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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Shrivrishbhan nripati key augan baajat aaj badhaai . keerati | Part1-179 | श्रीवृषभान नृपति के ऑगन बाजत आज बधाई । कीरति
दे रानी सुखसानी सुता सुलक्छिन जाई ॥१॥ शक्ति सबै दासी हैं जाकी सी
याहूतें अधिक सुहाई । निरविध नेह अवधि मूरति प्रगटी सब सुखदाई ॥२॥
ब्रह्मादिक सनकादिक नारद आनैंद उर न समाई। नंददास प्रभु पलना पौढ़े किलकत
कुँवर कन्हाई ॥३॥ | Aasawari |
Badhaai ree baajat aaj suhai srigokulrajke dhaam . raani | Part1-052 | बधाई री बाजत आज सुहाई श्रीगोकुलराजके धाम । रानी
जसुमति ढोटा जायौ है मोहन सुंदर श्याम ॥१॥ सुनि सब गोप घोषके वासी
चले बर बसन बनाय । तापुरकी मंगल ब्रज बीथिन भीर न निकस्यो जाय ॥२॥
आईं सब गोप वधू मिलिं साथन हाथन कंचन थार | कमल बदन सब बनी
कमलासी झलकत कुंडल हार ॥३॥ नाचत ग्वाल करत कुतूहल दि घृत खोरें
गात । देत मेंगाय बसन पट भूषण फूले अंग न मात ॥४॥ जो जाके मन
हुती कामना सो पुजाई नैँंदराय । नंददासकों दई कृपाकरि अपने ललनकी
बलाय ॥५॥ | Malhar |
Puranmas poorantithi srigiridhar karat snan | Part2-340 | पूरणमास पूरणतिथि श्रीगिरिधर करत स्नान
मनभायो ॥ अति आनंदसों न्हवावत श्रीविदुल ज्योंविधि बेद बतायो ॥१ ॥
उत्तम ज्येष्ठ ज्येष्ठा नक्षत्र होत अभिषेक भक्तन मनभायो ॥ परमानंद लाल
गिरिवरधर अति उदार दरशायों ॥२॥ | Todi |
Baant baant sabahin koo deit.... | NityaPad-198 | बांट बांट सबहिन को देत॥॥
ऐसे ग्वालहरिहें जो भावत शेष रहत सोई आपन लेत॥।१॥
आछोदूध सद्य धोरीको ओट जमायो अपने हाथ ||
हंडिया मूँद यशोदामैया तुमको दें पठई ब्रजनाथ ॥। २
आनंदमग्न फिरत अपने रंग बूंदावन कालिंदीतीर ॥
परमानंददास झूठोले बांह पसार दियो बलवीर ।।३॥। | Saarang |
Sharad ujiyari cassie neeki laagai nicus kunjaten thaadhe ... | Pustak1-355 | शरद उजियारी कैसी नीकी लागै निकस कुंजतें ठाढ़े ॥।
बरन बरन फूल फूलनके आभूषण सोधे भीजे बागे ॥।१॥
गावत राग रागिनिसों मिलि मन मिल्यौ जति केदारो रागे ॥
हरिदास के स्वामी स्थामा कुंजबिहारी क्रछुक रजनी जागे ॥२॥ | Kedaro |
Jhulat russ rung bharey hoe douu raajat syama syaam | Part3-379 | झुलत रस रंग भरे हो दोऊ राजत स्यामा स्याम
॥श्रु०॥ परिवा प्रथम सुहाग दिन मद्दूरत बांध्यो डोल बनाय ॥ कंचन मणि
मुक्ताफल मानों रवि शशि उड़गण पाय ॥१॥ करि मंजन भोजन कर बीरा
बैठे सोंधो लगाय ॥ नील पीत पट की छबि मानों दामिनि घन जो लगाय
॥२॥ उरझी स्याम तमाल सो मानों कंचन वेली अनूप ॥ भूषण भूषित
गात मनोहर कहा वरने कवि रूप ॥३॥ नूपुर क्वणित चरण कर कंकण
कटि किंकिणी कलबाज ॥ मानों मराल बाल वर बोलत अति अद्भुत छबि
राज ॥४७॥ संहचरी मुदित झुलावत फूलत गावत गोप धमार ॥ राग जम्यो
