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Kirtan Title
Kirtan
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Raag
Aisee kaun nagri jinn kunjamen basaaye .. aroon uday tamcharko
ऐसी कौन नागरी जिन कुंजमें बसाये ॥ अरूण उदय तमचरको बोलसुन काहेको अरबराय उठ धाये ॥१॥ सुधिकर देख कहां पीयरो पट सुभगकुंकुम उर लपटाये॥। पीठ बलयके चिन्ह विराजत ढांपलेहु जोआछे बनि आये॥२॥ वदन बिंदु सुबशको टीको सुरत जीत रणधीर कहाये ॥। कृष्णदासप्रभु गिरिधर नागर पोढरहो निश बहुत जगाये ॥३॥
Khandita
NityaPad-143
Bhairav
Bhalikini bhor aaye merey angana | aroon uneede nayana aalas
भलीकीनी भोर आये मेरे अंगना | अरूण उनीदे नयना आलस बलित बेंना कुमुदिनी चित्त चोर्‌यो चंद वस्यो गगना ॥।१॥ अधरन रंग नीको काजर कपोल पीक यावक ललाट लीक कहेत गोपीलगना ॥! भुजन बंदन फबी कुचहार मुद्रिकाठबी नखरेख छाती छबी पीठ गढ्यो कंगना ॥२॥| वसन सुहात नीले चिकुर छूटे छबीले चरणधरत ढीले निशि कियो जगना ॥ सूरदास श्रीगोपाल सुरतसमें अतिबिहाल तहीपें सिधारो लाल जहां मन लगना ॥३॥।
Khandita
NityaPad-143
Bhairav
Iyeju bhaleaaye kitt sakuchtaho .. surat sangram keene
आइयेजू भलेआये कित सकुचतहो ।। सुरत संग्राम कीने सोतिनको सुख दीने तेई रंगभीने पें मोको तो रुचतहो ॥|१॥। तुमदेखे रिसगई उपजी प्रीति नईभई सोतोभई अबकहाधों सोचतहो | मारायण वल्‍लभजू मोहि जानें वह चेरी कोन हैं येतो अभिलाष मोचत हो ॥।२॥
Khandita
NityaPad-143
Bhairav
Govardhangiri saghankandara raine nivaas kiyo piyapyari ...
गोवरधनगिरि सघनकंदरा रेन निवास कियो पियप्यारी ॥। उठचले भोर सुरत रंगभीने नंदनंदन वृषभान दुलारी ॥ १॥ इत विगलित कचमाल मरगजी अटपटे भूषण रगमगी सारी ॥| उतही अधर मिस पाग रही धस दुहृदिश छबि वाढी अति भारी ॥२॥ घूमत आवत रतिरणजीते करिणि संग गज गिरिवरधारी ॥। चतुर्भुजदास निरख दंपतिसुख तनमनधन कीनों बलिहारी ।। ३॥।
Khandita
NityaPad-144
Bhairav
Dheele dheele pug dharat dheeli paag dharkarhi dhayesehi firat aise
ढीले ढीले पग धरत ढीली पाग ढरकरही ढयेसेहि फिरत ऐसे कोनपें जु ढहेहो ॥ गाढेतो हीयके पिय ऐसी गाढी कोन त्रिय गाढे गाढे भुजन बीच गाढे कर गहे ॥ ९॥॥ लाललाल लोयन में उनीदे लाग लागजात सांचीकहो प्राणपति मेतो लाललहे॥ नंददास प्रभु पिय निशके उनीदे आये भयो प्रात कहो बात रात कहां रहे ॥ २॥।
Khandita
NityaPad-144
Bhairav
Rasamse nandadulare aaye hoe uthhe bhor. aroon nathan bayne atpate
