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Kirtan Title | Kirtan | Category | Book-Page# | Raag |
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Nandakulchand udit kaumudi boonda vipin vimal akashe |. | नंदकूलचंद उदित कौमुदी बूंदा विपिन विमल आकाशे |।
निक लंकवेदीसतसखी घधृंदवर तारका लोचन चकोर वित्य रूपरस प्यासे ॥ १॥।
रसिकजन अनुराग उदित विविध तनमरयाद भाव अगणित कुमुदिनी गण विकासे
कहें गदाधर सकल विश्व असुरनविना भान भवताप अज्ञानि तिमिरनासे ॥२॥। | Mangla Darshan | NityaPad-135 | Ramkali |
Jayatikdambakinjalkaruchirvas .. meghshamal anga tunn munn | जयतिकदंबकिंजल्करुचिरवासे ॥ मेघशामल अंग तन मन
सदन शभ्रुवरभंग घोखसीमंतिनी भागरासे ॥१॥ जयति युवतीमुख विधु करतपान
म्रत्तचक्ोर क्वणितकर मृदुमुरली नवरस विलासे ॥ कृष्णदासनिनाथ रसिक
गिरिधरकुंवर क्वणितनूपुरदिव्य रंग रासे ॥२॥ | Mangla Darshan | NityaPad-135 | Bibhaas |
Radhika sthaamatan dekh muskani ... haar vingun lekh adhar | राधिका स्थामतन देख मुसकानी ॥। हार विनगुण लेख अधर
अंजनरेख नयन तंबोल तुतरात वानी ॥ १॥। पाग लटपट बनी उरें छूटी तनी अंगकी
गति देख जियमें लजानी || उपट कंकनपीठ वक्र विव्हल दीठ इंठकीईठता
लखी छानी ॥२॥ पाणिपललव अधर दशन सोंगहि रही मधुरवच बोल जिय
हारमानी ॥ सूरप्रभु प्राणपति अंक भर नागरी नवलनागर उरें घालसानी ॥३॥। | Mangla Darshan | NityaPad-135 | Ramkali |
Urajho nilambar pitambar mahiyaan .. kundalson learlut bensar sou | उरझो नीलांबर पीतांबर महियां ॥ कुंडलसों लरलट बेंसर सो
पीतपट हारहीमें वनमाला बैयांमें बहियां ।१॥| हंसगति अतिछबि अंग अंग रही
फबि उपमाअवलोकवेकुंपटतर नहियां ॥| कामके कलोल छुटे सेजहूके सुख
लूटे सूरप्रभु बिलसत कदंमकी छहियां ॥। १॥ | Mangla Darshan | NityaPad-135 | Bibhaas |
Praatasmein harinam leejiye anandamangalmein dinn jaay ..| chakrapani | प्रातसमें हरिनाम लीजिये आनंदमंगलमें दिन जाय ॥| चक्रपाणि
करूणामय केशव विघ्रविनाशन यादवराय ॥ १॥ कलिमल हरण तरण भवसागर
भकक्तचिंतामणि कामधेनु ॥ एसो समर्थ नाम हरीको वंदनीक पावनपद रेनु ॥ २॥
शिव विरंचि इंद्रादि देवता मुनिजन करत मामकी आस | भक्तवत्सल हरिनाम
कल्पतरू वरदायक प रमानंददास ।। ३॥। | Mangla Darshan | NityaPad-135 | Bibhaas |
Aaj uthh bhor navkunj kaanan sakhee thhaadi bhaee radhika rangbhini .. | आज उठ भोर नवकुंज कानन सखी ठाडी भई राधिका रंगभीनी ।।
बिलस सुख संग नवरंग पिय स्थामघन कामकी सेन सब जीतलीनी ॥ १॥। सुभग
