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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Raakhat rung girivardharan .. rasrang saras rachyau nritya gati | Part1-350 | राखत रंग गिरिवरधरन ॥ रासरंग सरस रच्यौ नृत्य गति
मनहरन ॥१॥ शरद उड्डपति किरण रंजित बिपिन नाना बरण ॥ तरणि
तनया पुलिन में सुख रासि प्रकटित करण ॥२॥ सुभग युवति कदंब संगीत
सुरत सागर तरण ॥ भर्तू काव्य सुधा सरोवर राज बिहरन ॥३॥ तत थेई
तत थेई थेई शब्द गति उच्चारण ॥ कृष्णदासनिनाथ निज भुज त्रिया उर
विस्तरण ॥४॥ | Kedaro |
Aeka vrajnayak gopkumar sub leenen sanga khelein | Part3-155 | एक ब्रजनायक गोपकुमार सब लीनें संग खेलें
होहोहोरी ॥ इत ब्रजयुवती यूथ मधिराजत श्रीवृषभान किशोरी ॥१॥ इत
ब्रजकुंचर करनलीये राजत रतनखचित पिचकाई ॥ उनकर कमल कुसुम-
नवलासी गावत्ति गारि सुहाई ॥२॥ मोहन संग दुंदुभी डफ सहनाई सरस
धूनि राजे || बीचबीच युवती मनमोहन मह॒वरि मुरलीबाजे ॥ ३॥ स्यामासंग
मृदंग झांझ आबज अनघात बजावे ॥ किन्नरीबीन आदि बाजे साजेजण गणत न आवबे ॥9॥ तब मोहन युवती यूथपर विविध रंग बरसाये ॥ अतिसुख
फाग सोंजलीने उनये मानो नवधन आये || ५॥ तब ललिता चंद्रावली मतोकरि
सुबल सेनदे लीनों | छलबल करि गिरिधर गहिवेकों यह मतोमन कीनों
॥६॥ सखाभेद गिरिधर गहि पाये भये युवतिन मनभाये ॥ आंखि आंजि
गूंथबेनी मृगनयनी भेष बनाये ॥७॥ फग॒ुवाके गहने मोहन मोतिन उरमाल
उतारी ॥ बंसी झटकि लई झुकि प्यारी अधरन विलसन हारी ॥८॥ दीने
छांडि आप भायो करि स्याम सखन में आये ॥ तब अपनी समसर करिबेकों
बलदाऊ पकराये ॥९|| तब हलधर बस परे युवतिनके केसर कलस नवाये ॥
जोइ जोइ विध उपजी जाके जिय तिहिं तिहिं भांति नचाये ॥१०॥ कीनों
बीच सुबल श्रीदामा दाऊ आनि छुडाये ।। फसुवा देन कह्यो मनमोहन ब्रजपति
टेरि सुनाये ॥११॥ तब ब्रजराज बसन भूषनले युवती यूथढिंग आये || अति
आनंद बदन प्रफुल्लित सो दीये बसन मनभाये ॥१२॥ देत असीस सकल
ब्रज सुंदरि रसना नहीं लखकोरी ॥| चिरजीवो मदनमोहन पिय स्यामा स्यथाम
समजोरी ॥१३॥ | Dhanashri |
Humm-tum milli douu khelein horry naba nikunj mein | Part3-328 | हम-तुम मिलि दोऊ खेलें होरी नब निकुंज में
जैये ॥ अबीर गुलाल कुमकुमा केसरि रंग परस्पर नैये | और सखी कोऊ
भेद न जानति ग्वालनि हूँ न जनैये ॥ 'परमानंद' स्वामी-संग खेलत मन-
भावत सुख पैये ॥ | Iman |
Jagoho tum nandkumar | | NityaPad-017 | जागोहो तुम नंदकुमार |
बलबल जाउं मुखारविंदकी गोसुत मेलो करो शुंगार ॥ १॥
आज कहा सोवत त्रिभुवनपति ओर वार तुम उठत सवार॥
वारंबार जगावत माता कमलनयन भयो भवन उजार ॥ २ ॥
दधि मथों नवनीत देहों संगसखा ठाडे सिंघद्वार ।|
