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Kirtan Title | Kirtan | Category | Book-Page# | Raag |
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Meromai arritayohai balgovinda .. | मेरोमाई अरृटयोहै बालगोविंदा ।।
गहि अचरा मोहि गगन बतावत खेल नको मांगे चंदा ॥१॥
भाजनमें जल मेल यशोदा लेकर चंद दिखावे।॥।
रुदन करत पानी में ढूंढत चंद धरनी कैसे आबे ॥ २॥
दूधदही पकवान मिठाई जो कछु मांगेंसो देहों स्िलोना॥।
लहटु चकई पाटके लटकन मांगलेहु मेरे छोना ॥३॥
दैत्यदलन गजदंत उखारे केसी कंस निकंद ॥
सूरस्याम बलजाय यशोदा सुखसागर के कंद ॥|४॥ | Chandra Prakash | NityaPad-293 | Iman |
Laal yeh chandaa leho .. kamal nayan baljaay yashoda niconec chiteho ... 1.. | लाल यह चंदा लेहो ॥ कमल नयन बलजाय यशोदा नीकोनेक चितेहो ॥। १॥
जा प्रकार तुम सुन सुंदर वर कीनी इतनी अनेहो ॥। सोई सुधाकर
देख दामोदर या भाजनमें लेहो ॥।२।।
नभतें निकट आन राख्योहै जलपुट यतनजुगहेहो ॥
ले अपने कर काढ चंदको जो भावें सो केहो ॥| ३॥
गगन मंडलतें गहिआन्योहै पंछी एक पठेहो ॥
सूरस्याम प्रभुडतनी बातको कित मेरो लालहठेहो॥४॥ | Chandra Prakash | NityaPad-293 | Iman |
Huun duhi houn mohi duhan | हूं दुहि हों मोहि दुहन
सिखावो ।। कैसे गहत दोहनी घुटुरुवन कैसे ले वछरा हाथनलावो ॥। १॥ कैसे लें
नोई पग बांधत कैंसे वाय चरण अटकावो ॥ कैसे धार दूधकी वाजत सोसोबिधि
तुम मोहि बताबो ॥।२॥ निपट भई अब सांझ कन्हैया गायनकी कहुँ चोट लगावो |
सूरस्थामसों कहत ग्वाल यों धेनु दुहन भोरहीं उठ आवो ॥।३॥ | Saanjh Samay Gaiya | NityaPad-294 | Gori |
Kaanh tihari sohon aaoongi.. | कान्ह तिहारी सोहों आऊंगी।।
सांझ संझोखन खिरक वछरु वन स्थाम समो जो पाऊंगी ॥१॥
जो मेरे भुवन भीर नहीं हवै है तो हों तुमहि बुलाऊंगी ॥
बाल गोपाल बुलावन के मिष ऊंचे स्वरसों गाऊंगी ॥२॥
होत अवार दूर मोहि जेवो उत्तर कहा बनाऊंगी॥
कुंभनदासप्रभु गोवरधनधर अधर सुधा रसप्याऊंगी ।। ३॥॥ | Saanjh Samay Gaiya | NityaPad-294 | Gori |
Nirakh mukh thaadhi haveju hans .. | निरख मुख ठाढी हवेजु हँस ॥
धोरी धेनु दुहत नंदनंदन लाडिली हियमें बसे ॥१॥|
सेली हाथ वछरुवा मिलवत कौन कौन छबि लागें ॥
मोचत धार दोहनी चांपत मानों उपजत अनुरागें ॥२॥
यह लीला ब्रह्मा शिव गाई नारदादि मुनि ग्यानी ॥
परमानंद बहुत सुख पाथो अरु शुक व्यास बखानी ॥। ३॥। | Saanjh Samay Gaiya | NityaPad-294 | Gori |
Jaa dinate gaiya duhi deeni ..| | जा दिनते गैया दुहि दीनी ॥|
ता दिनते आपको आपकी मानहुंचिते ठगोरी लीनी ॥१॥
सहज स्थाम करधरी दोहनी दूध लोभ मिष विनती कीनी !।