विकसत बदन नथन अति रसमसे मोर मुखहास कछु सकुच कीनी ॥। श्रीविद्डल
गिरिधरन संग नागरी जाग सबरेन आनंद दीनी ॥॥२॥। | Mangla Darshan | NityaPad-136 | Khat |
Baney aaj nandlal saradi premamaadik piyein sanga lalana liyein yamuna | बने आज नंदलाल सरदी प्रेममादिक पियें संग ललना लियें यमुना
तीरें ॥ फूली केसर कमल मालती सघन वन मंद सुगंध सीतलसमीरें ॥१॥
नीलमणि वरण तन कनक मंडित वसन परम सुंदर चरण परस माला ॥ मधुर
मूदुहास प्रकाशदशनावली छबि भरे इतरात दृूग विशाला॥। २॥ कियें चंदनखोर
बदनारविंद मकरंद लुब्ध भ्रमरकुटिल अलकें ॥ हलत कुंडल लटक चलत जब
स्यामघन मणिनकी कांति कलगंड झलकें ॥। ३॥ एक चंपकतनी कृष्ण रसमाती
करे रागपंचम संग लागि सोहें।। एक हरिमरुख निरख धररही ध्यान मन चित्रसम
भई हरि हिये मोहें ॥।४॥ एक दामिनसी भुजमेल ग्रीवा बात कहन मिस मुखसोजु
मुख मिलायो ॥ एक नवकुंजमें खेंचरही कटिबंध आपनो लाल चितचोर
पायो॥५॥ एक स्यामहि हेर सुभग लोचन फेर विहस बोली भले कान्ह कपटी ॥
एक सोधे भरी छुटे बारन खरी एक बिन कंचुकी रीझ-लपटी ।॥॥६॥ एक स्यामा
कनक कंज बदनी प्रेम मकरंद भरी हरि निरख विकसी ॥ ताके रसलुब्ध रहे लपट
सांवरों भ्रमर प्राण प्यारी भुजन बीच जुलसी ॥|७॥ रसिकमणि रंगभरे विरहत
बूंदाविपिन संग सखी मंडली प्रेमपागी।। कहत भगवान हित रामरायप्रभु सोईजाने
जाही लगनलागी ॥८॥ | Mangla Darshan | NityaPad-136 | Khat |
Kunwari radhika tuv sakal saubhagyaki seema vandan parr | कुंवरी राधिका तुव सकल सौभाग्यकी सीमा वंदन पर
कोटिशत चंदवारों ॥ खंजन कुरंग मीम शतकोटि नयननऊपर वारनें करत जियमें
विचारों ॥|१॥ कदली शतकोटि जंघनऊपर वारनें सिंह शतकोटि कटिपर उतारो ॥
मत्तगज कोटिशत चालपर कुंभ शतकोटि इन कुचनपर वारडारों ॥२॥ कीर
शतकोटि नासा ऊपर कुंद शतकोटि दशनन ऊपर कहीनपारों ॥ पक्वकंदूर बंधूक
शतकोटि अधरन ऊपर वार रूचि गर्व टारों ॥३॥ नाग शत कोटि बेनी ऊपर
कपोत शतकोटि ग्रीवा पर दूर सारों ॥ कमल शतकोटि कर युगल पर वारने
नाहिन कोऊ लोक उपमा जु धारों ॥४॥ दासकुमनस्वामिनी सुनखशिख अंग
अद्भुत सुठान कह ांलग संभारों | लालगिरिवरधरन कहत मोहि तोहिलों सुख
जोलों वह रूप छिनछिन निहारों ॥५॥। | Mangla Darshan | NityaPad-136 | Ramkali |
Jayati sriradhike sakal sukh saadhike tarunimani nitya | जयति श्रीराधिके सकल सुख साधिके तरुणिमणि नित्य
नौतन किशोरी ॥ कृष्णतन नीलघन रूपकी चातकी कृष्णमुख हिमकिरणकी
चकोरी ।। १॥ कृष्णदूग भृंग विश्राम हित पद्दिनी कृष्णदृग मृगज बंधन सुडोरी |
कृष्ण अनुराग मकरंदकी मधुकरी कृष्णगुणगान रससिंधुबारी ॥ २॥| परम अद्भुत
