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Kirtan Title | Kirtan | Category | Book-Page# | Raag |
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Nandanand kunjchand kamalnen madan mohan kambukanth mandahasya badan | नंदनंद कुंजचंद कमलनेन मदन मोहन कंबुकंठ मंदहास ्य बदन
चारु देख री। चलत कुंतल मधुपमाल श्रुकुटि कुटिल अति रसाल लोल लोचन
तिलक भाल मुकुट सरस बेस री ॥१॥ बिंबाधर मुरली राजे मधुरे सारंग बाजे
खग मृग नग नाग सुन रीझत सुर शेष री। अबनि कंपे कृष्णो कहे जमुना धकित
नाही बहे गिरिवरधर भेट वाम जनम सुफल लेख री ॥ २।। | Shringaar - Mukut | NityaPad-173 | Saarang |
Harimarag jovat bhaee saanjh. dinmani ast bhayo godhurak aavat | हरिमारग जोवत भई सांझ। दिनमनि अस्त भयो गोधूरक आवत
बने मंडली मांझ ॥१॥ बाजत बेनु रेनु तनमंडित वनमाला उर लोचन चारू |
बरूहा मुगट स्वन गुंजमनि वनज धातुको तिलक सिंगारु ॥ २॥ गोपी नेन भूंग
रसलंपट सादर करत कमल मधुपान | विरहताप मोचन परमानंद मुरली मनोहर
रूपनिधान ॥। ३।। | Shringaar - Mukut | NityaPad-173 | Gori |
Sakhiri lobhi merey nain . binn dekhe chatpati see laagat dekhat | सखीरी लोभी मेरे नैन । बिन देखे चटपटी सी लागत देखत
उपजत चैन ॥१॥ मोरमुकुट काछे पीतांबर सुन्दर मुखके बैन | अंग-अंग छबि
कहि न परत है निरख््रि थंकित भयो मैन ।॥२॥ मुरली सुन ऐसी लागत है चितवे
खग मृग धैन | परमानंददासको ठाकुर बे देखो ठाडे जु ऐन ॥३॥ | Shringaar - Mukut | NityaPad-173 | Dhanashree |
Naval laal govardhandhari aavat banat sohe. manigan bhushan anga | नवल लाल गोवर्धनधारी आवत बनत सोहे। मनीगन भूषन अंग
बिराजत छबिली चाल मन मोहें। मोर मुगट काछिनी कटि राजत देखत मनमथ
कोहे ॥ नंददास प्रभु गायन पाछें आवत चहूंधा दृष्टि करजोहे ॥। | Shringaar - Mukut | NityaPad-173 | Gori |
Aaj thaade laal mukut dharey . badan lasat makrakrit kundal | आज ठाडे लाल मुकुट धरे । बदन लसत मकराकृत कुंडल
रतिपति मन जु हरे ॥ १॥॥ अरुन अधर ओर चिबुक चारु बन्यो दुलरी मोहनमाल
गरे। अति सुगंध अंग चन्दन खोर किये पोहोंची मोतीनकी लरे ।॥२॥ कर मुरली
कटि लाल काछनी कीकनी नूपुर शब्द करे। गुन भरे कृष्णदास प्रभु राधा निरखि
नेन उत न टरे ॥३॥ | Shringaar - Mukut | NityaPad-174 | Saarang |
Sohe sees mukat shravan kundal bhaal tilak gunjamal pitambar | सोहे सीस मुकट श्रवन कुंडल भाल तिलक गुंजमाल पीतांबर
सोहे कटि काछनी बिराजे ॥ १॥ शंख चक्र गदा पद्म कर मुरली अधर धरे बूृंदावन
चंद मानो गोपीनाथ बिराजे ॥ २॥ गोपीनाथ मदन मोहन श्री नारायण दामोदर
दयानिध दीन बंधो दरशन भय भाजे। बद्रिदास के प्रभु सप्त सुरन छबि रह्मो भन
