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Kirtan Title
Kirtan
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Raag
Aage gaay paachhe gaay ita gaay uta gaay
आगे गाय पाछे गाय इत गाय उत गाय गोविंद को गायन में बसबोई भावे ॥ गायन के संग धावे गायनसों सचु पावे गायन की खुर रेणु अंग लपटावें ॥१॥ गायनसों ब्रज छायो वैकुंठ विसरायो गायन के हेत कर गिरिले उठाबे ॥ छीतस्वामी गिरिधारी विट्ठलेश बपुधारी ग्वारिया को भेखधरें गायन में आबे ॥२॥
Aavni
NityaPad-279
Poorvi
Aagein krishna paachhen
आगें कृष्ण पाछें कृष्ण इत कृष्ण उत कृष्ण जित देखो तित कृष्ण मईरी ॥ मोरमुकट धरें कुंडल किरण धरें मुरली मधुरध्वनि तान नईरी ॥१॥ काछिनी काछें लाल उपरैना पीतपट तिहें काल शोभा देख थकित भईरी ॥ छोीतस्वामी गिरिधरन श्रीविद्धल निरखत छबि अंग अंग छईरी ॥२॥
Aavni
NityaPad-279
Poorvi
Yashoda kaahe naan mangalgave ..
यशोदा काहे न मंगलगावे ॥ पूरण ब्रह्म सकल अविनाशी ताकों गोद खिलावे ॥ १ ॥ कोटि कीट ब्रह्मांडकों करता मुनिजन जाकों ध्यावे ॥ ना जानूं ये कौन पुण्यते सो तेरी धेनु चरावे ॥२॥ ब्रह्मादिक सनकादिक नारद जपतप ध्यान न आवे ॥ शेषसहस्रमुख जपत निरंतर हरिको पार न पावे ॥३॥ सुंदरवदन कमलदललोचन गोधन के संग आवे ॥ करत आरती मात यशोदा सूरदास बलजाबे ॥४॥
Sandhya Aarti
NityaPad-279
Gori
Peet pichhori kahanjo bisari
पीत पीछोरी कहांजो बिसारी ये तो लाल ढिंगनकी ओढेहे 'काहुकी सारी ॥१॥ हों वाहि घाट पिवावत गैया जहां भरत पनिहारी ॥ भीरभई मैया सब बिडरी मुरली भली जो संवारी ॥२॥ हों ले भज्यो और काहुकी वे ले गई जो हमारी ॥ परमानंद बलबल बतियनपर तन तोरत महतारी ॥३॥।
Useer Bhoj Darshan
NityaPad-279
Saarang
Aarti yugal kishorki keeje ..
आरती युगल किशोरकी कीजे ॥ तन मन धन न्‍्योछावर दीजे ॥१॥ गौरस्याम मुख निरखत जीजे ॥ प्रेमस्वरूप नयनभर पीजे ॥२॥ रवि शशि कोटि बदनकी शोभा ॥। ताहि देखत मेरो मनत्नोभा ॥३॥ नंदनंदन वृषभान किशोरी ॥ परमानंदप्रभु अविचल जोरी ॥४॥
Sandhya Aarti
NityaPad-279
Gori
Aarti karati jasumati mudit laal koo .
