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SPIRITUAL BENEFACTOR
VAISHNAVACHARYA HDH PUJYA GOSWAMI 108 SHRI VRAJRAJKUMARAJI MAHODAYASHRI




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Kirtan Title | Kirtan | Category | Book-Page# | Raag |
|---|---|---|---|---|
Jayati sriyamune prakatakalpalatike .. ashtavidh siddhi | जयति श्रीयमुने प्रकटकल्पलतिके ॥ अष्टविध सिद्धि
अद्भुतवैभव सकल स्वजन विख्यात स्वाधीनपतिके ।। १॥।
केलिश्रमसुरतपयरूपब्रजभूपको पुत्र पयपान दे विश्वमाता ॥
अंग नूतन करत पुष्टि तब अनुसरतत्रिदलरसकेलिकी अमित दाता ॥२॥
रहत यमद्वारते मुक्त सुख चारते नामत्रयअक्षर उच्चार कीने।।
उभयलीलाविष्ट ब्रज॒प्रिय कुमारिका तुर्यप्रिया बदतरसरंग भीने ॥३॥
अनावृतब्रहते सदा वृत व्है रहीकनकशाखाविटप्शामबल्ली॥
सदा प्रफुल्लित द्वारकेश अवलोकके नित्य
आनंद आभीरपल्ली ॥।४॥। | Shree Yamunaji | NityaPad-012 | Ramkali |
Priyasang rangbhar curr vilase .. | प्रियसंग रंगभर कर विलासे ॥
सुरतरससिंधुमें अतिही हरषित भई कमलज्यों फूलते रवि प्रकाशे ॥१॥
तनते मनते प्राणते सर्वदा करतहै हरिसंग मृदुलहासे ॥
कहत ब्रजपति तुमसबनसों समजाय मिटे यमत्रास इनहीं उपासे ॥२॥। | Shree Yamunaji | NityaPad-012 | Ramkali |
Sriyamunaji yeh vinati chita dhariye .. giridharlal | श्रीयमुनाजी यह विनती चित धरिये ॥ गिरिधरलाल
मुखारविंदरति जन्मजन्म नित करिये॥| १॥ विषसागर संसार विषम संगतें मोहि
उद्धरिये ॥ काम क्रोध अज्ञान तिमिर अति उरअंतरते हरिये ॥२॥ तुम्हारे संग
बसो निजजनसंग रूप देख मन ठरिये ॥ गाऊं गुण गोपाललालके अष्ट व्याधिते
डरिये ॥३॥ त्रिविध दोष हरके कालिंदी एक कृपा कर ढरिये।॥ गोविंददास यह
बर मांगे तुम्हारे चरण अनुसरिये ॥४॥ | Shree Yamunaji | NityaPad-012 | Ramkali |
Srivrindavan mein yamuna sohe, jinake guna aru sobha nirakhat | श्रीवृंदावन में यमुना सोहे, जिनके गुण अरु सोभा निरखत
मदनमोहन पिय मोहे ॥ १॥॥ सदा संयोग रहत इनही को हरिरस सो अति पागी,
'रसिक' कहे इनके सुमिरन तें हरिचरणन अनुरागी ॥२।॥। | Shree Yamunaji | NityaPad-013 | Bhairav |
Sriyamuna karat kripa koo daan, joe kouu aavat daras tihaare | श्रीयमुना करत कृपा को दान, जो कोऊ आवत दरस तिहारे
सब के राखत मान ॥| ९॥॥ कलि के जीव दोष भंडारी करत तिहारो पान | भये
अनन्य सबही ओरे तें सुर मुनि करत बखान ॥२॥ जे जन हरिलीला अधिकारी
करत तिहारो गान, मैं मतिमंद कहां लौं बरनों रसिकदास जन जान ।।३॥। | Shree Yamunaji | NityaPad-013 | Bhairav |
Sriyamuna janakon sukhakarani, sharan lait daivi jeevan koo tinn | श्रीयमुना जनकों सुखकरनी, शरण लेत दैवी जीवन को तिन
के कोटि दोष को हरनी ॥१॥ पुष्टिभक्ति में बाधक जो कछु ताकों मेंट भक्तिरस