अलौकिक मेरी गति लखमनसि सांवरें रंग अंग गोरी ॥| और आश्चर्य में कहूँ न
देखयों सुन्यो चतुर चौसठ कला तदपि भोरी ॥३॥ विमुख परिचित्त ते चित्त
याको सदा करत निजनाहकी चित्तचोरी || प्रकृत यह गदाधर कहत कैसे बने
अमित महिमा इते बुद्धि थोरी ।।४॥। | Mangla Darshan | NityaPad-136 | Ramkali |
Paachhali raat parchhaahi paatan kii lalju rangbhine dolat drumdrum | पाछली रात परछाही पातन की लालजू रंगभीने डोलत द्रुमद्रुम
तरन ॥ बने देखत बने लगत अद्भुत मने जोतकी सोतमें मिकस रही
सबघरन।। १॥ कृष्ण के दरसको अंग के परसको महा आरति मानचली मज्जन
करन॥ नुपुरध्वनि सुनत चक्रतव्है थकिरही परगयो दृष्टि गोपाल
सांवलवरन ॥ २॥। जरगसी पागपर मोरचंद्रिका बनी कमलदल नयनभ्रूवबंक
छबि मनहरण ॥ धाई सब गहन को रसबचन कहनको भामिनी बनी अति
छबि सुधारत चरण ।॥।३॥। रोमरोम रमरह्यो मेरोमन हरलियोनाहिं विसरत वाकी
झुकनमें भुजभरन | कहे भगवानहित रामरायप्रभुसों मिली लोकलाज भाजगई
प्राण परवस परन ॥४।॥। | Mangla Darshan | NityaPad-137 | Khat |
Aaj nandlal mukhchand nayanan nirakh parammangal bhayo bhawan | आज नंदलाल मुखचंद नयनन निरख परममंगल भयो भवन
मेरे।। कोटि कंदर्प लावण्य एकत्रकर वारूं तबही जब नेक हेरे।।१॥ सकल सुख
सदन हरषित बदन गोपवर प्रबल मदनदल संग घेरें ॥। कहो कोऊ केसें हूननहें
सुधबुद्ध बने गदाधर मिश्र गिरिधरनटेरे ॥२॥। | Mangla Darshan | NityaPad-137 | Khat |
Bunny sahaj yeh loot harikeli gopinaken supanen yeh kripa kamala naan | बनी सहज यह लूट हरिकेलि गोपीनकें सुपनें यह कृपा कमला न
पावे ॥ निगम निरधार त्रिपुरारहूं विचार रह्मो पचरह्मो शेष नहीं पार पावे ॥१॥
किंनरी बहुर अरु बहुर गंधर्वनीपनगनी चितवन नहीं माझ पावें ॥ देत करतार
बेलाल गोपालसों पकर ब्रजबाल कपि ज्यों नचावें ॥२॥ कोऊ कहे ललन
पकराव मोहि पावरी कोऊ कहेलाल बल लाओ पीढी ॥ कोऊ कहे ललन
गहाव मोहि सोहनी कोऊ कहे लाल चढ जाउ सीढी ॥३॥ कोऊ कहे लालन
देखों मोर केसे नचें कोऊ कहे भ्रमर केसे गुंजारें ॥ कोऊ कहे पौर लग दौर आबो
लाल रीझमोतीन केहारवारें ॥४॥। जो कछु कहें ब्रजवधू सोइसोड़ करत तोतरेबेन
बोलनसुहावें ॥ रोय परत वस्तुजब भारी न उठेतबे चूम मुख जननी उरसों
लगावें॥५॥ बेन कहि लोनीपुनचाहि हरत बदन हँस स्वभुज बीच लेले कलोलें ॥।
धामके काम ब्रजबाम सब भूलरहीं कान्ह बलराम के संग डोलें ॥।६॥। सूर गिरिधरन
मधुचरित्र मधुपान के और अमृत कछु आनलागे।। और सुख रंककी कोन इच्छा
करें मुक्तिहों लोनसी खारी लागे ॥॥७॥। | Mangla Darshan | NityaPad-138 | Khat |
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