उठो क्योंन मोहि वदन दिखावो सूरदासके प्राण आधार ॥।३॥ | Bhairav |
Mukhpar chand daaron vaar.. kutil kachpar bhramar | Part2-364 | मुखपर चंद डारों वार॥ कुटिल कचपर भ्रमर
वारो भ्रोंह पर धनुवार ॥१ ॥ भाल केसर तिलक छबि पर मदन शतशत
बार॥ मानों वहि चली सुधा धारा निरख मन धोंवार ॥२ ॥ नयन खंजन
भृंगवारों कमलके कुलवार॥ मानों सरस्वती गंगा यमुना उपमा डारों
बार॥३ ॥ निरख कुंडल तरणि वारों कूप श्रवणन वार ॥ झलक ललित
कपोल छबि पर मुकुर शतशत वार ॥४ ॥ नासिका पर कीर वारूं अधर
विद्युम बार ॥ दशनपर कण बच्र वारों बीज दाडिम वार ॥५ ॥ चिबुक पर
चित वित्त वारों प्राण वारों डार ॥ सूर प्रभु की निरख शोभा को सके जो
निहार ॥ ६ ॥ | Sorat |
Raaja anang mantrigopal .. kiyo mujra curry chhavaay | Part3-028 | राजा अनंग मंत्रीगुपाल ॥ कियो मुजरा करि छवाय
भाल ॥।भ्रु०॥ प्रथम पठाई नीतिजाय ॥ पुनि सिंघासन बेठे आय ॥ कर
जोरे रहे सीसनाई ॥ विनती करि मांगत राजा राई ॥१॥ फूले चह्ंदिस
तरवरअनेक ॥ बोलत कपोत सुकहंसभेक ॥ अति आमोद भरि छांडेनटेक॥
तहां लेतरास अलिकरि विवेक ॥२॥ तब कियो तिलक रति राजआनि ॥
तबलावत भेटजियडरहिमानि ॥ मनोहरित विछोना रहोठान ।| तरवर
दलांकित ताल जानि ॥३॥ नायकमन भायो कामराज ॥ छांडीसबनते
दुहूँलाज॥| अपनेअपने मिलि समाज ॥ डोलत रससागर चढि जहाज ॥४॥।
अति चतुरराज मंत्री ही देख ॥ तव दियो राज अपनो विसेख ॥ तव अपनो
गोपालदास लेख ॥ छांडो कबहूजिन पलनिमेख ॥५॥ | Basant |
Aalas bhor uthiri sejaten karsun meedat akhiyaan .... | NityaPad-025 | आलस भोर उठीरी सेजतें करसुं मीडत अखियां ॥॥
सगरी रेन जागी पियके संग देखत चकित भई सखियां । १॥
काजर अधर कपोलन पी लगी हे रची महावर नखियां ।।
रसिक प्रीतम दरपन ले प्यारी चीर सँवार मुखढकियां ॥२॥ | Lalit |
Jenwat srivrishbhanandini kaanhakunvarki parchhaai .. jodd jodd | NityaPad-083 | जेंवत श्रीवृषभाननंदिनी कान्हकुंवरकी परछाई ॥ जोड़ जोड़
व्यंजन भावत रुचिसों सोड़ सोइ सब ललिता लेआई ॥।१॥ हितसों जिमावत
मोहन प्यारो मधुमेवा पकव ान मिठाई।॥। अतिअनुराग बढ्योजु परस्पर द्वारकेश
तहां बलबल जाई ॥२॥। | Saarang |
Arrie sakhee pragati paramkripal sadan sutaa vrishbhaanke . vrajvasi | Part1-200 | एरी सखी प्रगटी परमकृपाल सदन सुता वृषभानके । व्रजवासी
सबै आनंद भयो एरी सखी सुन सुन सब व्रजबाल श्रीमुख निरखत आनके ॥१॥
चहुं दिश घुरे हैं निशान झांझ पख्ावज बाजही । एरी सखी मेरी मुर॒ज शहनाई मानों
ज्यों घन गाजही ॥२॥ एरी सखी व्रजजन सजे हैं शृंगार बरन बरन बहु भांतिके।
एरी सखी शोभा बरनी न जाय मानो उदयो रवि कांतिके ॥३॥ एरी सखी
अंगिया पीत सुदेश सारी सुरंग सुहावनी ! एरी सखी लहेंगा ललित सुदेश कटि
