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Kirtan Title | Kirtan | Category | Book-Page# | Raag |
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Leho kanhaiya yashumati maiya tumko chhaak pathaai .. | लेहो कन्हैया यशुमति मैया तुमको छाक पठाई ॥
व्यंजन मी ठे खाटे खारे दधि ओदन लेधाई ॥। १॥
गूँजा लडडुबा उज्बलफेनी मेवा अमृत मिठाई ॥।
ओटयो दूध सद्य धोरीको तामें बहुत मलाई ॥२॥
बेसनके व्यंजन बहुतेरे जो तिहारेचित भाई ॥
जोर मंडली भोजन कीजे हषीकेश बलजाई ॥। ३॥। | Nitya Chaak | NityaPad-200 | Saarang |
Leeje laalan apani chhaak ..| | लीजे लालन अपनी छाक ॥|
जबतें तुम वन आये तबते रहत चढ्यो चितचाक ॥। १॥
देखलेहु नीकेकर सगरे कीने बहुविध पाक ॥
भोजनको बैठे सीतल छायामें उनहीकी ढाक ॥।२॥
होहूं ढिंग बैठों ज्योऊँ तो मेरे चरणकोउतरे थाक ॥
ज्यों भावे त्यों खेलकरो तुम मेरे आगें निशांक ।।३॥
पूरो सकलमनोरथ मेरे हो आई इह ताक ॥॥
रसिकप्रीतम कबके बिछुरे तेंहों आई हो नाक ॥।४॥ | Nitya Chaak | NityaPad-200 | Saarang |
Bahutafiri tumkaj kanhai .. | बहुतफिरी तुमकाज कन्हाई ॥
टेसटेरहों भई बावरी दोऊ भैया तुम रहे लुकाई ॥१॥
जे सबग्वाल गये घरघरको तिनसों कहि तुम छाक मेगाई।।
लोनी दधि मिष्टान्न जोरकें यशुमति मेरे हाथ पठाई ॥२॥
ऐसी भूख मांझ तूलाईतेरी किहि विधि करों बडाई ॥
सूरस्थाम सब सखन पुकारत आवत क्यों न छाकही आई ॥। ३॥। | Nitya Chaak | NityaPad-200 | Saarang |
Dharahi aeka gwar bulaai .. | धरही एक ग्वार बुलाई ।।
छाक सामग्री सबही जोरकें करदे तुरत पठाई॥१॥
क्यो जाय वूंदावन जैयो तू जानत सब प्रकृत कन्हाई॥।
प्रेम सहितले चली छाक कहि है हैं वे भूखे दोऊभाई ॥।२॥
तुरत जाय वृंदावन पहुँची ग्वालबाल कहुं कोउ न बताई ॥
सूरस्थामको टेरत डोलत कितहों लाल छाक मैंलाई ।।३॥। | Nitya Chaak | NityaPad-200 | Saarang |
Chhaakaliye sir sthaam bulawat .. | छाकलिये सिर स्थाम बुलावत ॥
ढूंढत फिरत ग्वालिनी हरिकों कोऊ भेद नहीं पावत ।॥॥१ ॥
टेर सुनत काहूकी श्रवणन नितही तुरत उठ धावत ॥
पावत नहीं स्थाम बलरामहि व्याकुल हवे पछितावत ॥२॥
बृंदावन फिर फिर देखतहै बोल उठे तहां ग्व ाल ॥
सूरस्याम बलराम यहां हो छाक लेहो इन्हें मिलादे लाल ॥३॥ | Nitya Chaak | NityaPad-201 | Saarang |
Jorat chhaak premses maiya .. | जोरत छाक प्रेमसों मैया ॥
ग्वालन बोल लिये अध जेंबत उठ दौरे दोऊ भैया ॥१॥
तबहीतें नहिं भोजन कीयो चाहत दियो पठाय॥
भूखे गये आज दोऊ भैया आपही बोल मँगाय॥२॥
सदमाखन साज्यो दध्चिमीठो मधुमेवा पकवान ॥
सूरस्थामको छाक पठावत कहत ग्वालिन सोजान ॥३॥ | Nitya Chaak | NityaPad-201 | Saarang |
