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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Aaj nahaao merey kunwar kanhaiya maani kaal diwari.. | Part2-038 | आज नहाओ मेरे कुँवर कन्हैया मानी काल दिवारी॥
अति सुगंध केसर उबटनों नये वबसन सुखकारी ॥१॥
कछु खाओ पकवान मिठाई हों तुम ऊपरवारी॥
कर श्रृंगार चले दोउभैया तृणतोरत मेहतारी ॥२ ॥
गोधन गीत गावत ब्रजपुरमें घरघर मंगलचारी ।।
कृष्णदास प्रभुकी यह लीला गिरिगोवर्द्धनधारी ॥३ ॥ | Devgandhar |
Sodhen nhaay bethi peheripar bhushan jahaan phoolwari tahaan sukbat alaken. | NityaPad-057 | सोधें न्हाय बेठी पेहेरिपर भूषन जहां फूलवारी तहां सुकबत अलकें।
सो मास कलकरनख केससंभारत मानो उडगन में उडपति झलके ॥। १
विविध शुंगार लिए गडी पिय सखी भरिआये आनंद रति पति दलके ॥
हरीदास के स्वामी स्थामा कुंज बिहारी छबि निरखत लागत नहीं पलकें ॥२॥ | Todi |
Yamuna tata navanikunj dram navdal pahup punj tahaan rachinagarvar rawati usirki .. | NityaPad-245 | यमुना तट नवनिकुंज द्रम नवदल पहुप पुंज तहां रचीनागरवर रावटी उसीरकी ॥
कुंकुम घनसार घोर पंकज दल बोरबोर चरचत चहूंओर अवनि पंकज पाटीरकी ॥१॥
शोभित तन गौर स्थाम सुखद सहज कुंजधाम परसत सीतल सुगंध मंदगति समीरकी ॥
नंददास पियप्यारी'निरख सखी ललिता ओट श्रवणन धुनि सुन आज किंकिणी मंजीर की ॥२॥ | Saarang |
Aatthon bilas kiau shyamaju shantankund praveshju .. unaki | Part1-308 | आटठों बिलास कियौ श्यामाजू शांतनकुंड प्रवेशजू ॥ उनकी
मुख्य भामा सारंगी खेलत जनित आवेशजू ॥१॥ सूरज मंदिर पूजन कर मेवा
सामग्री भोगधरी ॥ आनंद भरी चली ब्रज ललना क्रीड़न बनकों उमगि
भरी ॥२॥ भद्बबन गमन कियौ बनदेवी पूजन चंदनवंदन लीने ॥ भोग
स्वच्छ फेनी ऐनी सब अंबर अभरनचीने ॥३॥ गावत आवत भावत चितवत
नंदलालके रसमाती ॥ कृष्णकला सुंदर मंदिरमें युवती भई सुहाती ॥४॥
देखि स्वरूप ठगी ललना त े चकचोंधीसी लाई ॥| अँचवत टूगन अघात दासरसिक
बिहारिन राई ॥५॥ | Malav |
Mohan maangat goras daan . kanak lakut curr lasat subhag | Part1-221 | मोहन माँगत गोरस दान । कनक लकुट कर लसत सुभग
अति कही न जात पियवान ॥१॥ अति कमनीय कनक तन सुँदरि हँसि परसत
पिय पान । श्री विइलगिरिधरन रसिक वर माँगत मृदु मुसिकान ॥२॥ | Devgandhaar |
Biyaru karat haye balbir .. aspas sub sakhamandali | NityaPad-299 | बियारु करत है बलबीर ॥ आसपास सब सखामंडली
सुबल सखा मति धीर ॥ १॥। मधुमेवा पकवान मिठाई ओट सिरायो क्षीर॥। हँसत
परस्पर खात खबावबत झपट लेत कर चीर ॥ २।। यह सुख निरखनिरख नंदरानी
प्रफुल्लित अधिक शरीर ॥ परमानंददासको ठाकुर भक्तहेत अवतीर ॥३॥ | Kanharo |