ग्राम सुरलेत माधुरी बिराजे ॥२॥। | Shringaar - Mukut | NityaPad-174 | Gori |
Aaj laal thaade mukat dharey .. badan lasat makrakrit kundal | आज लाल ठाडे मुकट धरे ॥ बदन लसत मकराकृत कुंडल
रतिपति मनजु हरे ॥ १॥॥ अरुन अधर अरु चिबुक चारु बन्यो दुलरी मोहन माल
गरे। अति सुगंध और चंदन खोर किये पहोची मोतीन की लरे ।।२।॥। कर मुरली
कटिलाल काछनी किंकणी नूपुर शब्दकरे गुन भरे कृष्णदास प्रभु राधा निरस्त
नेन ईत उत न टरे ॥ ३॥। | Shringaar - Mukut | NityaPad-174 | Saarang |
Aaj nandlal pyaaro mukut dharey. swan lasat makrakriti kundal | आज नंदलाल प्यारो मुकुट धरे। स्वन लसत मकराकृति कुंडल
काछनी कटि वनमाल गरे ॥९॥ चंचलनैन विसाल सुभग भाल तिलक दिये
सुंदर मुखचंद चारु रूप सुधा झरे। विचित्र विहारी' प्यारो बेनु बजावत बंसी
बटतें व्रजजन मन जु हरे ॥२॥। | Shringaar - Mukut | NityaPad-174 | Gori |
Aii hoe aaj reejhi houn tihari baanik parr roop chatakaten ataki . | ऐ हो आज रीझी हों तिहारी बानिक पर रूप चटकतें अटकी ।
कही न जात सोभा पीत पटकी कुंडल चटक लटक मुगटकी ।।१॥ कहा री कहों
कछु कहत न आवे सोभा नागर नटकी। सूरदास प्रभु तिहारे मिलनको सुध भूली
घट पटकी ॥२॥ | Shringaar - Mukut | NityaPad-174 | Gori |
Latkat chalat yuvati sukhdani .. sandhya samey sakhamandal mein | लटकत चलत युवति सुखदानी ॥ संध्या समे सखामंडल में
सोभित तन गौरज लपटानी ॥।१॥ मोरमुकुट गुंजा पियरो पट मुख मुरली गुंजत
मृदु बानी। चत्रभुज प्रभु गिरिधर आये बनते ले आरती वारती नंदरानी ॥२॥ | Shringaar - Mukut | NityaPad-175 | Saarang |
Dekhridekh nava kunjghan saghantar thaade girivardharan rangbhine ... | देखरीदेख नव कुंजघन सघनतर ठाडे गिरिवरधरन रंगभीने ।॥
मुगट शिरलटकि कटिकाछनि बेनुकरराधिका संगभुजअंसदीने ॥१॥
मकरकुंडडलअवनझलक अंगपर रहि।॥ मानो चंदनसीतल अंगखोरकीने।। निरख
गोविंद छबी सघन नंदनंदन की बारत नतमनदोउ प्रेमरसभीने ॥। २।। | Shringaar - Mukut | NityaPad-175 | Saarang |
Aavatahe gokulke lochan .. nandkishore yashodanandan | आवतहे गोकुलके लोचन ॥ नंदकिशोर यशोदानंदन
म्दनगोपाल विहर दुखमोचन ।।१॥ गोपवबुंदमें ऐसे शोभित ज्यों नक्षत्र में
पूरणचंद | वनजु धातु गुंजा मणि सेली भेष बन्यो हरि आनंदकंद ।। १॥ बरहा
मुकुट कंठ मणिमाला अद्भुत नटवरवेष हरि काछें ॥ कुंडललोल कपोल
विराजत मोहन वेणुबजावत आछे ।॥।३॥ भक्तवुंद पावन यशगावत यहविध
ब्रजप्रवेश हरि कीनो ॥ परमानंद प्रभु चलत ललित गति यशुमति धाय उछंगहि
लीनो ॥४।॥ | Shringaar - Mukut | NityaPad-175 | Gori |
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