॥
होद फुहारे ऊड़त हजारे घनसावन सोझरत ॥३॥ सुरमंडल ओर बिन
'मिलावत: वामसारंग सुर भरत॥ मधुर मधुर तहां मृदंग बजावत: तानन तालन
परत ॥४॥ सखी सबे सिंगार बनावत: ऊपमां को मनधरत ॥ परमानंदको भाव
कुँज मध: पग घुंघरू बजत।॥।५॥ | Khaskhane | NityaPad-251 | Saarang |
Bunny rawati aaj anupam naval | बनी रावटी आज अनुपम नवल
उसीर सीतल अतिसार ॥ बेठेहें पियप्यारी दोउ पहर अरगजा सरस सुधार ॥१॥
'करत ब्यार नार नव ललिता निरखत रूप सुधा न अघाय ॥ रसिक प्रीतम जुग
केलि करत जल जुगजुग दसदीस रह्यो जस छाय ॥२॥ | Khaskhane | NityaPad-251 | Saarang |
Atee suvas seetal mehel usirsar chhirkat barbar atee | अति सुवास सीतल मेहेल उसीरसार छिरकत बारबार अति
सुकुमारि ॥ भर गुलाब जल फुआरे छूटत दरदरीन चंदन छिरक छेल पहर एवेत
सारी ॥१॥ वबारवार त्रन तोरे गोकुलचंदपर स्यथाम सलोने संग चितव॒त चोरे ॥
छीतस्वामी गिरिवरधर विट्वलेश पद प्रताप निरखत नेंन रस बस सब सिरमोरे॥। २॥ | Khaskhane | NityaPad-251 | Saarang |
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