भरनी, दास" कहे सरन हों आयो महा कलिकाल सिंधु तें तरनी ॥२॥ | Shree Yamunaji | NityaPad-013 | Bhairav |
Namo devi yamune munn vachan karm karu sharan teree . | नमो देवी यमुने मन वचन कर्म करु शरण तेरी ।
सकल सुखकारिनी भवसिंधुतारिनी, दरसन तें कटत हैं कर्म बेरी ॥१॥॥
अभय पद दायिनी भक्त मन भायिनी, करि कृपा पूरिये साध मेरी,
दीजिये भक्तिपद लालगिरिधरनकी, काटिये विषय कृष्णदास* केरी ॥२॥ | Shree Yamunaji | NityaPad-014 | Bhairav |
Curry pranaam yamunajal lahiye, srivallabh-padaraj prataap tein, | करी प्रणाम यमुनाजल लहिये, श्रीवल्लभ-पदरज प्रताप तें,
श्रीयमुना मुख कहिये ।।१॥ पूरन पुरुषोत्तम ब्रज प्रकटे इनहूं प्रकट्यो चहिये।।
जो जन लक्ष धरा तें ऊंचों, रविमंडल तें बहिये।। २॥| नंदसुबन अरू कलिंदनंदिनी
दरसन रिपुतन दहिये 'हरिदास' प्रभु यह सुख सोभा नयनन ही में रहिये ॥३॥ | Shree Yamunaji | NityaPad-014 | Bhairav |
Sriyamunaji param kripal kahaave, darsan tein agh doori jaat hain | श्रीयमुनाजी परम कृपाल कहावे, दरसन तें अघ दूरि जात हैं
हरिलीला सुधि आवे ॥१॥ जे जन तेरे निकट बसत हैं नंदनवन रस पावें, जीव
कृत्य देखत नहिं कबहूं अपनो पक्ष दृढ़ावे ॥२॥। कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तु यह सुन
मन ललचावे, 'रसिकदास' को दास जानियें तातें बह जस गावें ॥३॥ | Shree Yamunaji | NityaPad-014 | Bhairav |
Sriyamunaji nirakh sukh upjat, sanmukh vundavipin suhaaye, | श्रीयमुनाजी निरख सुख उपजत, सन्मुख वुंदाविपिन सुहाये,
श्रीविश्र ांत वललभजु की बैठक, निर्मल जल यमुना के नहाये ॥१॥ भुजतरंग
सोहत अति नीके, भँवर कंकण सुहाये, ब्रजपतिकेलि कहा कवि बरने, शेष
सहख्रमुख पार न पाये ॥ २॥ श्रमजल सहित अगाध महारस, लीलासिंथु तरंगन
छाये, सकल सिद्धि अलौकिक दाता, जे जन तकि चरनन चित लाये ॥॥३॥।
रविमंडल द्वार होय प्रकटी, गिरि कलिंद सिर तें ब्रज धाये, हरिदास' प्रभु सोभा
निरखत मन क्रम वचन इनके गुण गाये ॥४॥ | Shree Yamunaji | NityaPad-014 | Bhairav |
Joe koee shree yamuna naam sambhaare, taako daras paras kouu karahin | जो कोई श्री यमुना नाम संभारे, ताको दरस परस कोऊ करहीं
वाही को वे तारे ॥१॥ भक्त की महिमा बरनि न सके यम हा हा करि हारे,
“चतुर्भुज' प्रभु गिरिधरन लालको नितप्रति वदन निहारे ॥२॥। | Shree Yamunaji | NityaPad-014 | Bhairav |
Kalindi kalikalmash harni, ravitnaya yamanuja sthaama | कालिंदी कलिकल्मष हरनी, रवितनया यमअनुजा स्थामा
महासुंदरी गोबिंदघरनी ॥।९॥ जय यमुने जय कृष्णवल्लभा पतितन को पावन
भवतरनी, सरनागत को देत अभय पद जननी तजत जस सुतकी करनी ॥।२॥
सीतल मंद सुगंध सुधानिधि धाई धर बपु उत्तर धरनी, परमानंद' प्रभु परम
पावनी युग युग साख निगम नित वरनी ॥ ३॥ | Shree Yamunaji | NityaPad-014 | Bhairav |
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