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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Krishnako beeri deit vrajnari .. pansupari
NityaPad-221
कृष्णको बीरी देत व्रजनारी ॥ पानसुपारी काथो गुलाबी लॉगन कील संवबारी॥।१॥। ब्रजनारीजो कुंजल ठाढी कंचनकीसीवारी।॥। लेले बीरी करन कमलमें ठाढी करत मनुहारी ॥ २॥ कहेत लाइडले बीरी लीजे मोहन नंदकुमार | परमानंदप्रभु बीरी आरोगत ब्रजकें प्राण आधार।॥३॥
Saarang
Saajen natwar bhesh gopal .. madhur venu sushabd ughatat tata
Part1-333
साजें नटवर भेष गोपाल ॥ मधुर वेणु सुशब्द उघटत तत थेई थेई ताल ॥१॥ तरणि त्नयातीर भरकत श्याम घन गोपाल ॥ ब्रज की नारि समूह मंडल बनी कंचनमाल ॥२॥ रास रसगति निरख उड्पति तजी पश्चिम चाल ॥ चतुर्भुज प्रभु देव गण मन हस्यौ गिरिधरलाल ॥३॥
Malav
Dekho jhoolat palana kanhai | baalroop curry baal bhaav dhari
Part1-105
देखो झूलत पलना कन्हाई | बालरूप करि बाल भाव धरि जननीके सुखदाई ॥१॥ कोमल अरुन चरन युग सोहें दश नखकी अरुनाई। मानों भक्त अनुराग एकके दश विधि दैंई दिखाई ॥२॥ बारबार जब चरन उचावत नूपुर बाजत पाई । मानों भक्तजन अति आनंदित उठत उमड़े रस गाई ॥३॥ कटि किकिनी बिराजत अतिशय लटकत फुँदना श्याम । मदन भुजंग सीस पर शोभित लसत नीलमणि दाम ॥४॥ पीतांबर ढॉकत अंग जननी चरनन देत उड़ाई । मानों नील घनमें दामिनी बिच बिच प्रगट लखाई ॥५॥ कर अँगुरी मुदरी दशराजें नख चंद्रनके पास | मानों मणिधर पीयन चले हैं सुधा भहा रस आस ॥३॥ दुहुँकर पोहोंची रतन जटित नग ता ढिंग फुँदना लटके। मानों अलिकुल सबै एक कै चलत द्वारमें अटके ॥७॥ बाजूबंद जरे नग हीरा उठत अनूपम जोती । मानों श्याम रस महासिंधुतें सुधा प्रकटसी होती ॥८॥ कंठाभरण खच्यौ रतननसों हरिके कंठ लग्यौ | मानों गह्मयौ आसरोौ उरमें बघना देखि भग्यो ॥९॥ उर सोहे मोहे सबकौ मन बघना दुहुँदिश बॉँक । ज्यों श्री उकसि नसके डरपि ब्रज ओर कौन है रॉक ॥१०॥ तारठिंग पदिक बिराजे अदभुत मुक्ता । रतन जरबौ मानों हृदयमें ही जुबतिन को सुध अनुराग धरयौ ॥११॥ चिबुक बिराजत बदन चंदमें उपमा एक खरी । अधरबिबते दशन लगत मानों ले एक बुंदपरी ॥१२॥ कहाकहूँ अधरनकी शोभा बरनी न जाय अपार । मानों कमलतें उदै होत रवि चुंबत कुसुम रससार ॥१३॥ नासा मुक्ता भूषन सोहत मधि सोहै लाल । मानों दुहुँनके द्ै मन बिच सोहै अनुराग विशाल ॥१४॥ श्रवनन मकराकृत दोऊ कुंडल झलकें ललित कपोल । मानों लावन्य सरसिमें मिलि दोऊ मकर करत कल्लोल ॥१५॥ बदन कमल अलकावलि राजै उपमा अद्भुत एक । जोरि पॉँति सुर मानों बैठे पीवन अमृत अनेक ॥१६॥ मलयज तिलक चित्र मृगमदकौ ता मधि मुक्ता बिंदु | बदन चंद्र लखि भाज्यो उड़ुपति मनु गठमें धसि रहो इंदु ॥१७॥ लटकन भाल सीसते भूषन अति राजत है बोर । मानों केस सिंधुते आयो मगन भये रवि भोर ॥१८॥ बेंनी गुही कुसुम आभूषन राजत हरिकी पीठि | मानों सिढ़ी सँभारी मनमथ चढ़न युवतीजन दीठि ॥१९॥ ऐसौो रूप विलोकत काकौ धीरज तबै रहै । व्रजजुबती सबहिनके देखत हरि कर आनि गहै ॥२०॥ जसुमतिके मन बालिक जुवतिनकीं मनमथ रूप धरे । अचरज रसिक बाललीलामें लीला और करे ॥२१॥
Aasawari
Aaye alsaane sarsani mein jaane joo laal.. darak paag ardhasis
NityaPad-052
आये अलसाने सरसानी में जाने जु लाल॥ दरक पाग अर्धसीस लटपटी महावर लाग्यो गाल ।।१॥ नेना अरुन भये रंगराते सुन सुन हो स्थाम तमाल॥ बेन बोलत कछु मुख नहीं आवत गोविंद हालबिहाल ।। २॥
Lalit
Meheri juu yachan tumpain aayou . dehu badhaai manki bhaai tihuun
Part1-210
मेहेरि जू याचन तुमपैं आयौ । देहु बधाई मनकी भाई तिहूँ लोक यश छायौ ॥१॥ कीरति कूखि प्रगटी श्रीराधा सुनि सुनि मंगल गायौ । कृष्णदास ढाढ़ी अपनेकों बहुत भाँति पहिरायौ ॥२॥
Gori
Bhojan karat nandlal sanga leeye gwalball karat hein khyaal baithe bansivat chhaiya .
