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Kirtan Title
Kirtan
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Raag
Dadhike matware kaanh kholo que‍yon naan palaken..
दधिके मतवारे कान्ह खोलो क्‍यों न पलकें।। शिश मुकुटकी लटा छुटि और छुटि अलकें ॥१॥ सुरनरमुनि द्वार ठाड़े दरस कारन कीलकें ॥ नासिकाको मोती सोहे बीच लाल ललकें ॥ २॥ कटि पीतांबर मुरलीकर श्रवन कुंडल झलकें ॥ सूरदास मदनमोहन दरस देहो भलकें ॥।३॥
Jagayeve
NityaPad-015
Bibhaas
Chalat nyaari naval yamune. gaay vrajbhakt key bhaav koo dekhi
चलत न्यारी नवल यमुने। गाय ब्रजभक्त के भाव को देखि के, भाव सहित तहां करत गवने ॥१॥ आई ब्रजभूप पिय भाव उपजाब ही, जलस्थल सिद्ध दोऊ करत रवने, निरख सोभा हरिदास' निसदिन यह, मन क्रम वचन करी सीस नमने ॥।२॥
Shree Yamunaji
NityaPad-015
Bilawal
Namo namo jayati sriyamune, jaya kalindi pulin manohar,
नमो नमो जयति श्रीयमुने, जय कालिंदी पुलिन मनोहर, स्यामास्याम करत हैं रबने ॥१॥ जलक्रीडा करत तेरे तट, तुम सम कोऊ नहीं तीनों भवने, सुरनर मुनि के ध्यान न आवत सो प्रभु तिहारे गृह गवने ।॥२॥ तुम तो परमकृपालु जगजननी, पतितन को पावन भवतरनी, साख निगम पुरानन बरनी, सूर' प्रभु के मन को हरनी ॥३॥।
Shree Yamunaji
NityaPad-015
Bhairav
Sriyamunapan karat hii rahiye, vraj basavabo neeko laagat haye
श्रीयमुनापान करत ही रहिये, ब्रज बसवबो नीको लागत है लोकलाज दु:ख सहिये ।।१॥ श्रीवललभ श्रीविट्ठल गिरिधर गावत सब सुख पैये, ब्रजपति' मुख अवलोक महासुख दरसन दूग न अधैये ।।३॥
Shree Yamunaji
NityaPad-015
Bilawal
Bhor bhayo jaago nandanand .. sanga sakhaa thaadhe jagwand ...1..
भोर भयो जागो नंदनन्द ॥ संग सखा ठाढे जगवंद ॥।१॥ सुरभिन पय हित वत्स पिवाये ॥ पंछी यूथ दसोंदिश धाये ॥२॥ मुनि सर तके तमचर स्वरहार्‌ये ॥ सिथिलधनुष रतिपतिगहि डार्‌ये ।। ३॥ निशिहीघटी रविरथ रुचिराजे || चंद मलीन चकई रतिसाजे ॥।४॥ कुमुदिनी सकुची वारिज फूले ॥। गुंजत फिरत अलिगणझूले ॥५।॥ दरसनदेहो मुदितनरनारी॥ सूरदास प्रभुदेवमुरारी ।।६॥
Jagayeve
NityaPad-015
Bibhaas
Utho merey laal gopal ladley rajani veeti bimal bhayo bhor ..
