top of page
Sheetkal Ke Pad
To get full expanded Kritan text click on any column of the kirtan row in below table.
Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Basant aagam sunder nand nandan joe paaun . | Part3-003 | बसंत आगम सुंदर नंद नंदन जो पाउं ।
कुंवर कपट बनाय जतनसों नीके गिरधरलाल लडाउं ॥ १॥
अति प्रफुल्लित मन हरखत आनंद अपने पियसों उरन मिलाउं |
परमानंदप्रभु या जाडे को देस निकास कराउं ॥२॥ | Malkoos |
Vaishakh maas shubh krishnaekadashi marag kamal | Part2-299 | वैशाख मास शुभ कृष्णएकादशी मारग कमल
वललभ दिनेश॥ प्रगट परमानंद देवीजीव उद्धरन भक्तिमार्ग स्थापि भागे
कलेश ॥१ ॥ श्रुति अर्थकर मायिक मत खंडन त्रिविध लीला मग्न सदा
आवेश॥ जे जाय शरन पाय प्रगट गिरिधरन दासन दास कीनी
द्वारकेश ॥२ ॥ | Sarang |
Atee udaar mohanmere nirakhanen phooleri bichbich | NityaPad-267 | अति उदार मोहनमेरे निरखनेंन फूलेरी बिचबिच
बरुहाचंद फूलनको सेहरो सोहे कुंडलकल श्रवननपर निगम -निगम झूलेरी ॥१॥
'फूलनकी मालगरे चंदन के चित्रकरें पीतांबर फेंट बांधे अंगन अनुकुलेंरी ॥
छीतस्वामी गिरिवरधर गायनको नामलेत टेरत सबठाड़ी भई कदम त रु भुलेरी ॥२॥ | Saarang |
Jai badau baali nandan bali bikat banchar mahadwar raghivurkau biir | Part1-302 | जै बड़ौ बालि नंदन बली बिकट बनचर महाद्वार रघीवुरकौ बीर
आयोौ ॥ पौरितें दौरि दरबान दशशीशसों जाय शिरनाय यौं कहि सुनायौ ॥१॥
सुन श्रवन दशबदन सदन अभिमानकौ नयनकी सैंन अंगद बुलायौ ॥ विविध
आयुध धरें सुभट सबही खरे छत्रकी छाँय निर्भय जनायौ ।।२॥ देख हरि वेष
लंकेश हरहर हँस््यौ सुनहुँ भट कटककौ पार पायौ ॥ देव दानव महाराज
रावण सभा कहनकों मंत्र तहाँ कपि पठायौ ॥३॥ अरे रंक रावण कहा तंक
तेरी इती दुहुँ कर जोर बिनती बितारों ॥ परम गंभीर रघुबीर तन राम पर बीस
भुज शीश दश बारि डारों ॥|४॥ झटकि हाटक मुकुट पटक पट भूमिसों झार
तरबार तुव शिर सिंघारों ॥ जानकीनाथके हाथ तेरा मरन कहा मतिमंद तोहि
मध्य मारो ॥५॥ पाक पावक करे वारि सुरपति भरै पवन पावन करे द्वार
मेरें॥ गान नारद करै वार सुर गुरु कहै वेद ब्रह्मा पढ़े पौर टेरें ॥६॥ यक्ष
बासुकी प्रभृति नाग गंधर्व मुनि सकल विश्वजीत मैं किये चेरे | अरे सुन
शठ दशर्कंधकों कौन भय राम तपसी आय किये डेरे ॥७॥ अरे तप बली
सत्य तापेश्वरी तप बिना कौन पाषाण तारे ॥ कौन ऐसौ सुभट जगत जननी
जन्यौ एकही बाण तक बालि मारे ॥।८॥ परम गंभीर रघुबीर दशरथ तनय
शरन गये कोटि अवगुण बिसारे ॥ जाहि मिल अंध दशकंध गहि दंत तृण
तो भलें मृत्यु मुख ते उबारे ॥९॥ कोप करबाल गहिकाल लंकाधिपति मूढ़
रिपु रामकों शीश नाऊँ ॥| शंभुकी शपथ सब कुप्थ कायर कृपण श्वास
आकाश बनचर उड़ाऊँ ॥१०॥ परहिं भैराय भभकंत रिपु धाय सो कर कदन
रुधिर भेरों अघाऊँ ॥ सुभट साजे सबै देव दुंदुभी अभे एकतें एक रणकर
दिखाऊँ ॥|१९१॥ चढ़च रावण सुन्यौ शीश तब शिव धुन्यौ उमग रणरंग
रघुवीर आयौ ॥। रामशर लागि जनु आगि मभिरि प्रज्वलित छाँड़ि छिनु सीस
नभ भातु छायौ ॥१२॥ रुंड भुकरुंड धुक परत छर धरनि पर रुधिर सरिता
समर पार पायौ ॥ मार दशकंध नृप बँधुकृत सूर प्रभु जानकीनाथ गृह सीय
लायौ ॥१३॥
| Maru |