NityaPad-216
भोजन करत नंदलाल संग लीये ग्वालबाल करत हें ख्याल बैठे बंसीवट छैया । पातनपें धर्यो भात दधि सानलीये हाथ मांगत मुसक्‍्यात जात सांवरे कन्हैया ॥१॥ बिंजन सब भांति भांति अनुपम अति कही न जात रुचसो करी खात मुदित पठई मैया । छीतस्वामी गिरिधर पीना मधि मंडली बिच शोभित सबको मनमोहे निरखी निरखी लेत बलैया ॥२॥।
Saarang
Mathura nagar kii dugger mein chalal‍you
NityaPad-306
मथुरा नगर की डगर में चलल्‍यो जात पायो है हरि हीरा॥ सुनरी भटू लटू भयो डोलत गोकुल गामको अहीरा ॥ १॥ बनतेजु आवत बेनु बजावत बंसीवट जमुना के तीरा ॥ परमानंददासको ठाकुर हँसदीनो मुख बीरा ॥२॥
Kanharo
Jayati sriyamune prakatakalpalatike .. ashtavidh siddhi
NityaPad-012
जयति श्रीयमुने प्रकटकल्पलतिके ॥ अष्टविध सिद्धि अद्भुतवैभव सकल स्वजन विख्यात स्वाधीनपतिके ।। १॥। केलिश्रमसुरतपयरूपब्रजभूपको पुत्र पयपान दे विश्वमाता ॥ अंग नूतन करत पुष्टि तब अनुसरतत्रिदलरसकेलिकी अमित दाता ॥२॥ रहत यमद्वारते मुक्त सुखचारते नामत्रयअक्षर उच्चार कीने।। उभयलीलाविष्ट ब्रज॒प्रिय कुमारिका तुर्यप्रिया बदतरसरंग भीने ॥३॥ अनावृतब्रहते सदा वृत व्है रहीकनकशाखाविटप्शामबल्ली॥ सदा प्रफुल्लित द्वारकेश अवलोकके नित्य आनंद आभीरपल्ली ॥।४॥।
Ramkali
Aho khelati basant piya pyaari || laal saadh
Part3-253
अहो खेलति बसंत पिय प्यारी || लाल साध भरि लई पिचकारी ॥| १॥ पचरंग लिये गुलाल लाड़िलो ऊपर डारी ॥ कसर साख जबाद कुंमकुमा भीज रही रंग सारी ॥२॥ गाबति खेलति मिलति परसपर देति दिबाबति गारी ॥ छीन लई मुरली पीतांबर रंग रह्यों अति भारी ॥३॥ देति नहीं डहकाबति सुंदरि हँसि हँसि जात सुकुमारी ॥ फगुवा लेह देह पीताबंर करति कुंवर मनुहारी ॥|४॥ बरनों कहा कहति नहिं आवे साभा सिंधु अपारी ॥ 'इत हरिबंस' लेह बलि मुरली तुम जीते हम हारी ॥५॥
Sarang
Musakaat jaat milwat gaayan ..