फोंदी मनभावनी ॥४॥ एरी सखी रही अलक लर छूट कटि किंकिनी
लटकावही | एरी सखी बरा बिजोठा बीच बाजूबंध बिराज ही )!५॥ एरी सखी
पहुँची पान पछेल चूरी चार सुहागकी । एरी सखी कुमकुम बेंदी बीच मृगमद आड
ललाटकी ॥६॥ एरी सखी लर लटकन लटकाये टेढी सोहत कानमें । एरी
सखी अंगुरिन बिछुवां बीच लाग रहे पन पानमें ॥७।| एरी सखी जेहरी जात
जराय पायल पायन बाजही । एरी सखी करनीके जूथ अति आतुर छै
लाजही ॥८॥ एरी सखी नथमणि जटित जडाय ज्यों मुक््ता जल स्वातिकों ।
एरी सखी त्रिवली तिमनियां हार गजमोतिन बहु भांतिको ॥९॥ एरी सखी
कलश लिये गोपी हाथ कनकथार सब साजही । एरी सखी अंग सुधि गई भूल
तज्यों सबै धरकाजही ॥१०॥ एरी सखी गावत गीत रसाल मंगलचार बधाईयों।
एरी सखी सुनत सब कान भानुराय मनभाइया ॥११॥ एरी सखी कावर ले
सब ग्वाल दथि घृत दूध भरावही एशी सखी नाचत दे किलकार भानजू सीस
नवावही ॥१ २॥ एरी सखी गलिन बीच भई भीर कोऊ डगर नहीं पावही ।
एरी सखी मंदिर सोहत वृषभान हाथ पकर नचावही॥१ ३॥ एरी सखी ले नवनीत
उडाय हरद कपोल लगावही । एरी सखी हँसत सबै व्रजलोग भलो बन्यो ये पाव
ही ॥१४॥ एरी सखी गई सखी एक भाजी ले मुख ललीकों दिखावही । एरी
सखी वाटत मुक्तामाल सबै नोछावर पावही ॥१५॥ एरी सखी जाचक हित
हरिवेश” विमल विमल गुज गावही । एरी सखी राधे चरन प्रताप अठसिधि नवनिधि
पावही ॥१६॥ | Kafi |
Baithi rahee raadhe sakumari | | Part2-246 | बैठि रही राधे सकुमारी |
बूझति है वृषभानु की महरी क्यों न जेंबति बाबा की प्यारी ॥१॥
आजु हमारें गौरी को म्नतु ताकी विधि तोही पें पाऊं।
सुंदर सुभग सलौनौ ढोटा ताकों पूजि हों हाथ जिबाऊँ ॥२ ॥
ऐसौ ढोटा नंदराई को ताकों हों अबही लै आऊँ।
तुम जानों सयानी मईया ! बेगि चलहु चरननि सिर नाऊँ॥।३ ॥
सुनि री जसोमति ! कुँवर आपनौ बेगि पठे हो न््योंतनि आई।
'परमानंद' स्वामी सब जानत देखि-देखि तिहि सब निधि पाई ॥४ ॥ | Saarang |
Raas vilas rachyo naagar nutt .. juri mandal nirtat vraj banita | Part1-326 | रास विलास रच्यो नागर नट ॥ जुरि मंडल निर्तत व्रज बनिता
नवल निकुंज सुभग यमुनातट ॥१॥ उपजत तान बंधान सप्त स्वर बाजत ताल
मृदंग बीन रट ॥ सन्मुख है नाचत पियप्यारी लेत सुधंग चाल गति अटपट॥२॥
रसिक बिहार निरख शशि हास्बौ शरदनिशा भूल्यो अपनी अट ॥ क्ृष्णदास
गिरिधर श्रीराधा राजत मेघ मानों दामिनी घट ॥३॥ | Khat |
Sughar piya shyam ajahu naan aaye dhaam .. sagari raine mohi mug | NityaPad-053 | सुघर पिय श्याम अजहु न आये धाम ॥ सगरी रेन मोही मग
जोवत भई बिसर गयो हरिनाम ॥। १॥। कोन सुघर जिन बस कर लीने राखे चारों
जाम ॥ रसिक प्रीतम रस वाही के भोगी ओरन सो नहिं काम ॥ २॥ | Lalit |
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