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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Eeman maan mero kahyo kaheki pyaare pyaari thu ..
Part3-008
ईमन मान मेरो कह्यो काहेकी प्यारे प्यारी तु ॥ प्रथमही भरी गुन माईए यही ते सुघराई होतु ॥१॥ मालकौंस की तान ले ले राखत रूप बिहाग ॥ द्वारकेस प्रभु बसंत खिलावत याही ते बढत सुहाग ॥२॥
Iman
Ilamma srivallabh god khilawat .. god
Part2-327
इलम्मा श्रीवललभ गोद खिलावत ।। गोद खिलावत मन हुलसावत कर गहि चंद दिखाबत ।। ९।। रुनन झूनन पग पेंजजी बाजत लाल घुटुरुवन धावत ।। श्रीलक्षमणभट निरख प्रफुल्लित सूर निरख जस गावत ।। २।।
Aasawari
Kahaari
NityaPad-315
कहारी कहों मोहन मुखशोभा ॥ कहा करूं सिरपरीहै ठगोरी रूपदेख मेरो मन भयो लोभा ॥१॥ अंग अंग लावण्यरूप छबि मानोंहो मदन द्रुम उपजी गोभा ॥ कृष्णदास गिरिधरन किये वश चपल कटाक्ष गढ़यो मनचोभा ॥२॥
Adano
Surangi horry khele sambro vraj vrindavan
Part3-231
सुरंगी होरी खेले सांबरो ब्रज वृंदावन मांझ ॥ सुंरगी ॥ ब्रज की नवल जु नागरी घिर आईं सब सांझ ॥ सुरंगी ॥१॥ सरस वसंत सुहाबनो ऋतु आई सुखदेन ॥ माते मधुपामभुपनी कोकिल कुलकल वेन ॥२॥ फूले कमल कलिंदजा केसू कुसुम सुरंग ॥ चंपक बकुल गुलाल के सोंधे सिंधु तरंग ॥ ३॥ सुबल सुबाह श्रीदामा पठये सखा पढाय ॥ वाजे साजे बनरंगी लीने मोल मढाय ॥४७॥ झांझ मुरज डफ बांसुरी भेरिनकी भरपूर ॥ फूंकन फेरी फेरिके ऊँची गई श्रुति दूर ॥५॥ ब्रजको प्रेम कहा कह्ूं केसर सों घटपूर ॥ कंचन की पिचकाईयां मारत हैं तकदूर ॥६॥ आंधी अधिक अबीर की चोवा की मची कीच ॥ फेली रेल फुलेल की चंदन बंदन बीच ॥७॥ ब्रजकी नवल जु नागरी सुंदर सूर उदार ॥ खेलन आई सबें जुरी श्रीराधा के दरबार ॥८॥ फूल डंडा गहि हाथ सों मारत वांड उठाय ॥ चंचल अंचल फरहरे पेने नयन चलाय ॥५९॥ श्रीराधा की प्रिय सखी ललिता लोल सुभाय ॥ छलकर छेले छिरककें हंसि भाजी डहकाय ॥| १ ०॥ नारी को भेष बनायकें पठयो सखा सिखाय || अतिही अधिक कहावती ललिता भेटी जाय ॥। १ १॥ गेंदुक कीनी फूलकी दीनी श्रीराधा हाथ ।| आय अचानक ओचका तक मारी ब्रजनाथ |।|१२॥ ब्रज की वीथनि सांकरी उत यमुना को घाट ॥ बलदाउ को बोलकें दीने गाढ़े कपाट ॥ १ ३॥ हलधर हैं जु महाबली सांचे हैं बलरास ॥ बलिको बलजो कहा भयो गष्ठि बांधे भुज पास ॥१४॥ नयनन अंजन आंजिके सोंधो ऊपर डार ॥ पाय परि द्वारे पटदये रसकी रास विचार ॥| १५॥ फिर भाजी सब दे दगा आनन दीने और ॥ मदन गोपाल बुलायकें गहिलाईं वरजोर |॥|१६॥ गिरिधारद्यो करवामसों खरमारयो गहिपाय ॥ तिनको भार कहा भयो ललिता लेत उठाय ॥१७॥ घरमें घेर सबें चली श्रीराधा कों संगलेत ॥ दोऊ जनओेंच मिलायकें नयनन को सुखदेत।। १ ८॥ तब ललिता हँसियों कह्यो श्रीराधा कों सिरनाय ॥ नीलांबरसों ढांपकें मुख मूंचझो मुसिकाय ॥१९॥ उतश्रीदामा अचगरो इतललिता अतिलोल ॥ बीच विसाखा साखिदे मुरली मांगत ओल |॥२०॥ ब्रजवासी वृषभान को मदनसखा वाको नाम ॥ स्याम मतेकोमिलनियां बसकीनों सब जाम ॥|२१॥ पठयो मदनवसीठही ढीठ महा मदलोल ॥ छिन ओरे छिन ओर न्हे छाक्‍्यो छेलदुछोल ॥२२॥ मदनामदन गोपाल को हलघर को लेआय ॥ श्रीराधा की दिसजायकें चांपतहें हँसिपाय ॥|२३॥ श्रीदामा हँसियों कह्यो मेवा देहु मंगाय ॥ नेंक हमारे श्याम कों आनन को मधुप्याय ॥२४॥ भाग सुहाग सबें बढ्यो खेलत फाग विनोद ॥ राधा माधो बैठारे ब्रजरानी की गोद ॥२५॥ भूषण देत यसोमति पोहोंची पान पछेल ॥ टीको टीकी टीकाबली हीरा हार हमेल ॥२६॥ श्रीविद्दल पद पद्म की पावन रेणु प्रताप ॥ छीत स्वामी गिरिधर मिले मेटे तन के ताप ॥२७॥
Sarang
Kisalayashayantale kurukamini charananlinvinivesham ....
NityaPad-330
किसलयशयनतले कुरुकामिनी चरणनलिनविनिवेशं ॥॥ तवपदपलल्‍लव वैरिपराभवमिदमनुभवतु सुवेशं ॥१॥| क्षणमधुना नारायणमनुगत - मनुसर मां राधिके ॥ध्वु।। करकमलेन करोमि चरणमहमागमितासि विदूरं ॥ क्षणमुपकुरु शयनोपरिमामिव्र नूपुस्मनुगतिशूरं ॥२॥ वदनसुधानिधि गलितममृतमिव रचयवचनमनुकूल॑ ॥ विरहमिवापनयामि पयोधर रोधकमुरसिदुकूलं ।।३॥ प्रियपरिरंभण रभसवलितमिव पुलकितमन्यदुरापं ॥। मदुरसिकुच कलशं विनिवेशय शोषय मनसिज ताप॑ ॥ ४॥ अधरसुधारसमुपनय - भामिनी जीवयमृतमिव दासं ॥ त्वयिविनिहित मनसं विरहानलदग्ध वपुषमविलासं ॥५॥ शशिमुखिमुखरय मणिरसनागुण मनुगुणकंठ निनादं ॥ ममश्रुतियुगले पिकरवविकले शमयचिरादवसादं ॥६॥ मामतिविफल रुषाविफलीकृतमवलोकितुमधुनेदं | मीलतलज्जितमिवनयनंतव विरमविसूज रतिखेद॑ ॥७॥ श्रीजयदेवकवेरिदमनुपद निगदितमधुरिपुमोदं।। जनयतु रसिकजनेषुमनोरघ रतिर्सभावविनोदं ॥८॥
Bihagaro
Bnajpur baajat sabahinake ghar dhol damamabheri..
Part2-044
ब्नजपुर बाजत सबहिनके घर ढोल दमामाभेरी॥ श्रीगोवर्द्गनकी पूजाकों कहत सबनसों टेरी ॥१॥ अन्नकूट बहु भांत बनावत रच पकवानन ढेरी॥ नंदराय पूजत परवतकों लाओ गायनघेरी ॥२ ॥ धूमर गांग बुलाई ऊपर लालन उपरेनी फेरी॥ सुबल सुबाहु कूकदे दोरे नाहि लगाओ बेरी ॥३॥ डाढ़मेल घूमरकी बछोयां लावो पूंछ छंछेरी ॥| देखत परमानंद सबनकों गायनलियोहे झंझेरी ॥४ ॥
Sarang
Or raag sub bhaye baaraati doolhe raag basant ..