रसमसे नंददुलारे आये हो उठे भोर। अरूण नथन बेन अटपटे भूषण देखियत अधरन रंग भारे।।१॥ कितववाद कितकरत गुसांई जहीं जाबोहो जाके प्राण पियारे ॥ गोविंदप्रभु पिय भलेंजुभलें आये जान पाये जेसे तनस्याम ऐसे ही मन कारे ॥ २॥
Khandita
NityaPad-144
Bibhaas
Lalanaki preeti amoli aeka rasna kahankahon sakhiri .. hassan
ललनकी प्रीति अमोली एक रसना कहांकहों सखीरी ।। हसन खेलन चितवन जो छबीली अमृत वचन मृदुबोली ।। १॥ अति रसभरे मदनमोहन पीय अपने करकमल खोलत बंद चोली || गोविंदप्रभुकी बहुत कहां कहूं जेजे बातें कहीं अपनो हृदो खोली ॥। २।।
Khandita
NityaPad-144
Bibhaas
Konke bhuraaye bhor aaye hoe bhawan merey oonchi drishti kyon karo
कोनके भुराये भोर आये हो भवन मेरे ऊंची दृष्टि क्योंन करो कोनतें लजानेहो।। जाहीको भवन भावे ताहीके सिधारो कान्ह ऐसी कोन चाडपरी कोनगहि आनेहो ॥ १॥ भोरी भोरी बतियन मोहि भुरवन आये तुम गिरिधारी जू निपटसयानेहो ॥ कृष्णदासप्रभु मोहन नागर मैं लालन नीके कर जानेहो ।।२॥
Khandita
NityaPad-144
Bibhaas
Aavat kunjanaten ponhopiri ..| piya alsaat jumbhaat rasbhare
आवत कुंजनतें पोंहोपीरी ॥| पिय अलसात जुूंभात रसभरे ललन खबाबवत बीरी ॥ १॥ सुरत शिथिल अंग अंग शिधिल अति भुजभर स्थामा रसकी रसीली ॥। विट्वपबिपिन विनोद करो मिल नई ललितादिक नीली ॥२॥
Khandita
NityaPad-144
Bhairav
Aaj laal atee raajen baithebanikas aaya chhaajen sudhi naan kachhoori
आज लाल अति राजें बैठेबनिकस आय छाजें सुधि न कछूरी गात प्यारी प्रेम मगनां ॥। लटपटी पाग सिर शिधिल चहुर चारू उपटत उरहार प्यारी कंठ लगनां ॥१॥ आलस अरुनअति खरेरी विलोचन भरभर आवत प्रियासे अनुरगना ॥ गोविंदप्रभु पिय रसिक शिरोमणि सुरत रसकेली भोर लों जगना॥।२॥।
Khandita
NityaPad-145
Bibhaas
Atihi kathin kutch oonche douu nitambanise gaadhe urlaayaken menty
अतिही कठिन कुच ऊंचे दोऊ नितंबनीसे गाढे उरलायकें मेंटी कामहूक ॥ खेलतमें लर टूटी उरपर पीक परी उपमावलोक बरणत भई पति मूक | १॥ अधरामृत रस ऊपरते अचवायो अंगअंग सुख पायो गयो दुःख दूक |। छीत स्वामी गिरिधारी राजा लुट्यो मन्मथ वुंदावन कुंजनमें में सुनीहे कूक ।।२॥॥
Khandita
NityaPad-145
Bibhaas
Margaji aur kundamal lochan alsaat laal dagmagaat
मरगजी और कुंदमाल लोचन अलसात लाल डगमगात चरण धरणि धरत रेन जागे॥ भालतें खस मोरमुकुट भूकुटी तट आयो निकट शिधिल चपल चंद्विकासो बांधी पाट तागे ॥ १॥। अतसी कुसुम तन सुभांत कहूंकहूं कुंकुमकी कांति मदन नृपति पीक छाप युग कपोलन लागे ॥। छीतस्वामी गिरिवरधर सौरभ रसमत्त मधुप संगमगुण गान करत फिरत आगे आगे ॥२॥
Khandita
NityaPad-145
Bibhaas

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