आरती करति जसुमति मुदित लाल को । दीप अद्भुत जोति, प्रगट जगमग होति वारि वारति फेरि अपनें गोपाल को ।। बजत घंटा ताल, झालरी संख-धुनि निरखिि ब्रज-सुंदरी गिरिधरनलाल कों ॥ भई मन में फूलि गई सुधि-बुधि भूलि 'छीत-स्वामी ' देखि जुबति-जन-जाल कों ॥
Sandhya Aarti
NityaPad-279
Gori
Haake hataki hataki gaay thathaki thathaki rahee
हाके हटकि हटकि गाय ठठकि ठठकि रही गोकुलकी गली सब सांकरी ॥ जारी अटारी झरोखन मोखन झांकत दुरदुर ठौरठौरते परत कांकरी ॥ १ ॥ चंपकली कुंदकली वरषत रसभरी तामेंपुन देखियत लिखेसे आंकरी ॥ नंददासप्रभु जहींजहीं द्वारें ठाढे होत तहीं तहीं बचन मांगत लटक लटक जात काहूसों हां करी काहूसों ना करी ॥३॥
Aavni
NityaPad-279
Poorvi
Dekho gopalki aavan ..|
देखो गोपालकी आवन ॥| कमलनयन स्यामसुंदर मूरति मन भावन ॥१॥ वही सुंदर सीसमुकुट गुंजामणिलावन ॥ परमानंदस्वामी गोपाल अंग अंग नचावन ॥२॥
Aavni
NityaPad-279
Poorvi
Dhenan koo dhyaan nisdin
धेनन को ध्यान निसदिन मेरे प्रीतम को स्वप्ने कहत गोरी गायन आई ॥ आनन उजारी बनवारीजु सम्हारि लाउ वा बिन न रहुंगो तो बाबा की दुहाई ॥१॥ कजरारी कंठवारी मखतुल फोंदावारी झांझर झनकारी प्यारी मो मन भाई ॥ जगन्नाथ कविराय के प्रभु हो तो झुकी चिरजीबोकन्हाई ॥२॥
Aavni
NityaPad-279
Kanharo
Murali adhar dharey aavat hari harehare gawat rasik taana surbhi sangaline ...
मुरली अधर धरे आवत हरि हरेहरे गावत रसिक तान सुरभी संगलीने ॥। मोरपच्छ सीसमुकुट मकराकृतकुंडल छबि बैजयंतीमाल अंगचंद नहीं दीने ॥ १ ॥ काछिनी कटि नूपुरपद निपट बचन अटपटे नटवरवपु ग्वालसंग शोभित रसभीने ॥ गोविंदप्रभु गिरिवरधर ग्वालिन विधकित रही धावत मुखबारिज ऊपर मधुकर दृग कीने ॥२॥
Aavni
NityaPad-280
Poorvi
Aavat baney kaanh gopbalak sanga nechuki khurr renu chhurat alkawali ..
आवत बने कान्ह गोपबालक संग नेचुकी खुर रेणु छुरत अलकावली ॥ भ्रूह मममथचाप वबक्र लोचन बाण सीस शोभित मत्त मयूर चंद्रावली ॥१॥ उदित उड्डराज सुंदर शिरोमणि बदन निरख फूली नवल युवति 'कुमुदावली ॥| अरुण सकुचत अधरबिंबफल उपहसत कछुक प्रकटित होत कुंद दशनावली ॥२॥ श्रवण कुंडल तिलक भाल वेसरनाक कंठ कौस्तुभमणि सुभग त्रिवलावली ॥ रत्नहाटक जटित उरसि पदकनपांत बीच राजत सुभग झलक मुक्तावलि ॥३॥ वलय कंकण बाजूबंद आजानु भुज मुद्रिकाकरतल विराजत नखावली ॥ क्वणितकर मुरलिका मोहित अखिल विश्व गोपिका जनमनसि ग्रथित प्रेमावली ॥४॥ करटिश्षुद्रघंटिका जटित हीरामणि नाभि अंबुजवलित भृंग रोमावली ॥ धाय कबहुक चलत भकतहित जान पियगंडमंडित रुचिर श्रमजल कणावली ॥॥५॥ पीत कौशेय परिधान सुंदरअंगचलत नूपुर बजत गीत शब्दावली ॥ हृदय कृष्णदास गिरिवरधरनलालकी चरण नखचंद्रिका हरत तिमिरावली ॥६॥
Aavni
NityaPad-280
Gori
Banate baney aavtal madangopal .. nrityat
बनते बने आवतल मदनगोपाल ॥ नृत्यत हँसत हँसावत किलकत संग मुदित ब्रजबाल ॥१॥। वेणु चंग मुर॒ज उपंग चलत विविध स्वर ताल ।। बजत अनेक बेणु रव सो मिलक्वणित किंकिणी जाल ॥२॥ यमुनातट बट निकट नवल रस मंद समीर सुढाल ॥ राका रेणुबिमल शशि क्रीडत नंदरायके लाल ॥३॥ स्याम सुभग तन कनक कपिश पट उरलंबित वनमाल परमानंदप्रभु चतुर शिरोमणि चंचल नयनविशाल ॥|४॥
Aavni
NityaPad-280
Gori

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