मृदु मुसकाय चितेंकछु बोले ग्वाल निरख प्रेम रस भीनी ॥॥ २॥
नित प्रति खिरक सवारे आबत लोकलाज मानों घृतसोपीनी ॥
चतुर्भुज प्रभु गिरिधर मनमोहन दरसन छलबल सुधि बुधि छीनी ।।३॥ | Saanjh Samay Gaiya | NityaPad-294 | Gori |
Mangeri mopein chand khilona .. | मांगेरी मोपें चंद ख्िलोना ।।
बरज रही बरजो नहीं मानत ऐसो हठीलो जसुमतिजुको छोना ॥।१॥
लें प्रतिबिंब दिखावत जननीरें रें रें मेरे चपल दिठोना ॥
सूरदासमोहन हठ ठान्यो गिरिवरथर्यों जेसें करपर दोना ॥ २॥। | Chandra Prakash | NityaPad-294 | Kanharo |
Ghaiya peevat sunder sthaam .. | घैया पीवत सुंदर स्थाम ॥
मथ मथ देत मात यशोदा रुचिसों लेत घनस्याम॥।१॥
जल अचवाय बदन फिर पोंछयो आभूषण सब धरे उतार ॥ ।
सूक्षम भूषण रहे अंग प्रति सो छबि निरख जननी बलहार ॥२॥
दूध भात फिर दियो रोहिणी रुचिसों खात मनोहर बाल ॥
जल अचवाय बीरी दई जननी यह छबि निरखत रसिकनिहाल ॥३॥ | Saanjh Samay Gaiya | NityaPad-294 | Gori |
Kaanh hamari duhi deeje gaiya... | कान्ह हमारी दुहि दीजे गैया।॥
तुमही जान सतभाय लडैंते नित उठ पठबत मैया ॥१॥
सब कोऊ कहत परम उपकारी संकरषणको भैया ॥
लेहु कमलकर दोहनी नंदनंदन होंहु लेहूं बलैया ॥ २॥।
तुम्हारे दुहेते हमारो पूजत बहुते दूध बहोते घृतघैया ॥।
चतुर्भुजप्रभु कृपा करो हो नित गिरि गोवरधन रैया ॥३॥ | Saanjh Samay Gaiya | NityaPad-295 | Gori |
Govind teree gaay atibaadhi .. | गोविंद तेरी गाय अतिबाढ़ी ॥
सुन ब्रजनाथ दूधको लालच मेलसकों नहीं लाढी ॥।१॥
आपनी इच्छा चरें उजागर शंक नकाहुकी माने ॥।
तुम्हें पत्याय स्थाम सुंदर तुम्हारो कर पहिचाने ॥२।।
ऊंचेकान करत मोय देखत उज़्क उज्कक होय ठाडी ॥
परमानंद नंदन के घरकी बालदशाकी बाढ़ी ।। ३॥ | Saanjh Samay Gaiya | NityaPad-295 | Gori |
Dhota kaunako manmohan .. | ढोटा कौनको मनमोहन ॥
संध्यासमें खिरकमें ठाडे सखी करत गोदोहन ।॥।१॥
ग्वालनी एकपाहुनी आई देख ठगीसी ठाड़ी ॥
चित चल गयो मदन मूरतीपै प्रीति निरंतर बाढ़ी ॥ २॥।
चलभ सकत पग एक सुंदर चितचोर्यों ब्रजनाथ ॥|
परमानंद दास वहजानें जिहिखेल्यो मिल साथ ॥ ३॥ | Saanjh Samay Gaiya | NityaPad-295 | Gori |
Neck pathey giridharjookon maiya .. | नेक पठे गिरिधरजूकों मैया ॥
रही विन स्थाम पत्याय न काहूसूंघत नाहिनेअपनीलैया ॥।१॥॥
ग्वालवाल सब सखा संगके पचिहारे बलदाऊभैया ॥
हूंकहूंक हेरत सबही तन इनहीं हाथ लगी मेरी गैया ॥। २॥।
सुन त्रिय वचनकोरहाथहीं दुहूँ दिश चितवन कुंवरकन्हैया ॥
परमानंद बशुमति मुसकानी संगदियो मोकुलको रैया | Saanjh Samay Gaiya | NityaPad-295 | Gori |
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