उठो मेरे लाल गोपाल लाडले रजनी वीती बिमल भयो भोर ॥ घर घर दधि मथत गोपिका द्विज करत वेदकी सोर ॥ १॥ करो कलेऊ दधि ओर ओदन मिश्री मेवा परोसूं ओर ॥आस करण प्रभु मोहन तुम पर वारों तन मन प्राण अकोर ॥२॥
Jagayeve
NityaPad-016
Bhairav
Sehera dharey-taba praat hii kunj mahal sejan tein aalsakon taja
सेहेरा धरे-तब प्रात ही कुंज महल सेजन तें आलसकों तज दुलहनि जागी॥ अति श्रम सिथिल अंग देखियत है श्याम सुन्दर अधरन रस पागी ॥ १॥ बींजना ब्यार करत ललिता ले श्रम जल मुखतें पोंछन लागी।॥। देख देख मुसिकात परस्पर कहत लाल लोचन अनुरागी ॥।२॥ जागी दुल्हे संग रैन सब एयाम केलि सुख सदा सुहागी ॥ जन त्रिलोक प्रभुसों रति मानी कोऊ न ऐसी बड़भागी ॥। ३॥।
Jagayeve
NityaPad-016
Bibhaas
Jaago gopallal duho dhauri gaiyaan .. sadadoodh muth pivo
जागो गोपाललाल दुहो धौरी गैयां ॥ सददूध मथ पीवो घैयां।।१॥ भोर भयो वन तमचर बोले ॥ घरघर गोप बगर सब खोले ।॥।२॥ गोपी रई मथनिया धोवे ॥| अपनो अपनो दह्यो विलोवे ।।३॥ संगके सखा बुलावन आये।॥ कृष्णनाम लेले सब गाये ॥४॥ भूषण वसन पलट पहराऊं॥ चंदनतिलक ललाट बनाऊं ॥।५॥ चतुर्भुज प्रभु श्रीगोवर्द्धनधारी ।। मुखछबिपर बलगई महतारी ॥।
Jagayeve
NityaPad-016
Bhairav
Balkrishna jagahu merey pyaare ..dhru... baithi sez kahati haye janani .
बालकृष्ण जागहु मेरे प्यारे ॥ध्रु.॥ बैठी सेज कहती है जननी । बार बार मुखकमल निहारे ॥ १॥ सुन्यो वचन माता को जब ही । तनिक तनिक दोऊ नैन उघारे ॥२॥ लिये उठाय अंक भरि तब ही ॥ उष्णोदक सो वदन पखारे॥।३॥ माखन मिश्री और मलाई | ओट्यो दूध तुम लेहु दुलारे ॥४॥ विविध भांति पकवान मिठाई । आनन मेल अपुनपो बारे ॥५॥ मुख परखारि झगुली पहराई। शिर ऊपर चौतनी जब धारे ॥॥६।। डोलत अजिर मुदित मनमोहन। “ब्रज़जन' ओट भई जु निहारे ॥॥७॥
Jagayeve
NityaPad-016
Bhairav
Jaagiye gopallal janani balzai .. utho taat praat bhayo
जागिये गोपाललाल जननी बलजाई ॥ उठो तात प्रात भयो रजनीको तिमिर गयो टेरत सब ग्वालबाल मोहनाकन्हाई ॥। १॥। उठो मेरे आनंदकंद गगनचंद मंदभयो प्रकट्यो अंशुमान भानु-कमलने सुखदाई ॥ सखा सब पूरत वेणु तुम बिना न छूटे धेनु उठो लाल तजो सेज सुंदर वरराई ॥॥२॥ मुखते पटदूरकियो यशोदाको दरसदियो ओर दथि मांगलियो विविध रस मिठाई ॥ जेवत दोऊ रामश्याम सकल मंगल गुणनिधान थारमें कछू जूठ रही मानदास पाईं ॥। ३॥।
Jagayeve
NityaPad-016
Bhairav
Laalan jagoho bhayo bhor ..
लालन जागोहो भयो भोर ॥ दूध दही पकवान मिठाई लीजे माखन रोटी बोर ॥ १॥। विकसे कमल विमल वाणी सब बोलन लागे पंछी चहुं ओर ॥ रसिकप्रीतमसों कहत नंदरानी उठ बैठोहो नंदकिशोर ।२॥
Jagayeve
NityaPad-017
Bhairav
Jagoho tum nandkumar |
जागोहो तुम नंदकुमार | बलबल जाउं मुखारविंदकी गोसुत मेलो करो शुंगार ॥ १॥ आज कहा सोवत त्रिभुवनपति ओर वार तुम उठत सवार॥ वारंबार जगावत माता कमलनयन भयो भवन उजार ॥ २॥ दधि मथों नवनीत देहों संगसखा ठाडे सिंघद्वार ।| उठो क्योंन मोहि वदन दिखावो सूरदासके प्राण आधार ॥।३॥
Jagayeve
NityaPad-017
Bhairav

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