Dekhori yeh chandan pahere thaade kadamki chhaani... | NityaPad-320 | देखोरी यह चंदन पहेरे ठाडे कदमकी छांई॥।
कदम्बकी डारतर सुंदर खसखानो रच्यो कुसुमनसे सेज बनाई ॥१॥
बिंजना ब्यार करत ललितादिक छुटत फुहारे फुही ॥
झरनाझर लाइ सीतल मंद सुगंध ब्यार चलत तहां बैठे अधिक छबि छाई ॥
श्याम सुन्दर और कुंवर राधिका बैठे डार दोउ गल बांही ॥
हरिनारायन श्यामदासके चेरे इने नवनिधि दूजे अष्ट महासिद्धि पाई ।।२॥ | Kalyan |
Pyaari tero mangarh kaun utaare .. dinn prati | Part3-359 | प्यारी तेरो मानगढ कौन उतारे ॥ दिन प्रति
नौतन होत सखीरी कौन काज बिचारे ॥१॥ तेरे मन कछु ओर सखीरी
मेरे मन जो उचारे ॥ काहू मिसले रंगन भरीरी गिरधर लाल समारे ॥२॥
यह समयो है दिवस चार को को यह न्याव विचारे ॥ हित हरि वंश पुलिन
यमुना तट लालन दृगन निहारे ॥
| Bihag |
Baajat mangalchar badhchai.. | Part2-284 | बाजत मंगलचार बधचाई॥
प्रकटे श्रीवललभ श्रीलक्ष्मणगृह धन्य इलंमा माई ॥१ ॥
उघरे भाग्य देवीजीवनके जिन ऐसी निधि पाई॥
ब्रजवललभ मुख कमल मनोहर द्विजवर देह धराई॥२॥
नाचत गावत गुणीजन सज्जन मोतिन च्ञौक पुराई ॥
तोरण बंदनवार द्वारपें जयजयकार सुहाई ॥३ ॥
वदि बैशाख एकादशी शुभ दिन आनंद उर न समाई ॥
हरि-जीवन प्रभु श्रीवललभकी बार बार बलिजाई ॥४ ॥। | Bilawal |
Chalo queyon naan dekheri kharey douu kunjanki parchhaanhi .. | NityaPad-314 | चलो क्यों न देखेरी खरे दोऊ कुंजनकी परछांही ॥
एक भुजा गहि डार कदंबकी दूजीभुजा गलबांही ॥१॥
छबिसों छबीली लपट लटक रही कनकवेली तरुतमाल अरुझाई ॥
हरिदासके स्वामी स्थामा कुंजविहारी रंगेहैं प्रेमरंग माँही ॥॥२॥॥ | Adano |
Aaj vrajrajkau lalan thaadho sakhee lalit sanket butt nikat sohai .. | Pustak1-327 | आज ब्रजराजकौ ललन ठाढ़ो सखी ललित संकेत बट निकट सोहै ॥
देखरी देख अनिमेष या भेखकों मुकुटकी लटक त्रिभुवनहिं मोहै ॥१॥
स्वेदकन झलक कछु झुकीसी पल्रक प्रेमकी ललक रस रास कीये ॥|
धन्य बड़भाग वृषभान नृप नंदिनी राधिका अंस पर बाहु दीये ॥२॥
मनि जटित भूमि पर रही नवलता झूमि कुंज छबि पुंज बरनी न जाई ॥
नंदनंदन चरन परसि हित जानकें मुनिन के मनन मिलि पाँति लाई ॥३॥
महा अद्भुत रूप सकल रस भूप यह नंदनंदन बिना कछु न भावै ॥
धन्य हरिभक्त जिनकी कृपातें सदा कृष्णणुन गदाधर मिश्र गावै ॥४॥ | Khat |
Dhanteras dinn atee sukhdai... | Part2-036 | धनतेरस दिन अति सुखदाई।॥
राधा मन अतिमोद बढ्यो हे मनमोहन घनपाई ॥१ ॥
राखत प्रीति सहित हृदयमें भा लाज वहाई॥
द्वारकेश प्रभु रस्तिक लाडिली निरख निरख मन भाई ॥२॥ | Devgandhar |
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