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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Hoe hoe horry rung badhaaven nand pauri vraj sundari | Part3-298 | हो हो होरी रंग बढावें नंद पौरि ब्रज सुंदरी
आवें ॥१॥ केसर के मढ़का भर आनी ॥ मृग मदमेलअगरशत सानी ॥२॥
उडत गुलाल भई अंधियारी ॥ उमग पिया उरलागी प्यारी ॥३॥ ब्रजकी
नारि सबें जुरआई ॥ फगणुवा देहों कुवर कन्हाई ॥७॥ रामदास प्रभु की
बलिहारी ॥ करो अखिल युगराज विहारी ॥५॥ | Gouri |
Kridati vrindavan chand vraj jubtin sange .. bhaav | Part3-065 | क्रिडति वृंदावन चंद ब्रज जुबतिन संगे ॥ भाव
पूरि भरित नैंन सुचित भुव भंगे ॥ १॥ इक रूप सुधा सिंधु नैन खची पीवे ॥
इक अंग रस भरि भुजा लाई रही ग्रीवे | २॥ इक लेति तँबोल अधर छुवाबैं ॥
इक ऑअँक भरति इक आप ऑक आवेँं ॥३॥ इक बेन सुर समान उघटि
तान गाबै || इक कुचन मँडलमें चरन कमल जावें ||४॥| चुंबति इक बदनकमल
चिबुक गहे बाला ॥ इक उरज कुँमकुमतें चरचत बन माला ।। ५॥| इक नीबी
मोचन भए सचिकित भए नैंना ॥ इक नैंन देति पैलैं इक कहति बेना ॥६॥
इक चलित पवन ललित आअँचरन सह्ायारै इक ॥ सिथल बसन केस लाज
तजि निहारै ॥७॥ स्याम द्रुम रसाल बाला कोकिल श्रम कुंजे ॥ 'रसिक'
मनोरथ राधे राधे सम पूजे ॥८॥ | Basant |
Ritu palti mope rahmo najaay .. madhukar maadhon | Part3-051 | रितु पलटी मोपे रह्मो नजाय ॥ मधुकर माधों
सो कहीयो जाय ॥श्रु०॥| बहुवास सुबास फूली है बेलि | अरू बने कोकिला करति केलि ॥| मधुप तापतन सह्यो नजाय ॥ पिय प्रान गयें कहा करिहो
आय ॥१॥ प्रिय प्रान रहत हैं अवधि आस ॥ पिय तुमबिन गोपी अति
उदास ॥ सूरदास इमबदतिबाल | पिय तुम बिन गोकुल कोनहाल ॥२॥
| Basant |
Bunny mohansir paag sankare pechan chokri .. kulhai surang | NityaPad-060 | बनी मोहनसिर पाग सांकरे पेचन चोकरी ॥ कुल्है सुरंग
कुसुम भरी और सेहरो चंपकभरी छबि लाग ॥१॥ सूथनलाल पीतवरुनी और
अरगजा मोजें शोभित स्थाम सुभाग ॥ गोविंदप्रभुकों ब्रजवासिन प्रति छिन
छिन नव अनुराग ॥।२॥। | Kalyan |
Nainan nirakh hari kau roop | | NityaPad-101 | नैनन निरख हरि कौ रूप |
निकसि सकत नहीं लावनि-
निधि तें मानों परूयो कोऊ कूप ॥१॥
छीत-स्वामी गिरिधरन विराजित नख- सिख रूप अनूप।
बिनु देखें मोहिं कल न परत छिनु सुभग बदन छबि- जूप ॥ २॥ | Aasawari |
Podhe navalan laal girdhari .. | NityaPad-061 | पोढे नव॒ल लाल गिरधारी ॥
रंग महेल में रति सुखशब्या संग शोभित बृखभान दुलारी ॥१॥|
ल ाल झरी को वागो बन्यो अति लाल कुल्हे शोभित अति भारी ॥
सूथन चरन बनी अति गाढी झलमलात बीच झरतारी ॥। २॥।
अतलरू को लहेंगा प्यारी कटि कंचुकी झुमक सारी ॥
मधुरे सुर गावत केदारो मीठीतान लेत सुखकारी ॥।३॥
परदा परे मनोहर द्वारे दिषक ज्योत सरस उजियारी |
चत्रभुजदास निरख दंपत सुख तन मन धन कीनो बलिहारी ।४॥ | Bihaag |