Nandju tumaaren jaayau poot | kholi bhandar abb dehu badhaai tumare | Part1-048 | नंदजु तुमारें जायौ पूत | खोलि भंडार अब देहु बधाई तुमारे
भागि अद्भुत ॥१॥ ले ले दधि घृत दे हरी पखारी तोरन माल बेंधाई । कंचन
कलश अलंकृत रतनन विप्रन दान दिवाई ॥२॥ विप्र सबै मिलि करत वेद
ध्यनि हरखित मंगल गाये | सब दुख दूरि गये परमानंद आनंद प्रेम बढ़ाये ॥३॥
| Sarang |
Vrajamen gharghar anand aaj .. poot bhayauri nandmaharken sakal | Part1-016 | व्रजमें घरघर आनंद आज ॥ पूत भयौरी नंदमहरकें सकल
घोष सिरताज ॥१) ग्रहगृहत े सुनि सुनि चलीं गोपी हाथन मंगल साज ॥
नाचत हँसत करत कुतूहल गावति सुघर समाज ॥२॥ दूध दही घृत काँवरि
भरि भरि आये गोप बहु गाज ॥ छिरकत आपु समांझ परस्पर छांडि सकल कुल
लाज ॥३॥ बाजत ताल पखावज आवज ढोलक बीना झांझ ॥ सूरदास प्रभु
प्रकट भये हैं भूमी भार उतारन काज ॥४॥ | Devgandhar |
Vundaavan navan | NityaPad-211 | वुन्दावन नवन
कुंज भमर भ्रमत करत गुंज कुसम पुंज ललित लता गहेबर बन नीको ॥
जमुनातीर आजन खरीःहरी गाय चखेेको: प्यारी को धाम लाल भांवतो हे
जीको ॥१॥ रूच ऊपजत छाक खात सखन सहेत अत अघात प्रमुदित मन
होत आनंद क्थोंन परत हीयको ॥ कृष्णदास गिरधरको कोटिक सुरपुर विमान
कुसम वृष्टि करें ओर या सुखते फीको ॥२॥ | Saarang |
Rasik shiromani raag kalyan | NityaPad-310 | रसिक शिरोमणि राग कल्याण
गावे॥ अवघर बिकट तान तरंग भेद उपजाबे ॥१॥ सब विध सुघर सुजन
सुंदरमोहन वेणु बजावे ॥ गोविंद प्रभु को वृषभान नंदिमी रीझ प्यारी कंठ
लगाबवे॥२॥ | Kalyan |
Podhe rung ramniyaraman .. | NityaPad-345 | पोढ़े रंग रमनीयरमण ।।
कुसुमसेज संवार सखीरी कुंजकुसुमन भवन ॥ १॥|
रसिक मुदित अपारसुखनिधि कोककोटिक वदन ॥
अतिआनंदित मिलेदोऊ सुखद सीतल पवन ॥२॥
तरणितनयातीर सुभगसरोज चांदनीकिरण ॥
गाऊंगीत पुनीत सूरप्रभु सुनतश्रव ण ॥३॥ | Bihaag |
Aabe maaee ! nandanandan sukh-dainu | sandhya samai goplak sanga aagein | NityaPad-108 | आबे माई ! नंदनंदन सुख-दैनु | संध्या समै गोपलक सँग आगें
राजत घैनु ॥ गोरज-मंडित अलक मनोहर, मधुर बजावत बैनु | इहि विध घोष
मांझ हरि आवत सब कौ मन हरि लैनु ॥ कियौ प्रवेस जसोदा-मंदिर जननी मधि
प्यावति पथ-फैनु । छीत-स्वामी गिरिधरन-वदन-छबि निरखि लजानोौ मैनु |। | Gori |
Yeh peetpat kahaan tey paayau . itani preet gupt mohan kii | Part1-211 | यह पीतपट कहाँ ते पायौ । इतनी प्रीत गुप्त मोहन की
तैं राधे त्रैलोक सुनायो ॥१॥ ना याको मूल ना याको ग्राहक ना लीयौ मोल
ना घर उपजायौ । एक बेर खेलत वृंदावन बोहोरि जान कर मोहि उ़ायो ॥२॥
सुमिर्त भजत ब<ू७ उर अंतर एही मिस करि लाल न समुझायौ ! प्रीतकी रीत
चतुर सोइ जानें परमानंद प्रभु मो बोहोरायौ ॥३॥ | Bilawal |
Umangi vrindavan dekhon naval-badhu aabai .. aaj | Part3-064 | उमँगी वृंदावन देखों नवल-बधु आबै ॥ आज
सखी ब्रजराज कौ बसंत लै बधावे || १॥| चारु चंदन चरचित अरचित तिलक
दे सिर नावै ॥ देखति सुख लागति नीकौं बुँद बूँद गावे ॥|२॥ कुंज भवन
ठाढे हरि सुनि सुनि सचु पावै ॥ 'छीत स्वामि” गिरिधरन श्रीविद्वल ब्रजजन
मन भावें ॥३॥ | Basant |
Page 1 of 1
bottom of page
