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Kirtan Title
Kirtan
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Raag
Srivallabhacharansharan jaay sub sukh tuun lahey ray ..|
श्रीवललभचरणशरण जाय सब सुख तूं लहे रे ॥| रसना गुण गाय गाय दरशन प्रसाद पाय ओर काज त्याग भाग वल्‍लभरति गहे रे ॥१॥ रेन दिनचिंतत रहे “3 शी ५3 इनहीं के रूप रंग इनहीं रस वहि रे॥ श्री विद्डलगिरिधारी यहि रस भारी चाहेना जो चाहे जीये तो येही चाह चही रे ॥२॥
Ath Shree Mahaprabhuji
NityaPad-003
Bhairav
Ruchirtar bal‍labhadhishcharanam ..
रुचिरतर बल्‍लभाधीशचरणं ॥ अस्तु में सर्वदा सुंदराकृति जगन्मोहनं हदि विरहकरणं ॥१॥ विहितमायावादवादिजन जारजन्यसंगतात्मजनकुमतिहरणं ।| अखिलसाधनरहितदो षशतकलुषकर कुमतिभर भरितनिजदासशरणं ॥२॥। अंजसा कदंबपादपबहुपत्रयुतवासनाभंगभवजलधितरणं ॥। वद॒ति हरिदास इति सकलजनमात्रकृतिगोकुलाधीशपदकमलवरणं ॥ ३॥।
Ath Shree Mahaprabhuji
NityaPad-004
Ramkali
Srivallabh tanmandhan srivallabh sarvasva mein payeshrivallabhprabhu chintamani merey ||
श्रीवल्लभ तनमनधन श्रीवल्लभ सर्वस्व में पायेश्रीवल्लभप्रभु चिंतामणि मेरे || श्रीवल्लभ मम ध्यान ज्ञान श्रीवल्लभ विनभजु न आन श्रीवल्लभ हें सुखनिधान प्राण जीवन केरे ॥१॥ श्रीवल्लभ मोहिइष्टदेव सदा सेवूं श्रीवललभ चरचो चरणकमल श्रीवल्लभजूके चेरे।। छीतस्वामिगिरिवरधर तेसेई श्रीविद्वलेश श्रीवललभकी बल बल जाऊं वेरेवेरे ॥२॥।
Ath Shree Mahaprabhuji
NityaPad-004
Ramkali
Praatasame smarun srivallabh srivitthalnath param sukhakaari ..
प्रातसमे स्मरुं श्रीवल्लभ श्रीविद्ठलनाथ परम सुखकारी ।। भवदु:खहरण भजनफलपावन कलिमलहरण प्रतापहारी ॥ १॥॥ शरण आये छांडत नहिं कबहुं बांह गहेकी लाज विचारी ॥ त्यजो अन्यआश्रय भजों पदपंकज द्वारकेशप्रभुकी बलहारी ॥२॥।
Ath Shree Mahaprabhuji
NityaPad-004
Ramkali
Jopein srivallabh charan gahe !.
जोपें श्रीवललभ चरण गहे !। तो मन करत वृधा क्यों चिंता हरि हियें आय रहे ॥१॥ जन्म जन्म के कोटि पातक छिनहींमांझ दहे ॥ साधन कर साधो जिनको उस सब सुख सुगम लहे ॥२॥| कोटिकोटि अपराध क्षमा कर सदा नेह निवहे ॥ अब संदेह करो जिन कोऊ करुणासिंधु लहे ॥ ३॥॥ अबलो विन सेवें श्रीवललभ भवदु:ख बहुत सहे ॥ रसिक महानिधि पाय ओर फल मनवचक्रम न चहे ॥४॥।
Ath Shree Mahaprabhuji
NityaPad-004
Ramkali
Jaya shree vallabh charan kamal shir naaiye |
जय श्री वललभ चरन कमल शिर नाइये | परम आनन्द साकार शशी शरदमुख मधुर वानी भक्त जनन संग गाइये ।जय.।। राज तम छांड मध्य सत्व के संग गही राखि विश्वास प्रेम पंथ को धाइये।॥। कहे ब्रजाधीश वृंदाविपिन दंपति ध्यान धर धर हिये दृगन सिराइये ।|जय.॥
Ath Shree Mahaprabhuji
NityaPad-004
Bhairav
Srivallabh madhurakriti merey .
