top of page
Kirtan Title | Kirtan | Category | Book-Page# | Raag |
|---|---|---|---|---|
Gopalahin prem umagi bolati nandrani . aho sridama ! lai | गोपालहिं प्रेम उमगि बोलति नंदरानी । अहो श्रीदामा ! लै
आवहु किन टेरि-टेरि मधु बानी ॥ भोजन बार अवार आनि जिय सुरति भई
आतुर अकुलानी ॥ ढूंढति घर घर आंगन द्वारे लौं तन की दसा हिरानी॥। जसुमति
प्रीतिजानि उठि दौरे सोभित मुखकचरजलपटानी, परमानंद' नंद-नंदन को
अंखियां निरखि सिरानी ॥ | Ath Sheetkaal ke bhojan | NityaPad-078 | Aasawari |
Lalco rotty aur badee ... heing lagaay mirach putdino karube | लालको रोटी और बड़ी ॥। हींग लगाय मिरच पुटदीनो करुबे
तेल तरी ॥१॥ आन कनिक द्वयविरिया छानी बेलन बेल करी पतरी ॥।
कटहरियाप्रभुको रुचि उपजी माखनसो चुपरी ॥।२॥। | Ath Sheetkaal ke bhojan | NityaPad-078 | Dhanshree |
Jehon dulhe laal dulhaiya ... bahu vidhi saak sudhaare vinjav aur | जेहों दुल्हे लाल दुल्हैया ॥। बहु विधि साक सुधारे विंजव और
बनायो घैया ॥१॥| कंचनथार कंचन की चोकी परोसत मोद बढै ॥ ठाड़ी पवन
करत रोहिनी लेत वारन मैया ॥२॥ कर अचवन मुख बीरी दीनी आनन्द उर न
समैया ॥ लाल लाडिली की छबि ऊपर परमानन्द बल जैया ॥। ३।। | Ath Sheetkaal ke bhojan | NityaPad-079 | Aasawari |
Kheechari bhor hii ruchi daine . parat hita sou preet sajani karat haye dram | खीचरी भोर ही रुचि देन । परत हित सो प्रीत सजनी करत हे द्रम
बेन ॥१॥ प्रान पति दृग पूतरी मय उभे सब सु ख ऐन ।। गोरस रुचि सों लेत भोगी
बलित आलस नैन ॥२॥ चलत इत उतत नेह पूरित कलकटाच्छन सेन ।। स्वाद
भेदी अघस अंगन पुनि जगाबत मेन ॥३॥। सीत हेमंत प्रीत पोष सहचरी दे चेन |
वृन्दावन हितरूप अचवन लगत बीरी लेन ॥४॥ | Ath Sheetkaal ke bhojan | NityaPad-079 | Aasawari |
Jembo merey kumbar kanhai ! sarba-mandali samet jendye bali jaaunkahati jasoda maaee .. | जेंबो मेरे कुंबर कन्हाई ! सरबा-मंडली समेत जेंड्ये बलि जाऊंकहति जसोदा माई ॥
खीर खांड घृत माखन मिश्री जो चाहौ सो लेहौ भाई।
हंसि-हंसि मागि लेत मनमोहन सखा-मंडली सब पधराई ॥|
चिरजीयौ मेरौ छगनुवा सब गोपीजन लागति पांई।
परमानंददास' को ठाकुर सब ब्रज-जनके अति सुखदाई ॥। | Ath Sheetkaal ke bhojan | NityaPad-079 | Aasawari |
Harihin lyau ree ! bhojan curran | buddy baar khelat bhaee mohan giri | हरिहिं ल्याउ री ! भोजन करन | बडी बार खेलत भई मोहन गिरि
गोवर्द्धन-धरन ॥ बैठे नंद बाट चाहत हैं ताती खीर सिराई । बालक सब संगहि
ले आवहु कहति जसोदा माई ॥ धेनु दियो दूध अधिकाई सुनहु कान्ह कान्ह !