Aaee chhaak bulaaye sthaam .. | आई छाक बुलाये स्थाम ॥
यह सुन सखवा सबे जुर आये सुबल सुबाहु श्रीदाम ॥१॥
कमलपत्र दोनापलासके सबके आगे धरे परोसत जात ॥।
ग्वालमंडलीमध्य स्यामघन सब मिल रुचिकर खात ॥२॥
ऐसी भूख मांझ यह भोजन पठाय दिये कर यशोदामात ॥
सूरस्याम अबलों नहीं जेंबत ग्वालिन करते लेले रद्रात ॥३॥ | Nitya Chaak | NityaPad-201 | Saarang |
Arrie chhaakahaari charpanch aavat madhya vrajarajalalaki... | अरी छाकहारी चारपांच आवत मध्य ब्रजराजललाकी॥।
बहुप्रकार व्यंजन परिप्रण पठवन बडे डलाकी ॥१॥
ठठक ठठक टेरत श्रीगोपालें चहुंधा दृष्टिकरें ॥
बाजत वेणु ध्वनि सुनचली चपलगत परासोलीके परें ॥२॥
परभानंदप्रभु प्रेममुदितमन टेर लई कर ऊंची बांह ॥
हँस हँस कस-कस फेंटा कटिनसों बाँटत छाक वन ढाकन मांह ॥३॥ | Nitya Chaak | NityaPad-201 | Saarang |
Bolat kaanh bulawat gaiya .. | बोलत कान्ह बुलावत गैया ॥
'गिरिगोवर्धन ऊपर ठाढे कर पीतांबर लैया ॥१॥
लागीभूख पियो चाहत है याको पय मथघैया ॥
धारकर देत सबही ग्वालनकूं तब ही छाक पठैया ॥२॥
तिहिं अबसर ग्वालिन बन आईदधिओदन बिधिठैया ॥
भोजन करत सुरत जबकीनी प्रियदयाल बल जैया ॥३॥ | Nitya Chaak | NityaPad-201 | Saarang |
Danghati chhaakaai gokulate kaavar | दानघाटी छाकआई गोकुलते कावर
भर रावलकी रावरेने राखी सबधेर ॥ जानतो जबही देहों नंदजूकी आनखेहों
भोजनकी रहीकछु चाखो एकवेर ॥|१९॥ अतिप्रवीन जान राय कनकबेला
करमेंलिये वाटतमेवा मन प्रसन्न हेर चहुँफेर ॥ सकलपाक परमानंद आरोगत
परमानंद परमानंद टोक करत सुबल टेरटेर ॥२॥ | Nitya Chaak | NityaPad-202 | Saarang |
Dekho tou | देखो तो
मारगमें सब मिल आन कौन हों पठाई ॥ भूलपरी है कैधों विपिनमें पेंडो नाहि
चलाई ॥२॥ किथों हमारे प्रेमविवशतन वापें चल्यो नजाई ।। किथों गोपाल
लेले हो बोलत है गदगदस्वरन सुहाई ।३॥ रहे गोपाल अकेले जब तब ग्वालन
निकट बुलाई ॥ आलिंगनदे महा अधररस सिरतें छाक उतराई ॥|४॥ टेर दई
ग्वालनको मोहन ढिंगही छाक ह॒वेपाई ॥ रसिक प्रीतम को मधुरनाद सुन
ग्वालमंडली धाई ॥५॥ | Nitya Chaak | NityaPad-202 | Saarang |
Dalabharho laal casec uthaaben pathaavon gwal chhaakale aavein .. | डलाभरहो लाल कैसेक उठाबें पठावों ग्वाल छाकले आवें ॥
गिन देखो गांठन जानो कौन कौन
मेवा वसन सुरंग हाहाकर पायन परकें पठावें॥१।॥
आपतब्रजरानी न विचारे मेरे डलापर थार ओदन बेला न समावें ॥
नंददास प्रेमी स्थाम परस पद कही बात्त
काल्हतें जु कांवर भर किंकर बुलावें ॥२॥ | Nitya Chaak | NityaPad-202 | Saarang |
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