NityaPad-297
मुसकात जात मिलवत गायन ॥ झारत गोपवधु सुरभिनकों दोहनीलै करते दुहत चायन ॥। १॥| इत निरखत उत धार धरनीपर कबहूं कबहूं ढर लागत पायन ॥ रामदासप्रभुको यह अचरज जैसी यह सब तैसीय रहायन ।२॥
Gori
Nandgam koo pandey vraj barasaane aayo .. atiudar
Part3-085
नंदगाम को पांडे ब्रज बरसाने आयो ॥ अतिउदार वृषभान जानि सनमान करायो ॥१॥ पांडे जूके पायनकों हसिहसि सीस नवायो ॥ पाय धुवाय नहवाय प्रथम भोजन करवायो ॥२॥ धाय आई ब्रजनारी जिन यह सूथो पायो ॥ भानभवन भईभीर फाम को खेल मचायो ॥३॥ सीसी सरस फूलेल अंगअंगन झलकायो ॥ हनूमानकी प्रतिमा मानों तेल चढायो ॥४॥ काजर सों मुख मांडि बदन विंदाजु बनायो ॥ कारे कलस श्रवत मानों चपरा चिपकायो || ५|| मजगामिनि गोंछनसों तुकमैया लपटायो ॥ देहधरें मानों फागुन खेलन ब्रज में आयों ॥६॥ कह चंदन कहुं वंदन कहंचोवा लपटायो ॥ ऋतु वसंत जानों केसूकोद्रम नवफूलन छायो ॥७॥ काहू गूलरी माला काहू झंगला पहरायो ॥ मानोगज घंटान बीच गजगाह बनायो ॥८॥ रंग रह्मो चहोंटियन अंगरातो ब्हेआयो ॥ गुंजनको गहनो मानो प्रोहितपहरायो ॥९॥ माथेतें मोहनीनें छाछ को माट ढरायो ॥ मानो काचे दूधसों गिरिगोवर्धन नहायो ॥१०॥ चोर भोर भई खोर मानो गंगा जल ढायो ॥ महादेवकी जटा चूरि चरनोदिक आयो ॥११।॥ लगतदंत सोंदंत गिडिगिडी अंग लगायो ॥ मानोहो सुघर संगीत ताल कठत्तार बजायो ॥१२॥ श्रीराधा राधाकहि अपनोंबोल सुनायो॥ अरीभान की कुंवरि सरनिहों तेरी आयो ॥ १ ३॥ सुनिकें प्रेम वचन गरो राधा भरि आयो ॥ बावाजूको दणगला ले प्रोहित पहरायो ॥१४७॥ कीरतिजू पांयलामि तातो पय प्यायो ॥| तोलों खेलत होरी ब्रजमें दूल्हे आयो ॥१५॥ सांचे स्वांग न सजिकें सबे समूह सुहायो ॥ तपा व्यास को पूत धुत सूकदेव बनायो ॥१६॥ सनकादिक चारथोंनिस ज्यों सन्‍्यास सुहायो ॥ घूमत आयो इंद्र स्वांय उन्‍्मत्त नचायो ॥१७॥ ब्रजकी बीथनि बीच कीचमें लोट पुटायो ॥ चारि वदनको स्वांग चतुर चतुरानन लायो ॥१८॥ पंचानन पांचों मुखसों संगीत बजायो ॥ हरिको ब्हे जु बावरो नारद नाचत आयो ॥१९॥ देखि नंदकेलाल जंत्रधरि गाल बंजायो ॥ महादेव पटतारदेत यह पट प्रभु भायो ॥२०॥ हो हो हो होरी हरि हांसीन हँसायो ॥ माया निपुन भई सो नारद हल हुलरायो ॥२१॥ कामकनी भयो सबन को चित्त चुरायो ॥ ललिता जोरी गांठि लालको न्याह रचायो ॥।२२॥ गठजोरो वृषभान कुंवरिसों जाय जुरायो ॥ नवल अंबके मोरको मोरी मोर बनायो ॥२३॥ पीत पिछोरी तानि छबीलो मंडप छायो ॥ फागुन की गारीनको साखा चार पढायो ॥२४॥ होरीकी अग्यारी करि दूल्हे परनायो ॥ होरी को पकवान सो भरिभरि झोरिन खायो ॥२५॥ फूलि फाग की फाग फल्यो जिन यह जस गजायो ॥ जन हरीया घनस्याम वास बरसानें पायो ॥२६॥
Bilawal
Aavat aaye dekhau nipat laal baneri ..
NityaPad-290
आवत आये देखौ निपट लाल बनेरी ॥ चंदन की खौर किये गुलाब की बनमाल हिये मोरचंदा मांथे दिये ऐन मैन बनेरी ।|१॥ गुलाब कीकटि काछनी जराय के आभूषण पीत बसन पातरे तन भेद कौन गिनैरी ॥ मेघबरन श्यामसुन्दर युवतीन के मन को हरण नंददास प्रभु लटक चलत जोवन रूप सहेरी ॥२॥
Hameer
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