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Kirtan Title | Kirtan | Category | Book-Page# | Raag |
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Aaee huun abahin dekh subhag sunder bhekh thaado .. larka aeka rupco bhee varo ..1.. | आई हुं अबहीं देख सुभग सुन्दर भेख ठाडो ॥ लरका एक रूपको भी वरो ॥१॥
परदनी फवत पटुका कंठपर रुरत कर वनमाल माई बदन नांई भांवरो ॥२॥
नीर यमुनातीर भर धरी गागरी जबहीं उठाय देत देखत सब गांवरो । टोकत
आवत जात नरनारी कहत युं कियो कारज भलो भरत नहिं भामरो ॥॥२॥ टरत
केसें अंक लीख्यो मम भाग्यमें कहेवो करो कोउ धरत मेरो नांवरो । दास परमानंद
नंदनंदन कुंवर हृदय में बसत माई मेरे री सांवरो ॥५॥ | Panghat | NityaPad-273 | Hameer |
Yeh kaun tave teree kanhaiya jabtab maarg roke .. | यह कौन टेव तेरी कन्हैया जबतब मार्ग रोके ॥
कैसेके पनिया जाय युवतीजन आडोई ठाडोहै कुलट लिये दृूग झोके ॥१॥
कबहुंकपाछेतें गागर डार देत ऐसें बजाबे तारी जैसें कोऊ चोंके ।|
रसिक प्रीतमकी अटपटी बातें सुनरी सखी समझ न पर वाकी नोंकें ॥२॥ | Panghat | NityaPad-273 | Saarang |
Jamuna jall bharan gaee, dekhat jeeye sakuch rahee | जमुना जल भरन गई, देखत जीये सकुच रही
पनघट पर देख्यों नंद दुलारो ॥ सुंदर स्थाम तन सुदेस नटबर वपु तरन वेस
मल्ल काछ पीत बसन कनक बरन टिपारो ॥१॥ चंदन की खोरू अरगजा अंग
अंग फव्यो लकुट लीए करन कमल लागति अति प्यारो ॥ 'कृष्णदास' सुख
की रासि गोपीजन बसत हीये त्रिविध ताप दुर होत बानिक जो निहारो ॥२॥। | Panghat | NityaPad-273 | Saarang |
Bhari-bhari dhari-dhari aavat gagar tuu kaun key russ bharee ! aur dinan tum ekahi | भरि-भरि धरि-धरि आवत गागर तू कौन के रस भरी ! और दिनन तुम एकहि
बिरियां जात ही पनियां आज केऊ बेर गई ऐसे कहा भयो बिनु देखे हरी ॥१॥।
जो तू सास ननद की काम करेगी तो तू अपने कुल डरेगी री ॥ 'हरिदास ठाकुर
को प्रभु है रूप विमोहन नैन प्रान गये सब ढरेगी री ॥२॥ | Panghat | NityaPad-274 | Sorat |
Arey dhota bhar dere yamuna jall merrie soun tuun motan chitey chore .. | अरे ढोटा भर देरे यमुना जल मेरी सों तूं मोतन चिते चोरे ॥
मेरे संगकी दूर निकस गई मोहि एक ठाडी कीनी भरि ये गागर जिन रित बोरे ॥१॥
वाटघाट में रोकत झगरत रही रेनवितवोरे ॥
कृष्ण जीवन लछीराम के प्रभु माई अकेली जान जिन भिटवोरे ॥२।। | Panghat | NityaPad-275 | Nat |
Jalakon gaee sughat neh bhar laaee parihai chatpati darshaki .. | जलकों गई सुघट नेह भर लाई परीहै चटपटी दरशकी ॥
इत मोहनगास उत गुरुजनत्रास चित्रलिखी ठाढी नांमधरत सखी परस की ॥१॥।
टूटे हार फाटेचीर नयनन बहेत नीर पनघट भई भीर सुध न कलशकी ॥।
नंददासप्रभुसों ऐसी प्रीत गाढ़ी बाढ़ी फेलपरी चायन सरस की ॥२॥ | Panghat | NityaPad-275 | Adano |
Saanvaro dekhat roop lubhani . chaley ree jaat chityori motan taba tey sanga | साँवरो देखत रूप लुभानी । चले री जात चितयोरी मोतन तब ते संग
लगानी ॥१॥ वे वहि घाट पिवावत गैया हों इतते गई पानी । कमलनैन उपरेंना
फेर्यो 'परमानन्द' हि जानी ॥२॥ | Panghat | NityaPad-275 | Hameer |
Aavat sir gagar dharey bharey jamuna jall marag mille mohi nandju koo nandana . | आवत सिर गागर धरे भरे जमुना जल मारग मिले मोहि नंदजू को नंदना ।
सुधि न रही री ता छिन तेसुनिरी सखी देख्यो नैनन आनंद को कन्दना ॥१॥
चित तें कछु न सुहाय गेह हू रह्मो न जाय मेरी दिसि चितवत डागूयो मोपै फंदना ॥
नन््ददास' प्रभु कों जो तू मिलावै तो हां तोकों सरबस अरपि के पू जों तौ चंदना ॥२॥ | Panghat | NityaPad-275 | Hameer |
Kabaten chully yeh reeti rahat panghat parr thaado .. | कबतें चली यह रीति रहत पनघट पर ठाडो ॥
जाति पांति कुल कौन बडो है दसेक गैया बाढो ॥॥१ ॥
नंदबाबा जिन ऐसे सिखये जो करि अँखि मोहुकों काढो ॥
नन्ददास' प्रभु जैसे मृगी लों रूप गढो प्रेम फंदा गाढो ॥२॥ | Panghat | NityaPad-275 | Kanharo |
Joe tuu achhan achhan pug dharanidhare .. | जो तू अछन अछन पग धरणीधरे ॥
निश अंधियारी कोऊ नहीं जानत नूपुरध्वनि जिन प्रकट करें ॥१॥
किसलयदल कुसुमन की शय्या रची चल निहार नवकुंजघरें ।
चतुर्भुजदासस्वामिनी वेग चल रसिकराय गिरिधरन बरें ॥२॥। | Utthapan | NityaPad-276 | Nat |
Paachhen lalita aagein shyama pyaari taaagen piya maaragamen phool 'bichhaavat jaat .. | पाछें ललिता आगें श्यामा प्यारी ताआगें पिय मारगमें फूल 'बिछावत जात ॥
कठिन कली बीन करत न्यारीन्यारी प्यारी के चरण कोमल जान सकुंचत गढवेहू डरात ॥१॥
अरुझी लता अपनेकर निरवारत ऊँचे ले डारत द्रम पल्लव घात ॥
सूरदासमदनमोहन पियकी आधीनताई देखत मेरे नयन सिरात ॥२॥ | Utthapan | NityaPad-276 | Nat |
Sandesh naan abke saho pyaare lalana manini maan tyajat.. | संदेश न अबके सहो प्यारे ललना मानिनी मान त्यजत॥
केतीवार तुमहों पठाईजू अनेक यतन करहौं समुझाई उन अपने जियजु कोटिक बात सचत ॥१॥
कितनी दूर कुंजकुटीकी ओट आपन चलियेजू जीत्यो चाहो रतिपति ॥
गोबिंदप्रभु आये दूतीके पाछें पाछें प्यारीके निकटहवे कछु नयनन मुसकति ॥२ | Utthapan | NityaPad-276 | Nat |
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