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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Nabal badhu rung bheenni nanal peetam sanga khelai .. | Part3-351 | नबल बधू रंग भींनी ननल पीतम संग खेलै ॥
झूम-झूम रस ताननि गाबैं रिझवति छैल छबीलै ॥ १॥ रैंगीलौ लाल पिचकाईन
रँग भरि उरजन ऊपर मेलै | मुख मूंदें नेनबनि मन खोले भावति कल मन फूल
॥२॥ पटकति धरती चरन लर-लटकति, लटकति हार हमेलै ॥ प्रफुलित नबल
बेल-सी लहकत, झेली बल अलबेले ॥३॥ अंचल मधि चंचल चख मानों
मैंने सैंन कों पेलै ॥ वल्लभ रसिक घुमड़ नब घन लालन अंक सँकेले ॥४॥ | Bihaag |
Chhagan magan pyaare laal keejiye kaleva || chhinkete sagari dadhi | NityaPad-027 | छगन मगन प्यारे लाल कीजिये कलेवा || छींकेते सगरी दधि
उखल चढ काढलेहो पहर लेहो झगुली फेंट बांधलेहो मेवा ॥९॥ यमुना तट
खेलन जावो खतेलन के मिस भूख न लागे कोन परी प्यारे लाल निश दिनाकी
टेवा॥ सूरदास मदनमोहन घरही क्योंन खेंलो लाल देहो चकडोर बंगी हंस मोर
परेवा ॥२॥ | Bhairav |
Ladeti paalnen jhoole | rangmahal ruchi rachyau vidhaata nirakhi | Part1-205 | लड़ेती पालनें झूले | रंगमहल रुचि रच्यौ विधाता निरखि
निरखि मन फूले ॥१॥ नवनिधि सिद्धि जाकी आज्ञाकारी सो जाई कीरति
बाल । सरस सरोवर भान भवनमें प्रगटी है कुलपाल ॥२॥ आज उदय सब
ब्रजममंडलको गोरी रसिकगोपाल । कृष्णदास प्रभु अति आनंदे जोरी परम
रसाल ॥३॥ | Bilawal |
Phoolan key athkhambha raajat sanga vrishbhan dulari .. morchand | NityaPad-261 | फूलन के अठखंभा राजत संग वृषभान दुलारी ॥ मोरचंद
शिर मुकुट बिराजत पीतांबर छबि भारी ॥१॥ फूलन के हार सिंगार फूलनके
संग सखी सुकुमारी ॥ परमानंददासको ठाकुर वब्रजजीवन मनुहारी ॥२॥। | Saarang |
Shrivrishbhanrai grih pragati radha nakhsikh rupanidhan . kahaa | Part1-193 | श्रीवृषभानराय गृह प्रगटी राधा नखसिख रूपनिधान । कहा
बरनों नखशिखकी शोभा त्रिभुवन नॉँहि न और समान ॥१॥ ब्रजसुंदरी निरखि
हुलसत मन भई आनंद मगन गुन गान । जसुमति कूँखि विरह आत्ुर अब प्रगरेंगे
ब्रजजीवन प्रान ॥२॥ रसिकराय रसरासबिहारी सकल कला पूरन सब जान )
विरह ताप हरिहें गोपिनके करि मुख कमल सुधारस दान ॥३॥ बाजत ताल
पखावज दुंदुभी सुनत न जाय परी कछु कान । वृंदावन मंगल यश गावै दास करत
सबका सनमान ॥४॥ | Saarang |
Maaee aaj tou mohan sanga rangbhari khelongi .. | Part3-331 | माई आज तो मोहन संग रंगभरी खेलोंगी ॥
लोकलाज पायनसों पिछोंडी पेलोंगी ॥१॥ निंदरोंगी आरज पंथ नैंकु न
डरोंगी ॥ निधरक अंकवार पिया को भरोंगी ॥२॥ केसर के रंग रंगीलो