Part3-033
ओर राग सब भये बाराती दूल्हे राग बसंत ॥ मदन महोच्छक आज सखिरी बिदा भयौ हेमंत ॥१॥ मधुरे सुर कोकिल कल कूजत बोलति मोर हँसत ।| गावति नारि पंचम सुर ऊँचे जैसें पिक जुनवंत ॥ २॥ हाथन लई कनक पिचकाई मोहन चाल चलंति ॥ 'कुंभनदास' श्यामा प्यारी कों मिलयो हे भाँमतो कंत ॥३॥
Param manohar banyau haye palana jhoolat haye nandlal . jasumati
Part1-108
परम मनोहर बन्यौ है पलना झूलत है नंदलाल । जसुमति माय झुलाय हरखसों निरख हँसत ब्रजबाल ॥१॥ फूल पलना मध्य झूलत ललना झूलत परम रसाल । कृष्णदास प्रभुकी छबि निरखत वारत मुक्तामाल ॥२॥
Aasawari
Pakade vrajajan giridhari .. umang bharee gopi
Part3-217
पकड़े ब्रजजन गिरिधारी ॥ उमंग भरी गोपी सब आई || खेल मचायो भारी ॥ खेंचलेई पीतांबर मुरली || हां हां करत मोरारी ॥ हँसी सब देकर तारी ॥१॥ जीही जपत मुनिवर ज्ञानी ॥ सकल वासना टारी ॥ शारद शेष पार नहिं पावत ॥ जीहीं जपे त्रिपुरारी ॥ ताकुं गोपी देत हैं मारी ॥२॥ काल को काल ईश को ईशन ॥ जीत लीयो सुकुमारी ॥ कर जोरी के पीतांबर मांगत ॥ दो दो मुरलीया प्यारी ॥ जाओ अब जी तुम्हारी ॥३॥ भक्त आधीन निगम मित गाबत ॥ मुनिवर कहेत बीचारी ॥ सूरदास के प्रभु रसीले ॥ बार-बार बलिहारी ॥ मगन कीनी ब्रजनारी ॥४॥
Kafi
Ramkrishna ooth kaheeyen bhor..
Part2-264
रामकृष्ण ऊठ कहीयें भोर॥ यह अवधेश वेब्रजजनजीवन यह धनुष धरन वे माखन चोर ॥१ ॥ इनकें चमर छत्र शिरसोहें उनकें लकुट मुकुट कर जोर॥ जनकलली राजत इनके संग उनसंग राधा करत कलोल ॥२॥ इनसंग भरत शत्रुघ्न लछमन बलदाऊ संग नंदकिशोर ॥ इन सागरमें शिला तराई उन गोवर्धन नखकी कोर ॥ इनभार्यो लंकापति रावन उनमार्यों कंसा बरजोर ॥३ ॥
Bibhaas
Adbhut aeka anupambagh || yugalkamal parr gajwar kreedat
NityaPad-158
अद्भुत एक अनुपमबाग || युगलकमल पर गजवर क्रीडत तापरसिंहकरतअनुराग ॥ १॥ हरिपरसरवरसरपरगिरिवर तापरफूलेकंज पराग ॥। रुचिरकपो ततसत ताऊपर तापरअरुणअमृत फललाग ।।२॥ फलपरपुष्प पुष्पपरपललव तहांवसतशुकपिकमृगखाग || खंजनधनुषचंद्र ताऊपर तहींबसत एक मणिधरनाग ॥ ३॥ यहरसविरसहोतनहीं कबहू शोभानेक करत नहिं त्याग ॥ सूरदासप्रभुवसतनिरंतर तिहिंहित बाढ्यों सिंधुसुहाग ॥४॥।
Bilawal
Dey hoe laal idhuria merrie aeye hoe nihori keejat hott abaar..
Part1-257
दे हो लाल ईढुरिया मेरी ए हो निहोरी कीजत होत अबार॥ मेरे संगकी दूर जात बल कौन टेव यह तेरी ॥१॥ यद्यपि गामके ठाकुर सबके भामते तुम पैड़ेमें ब्रजबधू वन राखत घेरिघेरी ॥ गोविंदप्रभु रसमत्त परस्पर चलेरी जहाँ तहाँ कुँजगली अंधेरी ॥२॥
Kanharo
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