Myrie saanvaro jabate drishti paruyo .. vesh kishore sthamghansundar | NityaPad-115 | माईरी सांवरो जबते दृष्टि परुयो ॥ वेष किशोर स्थामघनसुंदर
अंग अंग प्रेम भरद्ो ॥१॥ टेढी पाग लटकी रही वामभाग तापर पेच जराय
जरदओो ॥ साजे बागे रस अनुरागे मनमथ मानहरद्यों ॥२॥ मोतन हेर हसे
मनमोहन तबते सुधिबुद्धि सब विसरओ ॥ अ्रीविद्डलगिरिधरन छबीलो
नयननमांझ अरदयो ॥।३॥। | Adano |
Laalhin sundhan laalahi bago laalahi paag bunny atibhari .. | NityaPad-066 | लालहीं सुंधन लालही बागो लालही पाग बनी अतिभारी ॥
लालही ठाडे आभूखन राजत लालही लाल बव्रखभान दुलारी ॥१॥
लालके चरण जेहर अति राजत हार हमेल सोहत गिरिधारी ।
दरपनले निरखो मनमोहन गोविंद बलबल हारी ॥ २।। | Saarang |
Jamunajal kreedat nandanandan.. gopi vrind manohar | Part2-340 | जमुनाजल क्रीडत नंदनंदन॥ गोपी वृन्द मनोहर
चहुंदिश मध्य अरिष्ट निकंदन॥१॥ छिरकत पानि परस्पर शोभित
शिथिल होत भुजबन्धन | ज्ुः यु वती पूजत अहिपतिकों लग्यों अंगअंगपें
चन्दन ॥२॥ कुटिल केश अंबुकन चूबत अग्र मतिमंदन॥ जनु गंडूक कमल रस मुखभरि डारत अलि आनन्दन॥३ ॥ दुरि मुरि अंस
अगाध चलत ले जनु लुब्धक खग फंदन॥ सूरश्याम श्रीपतिके गुनकों
गावत हें श्रुति छंदन ॥४ ॥ | Todi |
Tumhari harey kewalchir_.. karat | NityaPad-033 | तुमहरि हरे केवलचीर_॥ करत
मुरलीवसनभूषणपराक्रमकुलधीर ॥१॥
तुम आपजाय मनायलावत चतुरहलधरवीर ॥|
मुरलीकाध्वनि सुनत व्रजपति मनहिंहोतअधीर ।। २॥ | Ramkali |
Kusum kunj madhi karat singar .. | NityaPad-155 | कुसुम कुंज मधि करत सिंगार ॥
प्यारी पियहीं फुलेल लगावत कोमल कर सुरजावतवार ॥ १॥
चंदन घसि अंग मज्जन कीनो यमुना जल झरी कर धार ॥|
न्हाय बहीरी अंग पोंछि स्वच्छ कर सरस बसन पहरावत हार ॥२॥
पीत पिछोरी बांधि फेंट कसि तापर कटि किंकिनी झनकार॥।
फेंटा पीत शीश वांध्यो कटि दुहु दिश अलक लटकि घुघरार ॥ ३॥|
दोउ चरन नूपुर धुन बाजत कंठ पदक सुज मुक्ताहार॥
बाजु बंध जटित हथ पोची पुष्पमाल पहरें करि प्यार ॥।3॥
पुष्प गुच्छपर मोर चंद्रिका ले दर्पन देखत रिझवार।|।
चतुर्भुजदासश्याम मुख निरखत तन मन धन कीनो बलिहार ॥५॥ | Devgandhar |
Ratipathprakat karanakun prakate karunanidhi | Part2-296 | रतिपथप्रकट करणकुं प्रकटे करुणानिधि
श्रीवल्लभ भूतल॥ हलसे ॥ ह्लसे सकल दैवीजनके मन साधन विन हमपावेंगे
फल॥१॥ तिमिर नसायो पंथ दिखायो वेद वचनबल ॥ यह
मारग जो दृढ तिनको हरि मेलतमुखमें पत्र कुसुमजल ॥२ ॥ सींचत वचन
सुधाकर सेवक मारग रिपु दाहे वचनानल॥ सेवारस सागर प्रकटायो
बदन अनलतें अतिशय शीतल ॥३ ॥ उपजत ताप छिनक सानिध्यमें देत
विरह आनंद रस केवल॥ देखो संत विचार चारु चित्त श्रीगोकुलपतिहें
यह निश्चल ॥४॥ दे चरणोदक दोष निवारे सूबे किये काल कलिके
खल॥ रसिक भजत नित्य श्रीवल्लभ पद ते बडभाग्य सदा मन
निर्मल ॥५ ॥ | Sarang |
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