बहु बाजे बाजत मानों उमग्यो निधिवार ॥५॥ चोवा चंदन और अरणजा
कुमकुम अगर सुबास ॥ मानों मलया गिरि हूँते छूटी विविध पवन
सुखरास ॥६॥ कहाँलों कहां अनुपम शोभा रही विविध छबि छाय || निरख
काम रस धाम आपनो मानों रह्यो मुझझाय ॥७॥ देत असीस सकल गोपीजन
रही सब सीस नवाय ॥ श्रीराधा गिरिघधारी ऊपर श्यामदास बलजाय ॥८॥ | Kafi |
Maiya daau bahut khijaayo .. | NityaPad-197 | मैया दाऊ बहुत खिजायो ॥
मोसों कहत मोलको लियो तोय यसोमति कब जायो ॥ १॥
कहा करों यह रसिके मारें खेलनहू नहीं जात ॥।
पुनपुन कहत कौन है माता कौन है तेरो तात ॥। २॥
गोरे नंद यशोदा गोरी तुम कित श्याम शरीर ॥
चुटकी दैदै ग्वाल सब हेँसतहैं हँसत सिखे देत बलवीर ।।३॥।
तू मोहीको मारन सीखी दाऊ एकबहु नखीजे ॥
मोहनकों मुखरिसमेंत लखि जसुमति मनमन रीझे ॥४॥
सुनहूं कान्ह बलभद्र चवाई जन्मतही को धूत ॥।
सूरस्थाम मोहि गोधनकीसों मैं जननी तू पूत ॥५॥। | Bilawal |
Syaam rung range nayan .. dhoye chhutat naheen yeh kaise huun | NityaPad-096 | स्याम रंग रंगे नयन ॥ धोये छुटत नहीं यह कैसे हुं
मिलेपघिलव्हेमेन ॥। १॥। येगीधे नहीं टरत वहांते मोसो लेन न देन ॥ सूरजप्रभुके
संगसंग डोलत नेंकहू परत न चेन ॥। ३॥। | Ramkali |
Mohan jenwat chhaak saloni .. | NityaPad-204 | मोहन जेंवत छाक सलोनी ॥
सखन सहित हुलसे दोऊभैया झपटत करते दोनी ॥१॥
आछे आछे फलले चाखत चाहत हरिकी कोनी ॥
परमानंदप्रभु कहत सखनसों पहिलेकरलेहु पोनी ॥२॥ | Saarang |
Sunder nandanandan joe paauun .. | Part3-006 | सुंदर नंदनंदन जो पाऊं ॥
अंग संग लाज मदन मनोहर या जाडे को देश निकारो दिवाऊं ॥१॥
मृगमद अगर कपुर कुंमकुंम मिले अरगजा देर चढावु ॥
विविध सुगंध सुमन बसंत सखी सघन निकुंज में शयन बिछाबु ॥२॥
राग राणिनी ऊरप सुस्वरूप सरस मधुरे जाऊं ॥
कृष्णदास प्रभु गोवर्धनधर रसिक शिरोमणि सुविधि रिझाऊँ ॥३॥ | Malkoos |
Lyaay kinn deree maiya moko aeka gathaya aambaki .. | NityaPad-213 | ल्याय किन देरी मैया मोको एक गठया आंबकी ॥
नंद हँसत मन मुदित जसोदा सुन सुन बतियां श्याम की ॥१॥
तज खोबा बांसोदी मेघा बलिहारी या नाम की ॥
अटकत मांगत मिसी रोटी भुरकि हैं सो मेरे काम की॥।२॥
धन धन ब्रज धन धन गोपीजन ब्रज समीप नं द गाम की ॥
सुख बिलसत हुलसत मुख निरखत सब संपत सूर स्थाम की ॥३।॥। | Malhaar |
Rawalke kahein gope aaj vraj dhuni ope kaana haye daiy suno baaje | Part1-068 | रावलके कहें गोप आज ब्रज धुनि ओप कान है दै सुनो बाजे
गोकुल मँदिलरा | जसोदाकें पूत भयो वृषभानजूसों कह्मों गोपी ग्वाल ले ले धाये
दूध दधि गगरा ॥१॥ आगे गोपबूंद वर पाछे त्रिय मनोहर चल न सकत कोऊ
पावत न डयरा । चतुर्भुजप्रभु गिरिधारीकौ जन्म सुनि फूल्यो फूल्यौ फिरत नारद
जैसे भेँवरा ॥२॥ | Bihaag |
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