करोंगी ॥ बेसरि मोती काजें फगुवा कों अरोंगी ॥३॥ ललित त्रिभंगी रस
ढरन ढरोंगी ॥ रति पति रण ब्रजपति सों लरोंगी ॥४॥ | Jejvanti |
Akeli mutt jaiyo | NityaPad-273 | अकेली मत जैयो
राधे यमुना के तीर || बंशीवट में ठग लागत है सुन्दर श्याम शरीर ॥१॥ विन
'फांसी बिन भुजबल मारत बिन गाँसी बिन तीर ॥ वाके रूप जाल में फंसि के
को बचि है ऐसो बीर ॥२॥ घर बैठो भर देऊं गगरिया मन में राखो धीर ॥
बीरन पान करन हम त्याग्यो कालिन्दों को नीर ॥३॥ धन सुत धाम गये नहिं
चिंता प्राण गये नहिं पीर ॥ सूरदास कुल कान गये ते धिक धिक जन्म
शरीर ॥४॥ | Saarang |
Poochhat janani kahaan | NityaPad-227 | पूछत जननी कहां
ते आये । आज गयो श्रीवल्लभके घर बहोतक लाड लडाये ॥१॥ विविध
भांति पट भूषन ले ले सरस सिंगार बनाये। शीश पाग सिरपेच जु बांधे
मोरचन्द्रिका लाये ॥२॥ बहोत भांति पकवान मिठाई विंजन सरस बनाये ।
पायस आदि समर्पे मोहि मेरी लीला गाये ॥३॥ प्रेम सहित बललभमुख निरखत
और न कछु सुहाए । रसिक प्रीतम जु कहत जननी सों आज अधिक सुख
पाये।।४॥ | Saarang |
Main jaba dekheri gopallal mohani moorati nandlal tunn munn dhananochhavar curran koo leey gairi .. | NityaPad-118 | मैं जब देखेरी गोपाललाल मोहनी मूरति नंदलाल तन मन धननोछावर करन को ले गईरी ।।
सुन्दर स्थाम उजागर नागर बाकी छबी चित चितेरे ने लिख लई॥१॥
गर सोहे बन माल देख मोही ब्रज की बाल या छबीपें हो मगन
भई ॥ सूरदास प्रभु कौन मंत्र पढ डायोरी मुरली में गावत धुनि नई नई ॥।२॥ | Adano |
Jasoda painde painde dole ! ita grih kaaraj uta suta kau daru duhuun | NityaPad-031 | जसोदा पैंडे पैंडे डोले ! इत गृह कारज उत सुत कौ डरू दुहूँ
भाँति मन तोलै ॥ आवहु कुँवर ! तुम करहु कलेऊ जननि रोहिनी बोलै ।
परमानंद स्वामी फिरि चितयो आनंद हृदय कलोलै ॥ | Saarang |
Dekho sakhee raajat haye nandlal | | NityaPad-176 | देखो सखी राजत है नंदलाल |
सीस किरीट स्रबन मनि कुंडलउर राजत वनमाल ॥। १;
वागो सरस जरकसी सोहे फेंटा जोर रसाल।
सुरत केलिरस मुरती बजाबत चंचल नैन विसाल ॥। २
आसपास सब सखामंडली मधि नायक गोपाल।
सूरदास प्रभु यह सुख बाढ्यो बडे गोपके लाल ॥। ३॥। | Saarang |
Srivallabh purushotam roop.. | Part2-274 | श्रीवल्लभ पुरुशोतम रूप॥
सुन्दर नयन विशाल कमलरंग मुख मृदु बोलत वचन अनूप ॥१॥
कोटि मदनवारों अंग अंगपर भुज मृणाल अति सरस स्वरूप ॥
देवी जीव उद्धारन प्रकटे
दास शरण लक्ष्मण कुलभूप ॥२ ॥ | Devgandhar |
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