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Kirtan Title
Kirtan
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Raag
Vraj kii beethi nipat saankari | iha bhalee reeti gaauun gokul kii,
ब्रज की बीथी निपट साँकरी | इह भली रीती गाँऊ गोकुल की, जितही चलिए तितही बांकरी ॥| जहिं जहिं बाट घाट बन उपबन, तहिं तहिं गिरिधर रहत ताकरी । तहाँ ब्रज बधू निकसि न पावत इत उत डोलत रारत कांकरी ॥ छिरकत पीक, पट मुख दिए मुसकत छाजें बैठि झरोखें झाँकरी । “परमानंद' डगमगत सीस घट, केसे के जैये बदन ढांक री ।।
Aavni
NityaPad-108
Gori
Aaj sakhee tohi laagi haye yeh rutt .. govind leh lehu kou govind
आज सखी तोहि लागी हे यह रट ॥ गोविंद लेह लेहु कोउ गोविंद कहत फिरत वनमें ओघटघट ॥|१॥ दध्िको नाम विसरगयो देखत स्याम सुंदर ओढ़े पीरोपट॥ मांगत दान ठगोरी मेली चतुर्भुज प्रभु गिरिधरनागर ॥। २॥।
Aavni
NityaPad-108
Gori
Param russ paayo vrajaki naari.. joe russ brahmaadik koo dullabh sou
परम रस पायो व्रजकी नारि॥ जो रस ब्रह्मादिक को दु्ल्लभ सो रस दियो मुरारि।। १॥। दरशनसुख नयननकों दीनों रसनाको गुणगान | वचनसुनन श्रवणनको दीनो बदन अधररसपान ॥ २॥। आलिंगन दीनो सब अंगन भ्ुजन दियो भुजबंध॥ दीनी चरण विविधगति रसकी नासाको सुखगंध ।। ३॥। दियो कामसुख भोग परमफल त्वचा रोमआनंद | ढिंग बेठ वोदियो नितंबनले उछंग नंदनंद ।।४॥ मनको दियो सदारस भावन सुखसमूहकी खान ॥। रसिकचरण ब्रजयुवतिनकी अति दुर्लभ जियजान ॥५।॥
Aavni
NityaPad-108
Gori
Nand-nandan goo-dhana sanga aavat, sakhaa-mandali-madhya virajit
नंद-नंदन गो-धन संग आवत, सखा-मंडली-मध्य विराजित गौरी राग सरस सूर गावत ॥ मोर-चंद्रिका मुकुट बन्यौ सिर, मंद अधर धरि मुरली बजावत। गृह-गुह प्रति जुबति भई ठाढीं निरखि विरह की सूल मिटावत ॥। सिंघ-पौरि पे जाइ जसोदा सुत-मुख हेरि हियें सुख पावति । छीत-स्वामी गिरिधरनलाल-कर अपने कर धरि उर सो लगावति।
Aavni
NityaPad-108
Gori
Aabe maaee ! nandanandan sukh-dainu | sandhya samai goplak sanga aagein
आबे माई ! नंदनंदन सुख-दैनु | संध्या समै गोपलक सँग आगें राजत घैनु ॥ गोरज-मंडित अलक मनोहर, मधुर बजावत बैनु | इहि विध घोष मांझ हरि आवत सब कौ मन हरि लैनु ॥ कियौ प्रवेस जसोदा-मंदिर जननी मधि प्यावति पथ-फैनु । छीत-स्वामी गिरिधरन-वदन-छबि निरखि लजानोौ मैनु |।
Aavni
NityaPad-108
Gori
Aarti karati jasumati mudit laal koo. deep adbhut joti,
आरती करति जसुमति मुदित लाल को। दीप अद्भुत जोति, प्रगट जगमग होति, वारि वारति फेरि अपनें गोपाल को ॥| बजत घंटा ताल, झालरी संख-धुनि, निरख््रि प्रज-सुंदरी गिरिधरन लाल को । भई मन में फूलि, गई सुधि-बुधि भूलि, छीत-स्वामी' देखि जुवति-जन-जाल को ॥
Aavni
NityaPad-109
Kanharo
Merey ree ! munn mohan bhaai | sanjhaa samey dhenu key paachhen aavat hain
मेरे री ! मन मोहन भाई | संझा समे धेनु के पाछें आवत हैं सुखदाई।॥। सरक्षा-मंडली मध्य मनोहर मुरली मधुर बजाई | सुनत ख़बन तन की सुधि भूलि, नैन की सैन जताई ॥ कियौ प्रवेस नंद-गृह-भीतर जननी निरखि हरघाई। छीत-स्वामी' गिरिधर के ऊपर सरवसु देत लुटाई।।
Aavni
NityaPad-109
Gori
Pyaare paiya paran nadini ..
प्यारे पैया परन नदीनी ॥ जोईजोई व्यथा हुती मेरे मनमें छिन एक में दूरकीनी ॥१॥॥ जो सोतिन मोसो अनख कर तही सोई आनंद भीनी ॥। नंददासप्रभु चतुरशिरोमणि प्रीत छाप कर लीनी ॥।२॥
Shayan Darshan Sheetkal
NityaPad-109
Nayaki
Aeye aaj kaun bunn charaai yeti gaiyaan kahaan dhon lagaai etee bair.. baithe
ए आज कौन बन चराई येती गैयां कहां धों लगाई एती बेर॥ बैठे ब कहा सुध लेहो नेन ओसेर ॥॥१॥ एक बन ढूंढ सकल बन ढूंढी तोउ न पाई गायनकी नेर ॥ तानसेनके प्रभु तुम बहोनायक देहो कदमचढ टेर ॥२॥
Aavni
NityaPad-109
Gori
Mohan natwar bapu-kaachhe aavat goo-dhana sanga liain latkat.
मोहन नटवर बपु-काछे आवत गो-धन संग लिऐं लटकत। देखन को जुरि आई सबै त्रिय मुरली-नादस्वाद-रस गटकत ।। करत प्रवेस रजनी-मुख ब्रज में देखत रूप हृदे मैं अटकत । 'छीतस्वामी” गिरिधरनलाल- छब्रि देखत ही मन कहुँ अनत न भटकत ।।
Aavni
NityaPad-109
Gori
Jaanyo preetako maram ..
जान्यो प्रीतको मरम ॥ मुख कीमोसोजियकी औरनसों पायो है तिहारो भरम ॥|१।। ऐसीहै जो कोन बाल जिन रस वस कर लीने जानियत हियके नरम ॥| हरिनारायण स्थामदास के प्रभु माई भलीकीनी भोर आये चतुर परम ॥ २॥।
Shayan Darshan Sheetkal
NityaPad-109
Nayaki
Lochan lalchi bhaye ..
लोचन लालची भये ॥ रोके न रहत प्रेमके माते पलक कपाट दये ॥१॥ ले मनदूत पवनव्है निकसे बहुरयो स्थामपें गये ॥। सूरके प्रभु खरेई सोदागार बिनुग्रथ मोल लये ॥२॥
Shayan Darshan Sheetkal
NityaPad-109
Nayaki

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