श्रीवल्लभ मधुराकृति मेरे । सदा बसो मन यह जीवनधन। सबहीनसों जु कहत हों टेरे ॥१॥| मधुर बदन अति मधुर नयनयुग। मधुर भ्रोंह अलकनकी पांत। मधुर भाल बीच तिलक मधुर अति। मधुर नासिका कही न जात ॥ २॥ मधुर अधर रसरूप मधुर छबि | मधुर मधुर अति ललित कपोल | मधुर श्रवनकुंडलकी झलकन | मधुर मकर मानो करत कलोल ॥।३॥ मधुर कटाच्छ कृपापूरन अति। मधुर मनोहर वचन विलास। मधुर उगार देत दासनकों। मधुर बिराजत मुख मृदु हास ॥४॥ मधुर कंठ आभूषणभूषित । मधुर उरस्थल रूपसमाज | अति विशाल जानु अवलम्बित | मधुर बाहु परिरंभन काज ।।५॥ मधुर उदर कंटि मधुर जानुयुग | मधुर चरण गति सब सुखरास | मधुर चरणकी रेनु निरन्‍्तर। जनमजनम मांगत हरिदास ॥६॥
Ath Shree Mahaprabhuji
NityaPad-005
Ramkali
Srivallabh srivallabh shree balalabh kripa nidhan atee udaar
श्रीवललभ श्रीवल्लभ श्री बललभ कृपा निधान अति उदार करुनामय दीनद्वार आयो ॥ कृपाभर नयनकोर देखीये जु मेरी ओर जन्म जन्म शोध शोध चरण कमल पायो ॥ १॥। कीरति चहूं दीश प्रकाश दूर करत विरहताप संगम गुण गान सदा आनन्द भर गाऊं ॥ विनती यह मान लीजे अपनो हरिदास कीजे चरणकमल वास दीजे बलि बलि बलि जाऊं ॥।२॥
Ath Shree Mahaprabhuji
NityaPad-005
Bibhaas
Srimadacharya key charannakh chihn koo dhyaan urmein sadaa rahat jinake.
श्रीमदाचार्य के चरणनख चिह्न को ध्यान उरमें सदा रहत जिनके। कटत सब तिमिर महादुष्ट कलिकाल के भक्तिरस गूढ दृढ होत तिनके || १॥ जंत्र अरु मंत्र महातंत्र बहु भांति के असुर अरु सुरनको डर न जिनके। रहत निरपेक्ष अपेक्ष नहि काहुकी भजन आनन्द में गिने न किनके ॥२॥ छांड इनको सदा औरको जे भजे ते परे संसूतिकूप भटके । धार मन एकश्रीवल्लभाधीश पद करन मनकामना होत जिनके ॥। ३॥ मत्त उन्मत्त सों फिरतअभिमान में जन्म खोयो वृथा रातदिनके | कहत श्रुतिसार निरधार निश्चय करि सर्वदा शरण रघुनाथ जिनके ।।४॥।
Ath Shree Mahaprabhuji
NityaPad-005
Bilawal
Balal‍labh chaahe soee karey .
बलल्‍लभ चाहे सोई करे । जो उनके पद दृढ करि पकरे महारस सिंधु भरे ॥१॥ बेद पुर्नन सुघरता सुन्दर ये बातन न सरे। श्रीवल्लभ के पदरज भज के भवसागरतें तरे ॥ २॥ नाथके नाथ अनाथ के बंधु अवगुण चित न धरें।। पद्मनाभकुं अपनो जानिके डूबत कर पकरे ।। ३।।
Ath Shree Mahaprabhuji
NityaPad-005
Ramkali
Charan lagyo chita mero srivallabh charan lagyo chita mero ..
चरण लग्यो चित मेरो श्रीवललभ चरण लग्यो चित मेरो ॥ इन विन ओर कछु नहि भावे इन चरणनको चेरो ॥ १॥। इनहि छांड ओर जो धावे सो मूरखजु घनेरों ॥ गोविंददास यह निश्चय कर सोड़ ज्ञान भलेरो ॥२॥
Ath Shree Mahaprabhuji
NityaPad-005
Bilawal
Srivitthalnathjuke charansharan ..|
श्रीविद्डलनाथजूके चरणशरणं ॥| श्रीवल्लभनंदनं कलिदु:खखंडनं पूरणपुरुषोत्तमं त्रयतापहरणं ॥१॥ सकलदु:खदारणं भवसिंधु- तारणं जनहितलीलादेहधरणं ॥ कान्हरदासप्रभु॒ सबसुखसागरं भूतलदृढभक्तिप्रकटकरणं ॥।२॥
Shree Gusainji
NityaPad-006
Bhairav

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