इहि बात। परमानंद' प्रभु बल-समेत तुम घरहिं आइए तात ॥ | Ath Sheetkaal ke bhojan | NityaPad-079 | Aasawari |
Bhojan karat kishore kishori | | भोजन करत किशोर किशोरी |
मदन गोपाल राधिका बनी अनुपम जोरी ॥१॥
विविध पाक पकवानथार भर, सखियन आन धरे ।
जेंवत लाल लाडिलो रुचिसों स्वादित भोग खरे ॥ २।।
यपुनाजल ललिता ले आई लेजलपान कर्यो ॥
पिय प्यारी को बीरी दे गोकुल पाय पर्यो ॥३॥ | Ath Sheetkaal ke bhojan | NityaPad-079 | Aasawari |
Naval kunwar vrajraj ladillo jenwat haye rotty or burry .. baraa | नवल कुंवर ब्रजराज लाडिलो जेंवत हे रोटी ओर बरी ॥ बरा
भूजेना और खीचरी सद्घृत अधिक सुगंध परी ॥१॥॥| पापर कोमल हरे संधाने
जामें राई बहोत चढी। त्रिपुरारी गिरिधर रुची उपजी पीवत मीठी माग कढी ॥२॥ | Ath Sheetkaal ke bhojan | NityaPad-079 | Aasawari |
Dampati rasbhare bhojan karat ladili laal. vyanjan madhure charpare | दंपति रसभरे भोजन करत लाडिली लाल। व्यंजन मधुरे चरपरे
खाटे खारे खटरस धरे बनाय जसोदा जिमावत जोरी रसाल॥। १॥| पथ ओदन अर
दारभात गुंजा मठरी जलेबी घेवर फेना रोटी चंद्रकला रुचीसों जेंबत प्यारो मदन
गोपाल। नंददास प्रभु प्रिया प्रीतम पररुपर हसत कोर भरत ललिता मनुहार करत
छबि पर बल बल जात ॥२॥ | Ath Sheetkaal ke bhojan | NityaPad-080 | Aasawari |
Arrie tuun baar baar ukak uchak aave jaani bhojan kii biriyaan. | अरी तुं बार बार उ्कक उचक आवे जान ि भोजन की बिरियां।
जेंबत नंद गोद ले ढोटा वरजोहे सौ बिरियां ॥९॥ घर न सुहात जाय बिन देखे
डोलत फिरत निडरिया। श्री विद्टल गिरिधरन छेल को तकिहि रहित दिन
भरिया ॥ २॥। | Ath Sheetkaal ke bhojan | NityaPad-080 | todi |
God bethaay jimabat maiya .. suodan ghritasaani jasoda | गोद बेठाय जिमाबत मैया ॥ सुओदन घृतसानि जसोदा
श्रीमुखमेलत कुंवर कन्हैया ॥१॥ आसपास ब्रजके सबलरिका संगके सखा
बलभैया ॥ खेलत खात हसत लाडीलो जसुमति लेत बलैया ॥२॥ रुची
अपनीसो भोजन कीनो कछु पियो कर घैया ॥ रसीक सुहेत बीरी आरोगत जे पठाड़ नंदरैया ॥३॥। | Ath Sheetkaal ke bhojan | NityaPad-080 | Dhanshree |
Jembat lalana laalan sanga. manimay mahel birajat dou parada | जेंबत ललना लालन संग। मणिमय महेल बिराजत दोउ परदा
परेहे सुरंग ।|१॥ धरी अंगीठी धिकत कनक की सनमुख दोउराजे ॥ रतन जटित
सिंहासन तामें गादी तकिया साजे ॥ २॥ सुंदर झारीभरि यमुनाजल धरिसखी की
और ।| कनकथार नव ओदन खीचरी धरि व्रजजन चहुं और ॥ ३॥ रोटी लीटी बहु
घृत चुपरी नीकी धरि कर प्रीत । ललितादिक मनुहार करत दोउ जेंबत अतिरस
रीत ॥४॥ प्यारी कोर देत प्रिय के मुख प्यारों मुख में मेले। रसिक प्रीतम रस रीत
प्यारी रतिनाथ कंठ भुजा दोउ झेले ॥५॥। | Ath Sheetkaal ke bhojan | NityaPad-080 | Dhanshree |
bottom of page
