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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Namo devi jamune munn bachan karm karun sarran | Part2-343 | नमो देवि जमुने मन बचन कर्म करुं सरन
तेरी॥। सकल सुख कारनी भव सिधु तारनी दरसने कटत है कर्म
बेरी ॥१॥ अभे पद दायिनी भक्त मन दायिनी करि कृपा पूरिये साथ
मेरी ॥ दीजिये भक्ति पद लाल गिरिधरन की काटिये विषै 'कृष्णदास'
॥२॥ | Ramkali |
Suna dhwani murali bunn baajai hari raas rachyau .. kunjkunj drumveli | Part1-349 | सुन ध्वनि मुरली बन बाजै हरि रास रच्यौ ॥ कुंजकुंज द्रुमवेलि
प्रफुल्लित मंडल कंचन मणिन खच्यौ ॥१॥ नृत्यत युगल किशोर युवतिजन
मन मिल राग केदारो सच्यो ॥ हरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी नीकें आज
गोपाल नच्यी ॥२॥ | Kedaro |
Sub brat bhang bhaye sakhi tabaten aeka hii brat nishchen curr leo |... | NityaPad-115 | सब ब्रत भंग भए सखि तबतें एक हि ब्रत निश्चें कर लीयो |॥।
खेलत खिरिक रसिक नंदनंदन आय अचानक दर्शन दियो ॥१९॥ लोकलाज
कान कुलसीमा मानों सब संकल्पही कीयो।॥ मदनगोपाल मनोहर-मूरति नवरस
सिंच सिरांनो हियो ॥२॥ व ्यसन पर्यों संतत चितचाहत रूपसुधा लोचनभर
पीयो ॥। चतुर्भजुप्रभु गिरिधनलाल छबि विनु देखें पल परत न जीयो ॥३॥॥ | Adano |
Ranga rangillo nandkaun laal rangeelee pyaari vrajki | Part3-071 | रँग रैंगीलो नंदकौं लाल रँँगीली प्यारी ब्रजकी
बीथनि मैं स्लेलति फाणु ॥ रंग रंगीले संग सख्वागन रंगीली नव बधु तैसौंई
जम्यौं रंगीलो बसंत रागु ॥१॥ रंग रंगकी ओझट छिरकति हरस्तबि हररितर
बरखि अनुराग ॥ “नंददास' प्रभु कहांलौ बरनू बेदहु आपुन मुख कहयो
यह माननि बडभाग ॥२॥ | Basant |
Shrivrishbhanrayjuke aangan baajat aaj badhaai. bhaadon sudi | Part1-177 | श्रीवृषभानरायजूके आँगन बाजत आज बधाई। भादों सुदी
आठें उजियारी आनंद की निधि आई ॥१॥ रसकी रासि रूपकी सीमा अँगअंग
सुंदरताई । कोटि मदन बारों मुसिकनपर मुखछबि बरनी न जाई ॥२॥ पूरन
सुख गे ब्रजवासी नैनन निरखि सिराई । क्रष्णदास स्वामिनि ब्रज प्रगटी श्रीगिरिधर
ख़दा ॥३॥ | Bilawal |
Ladili namaneho laal aapahin paaundhaaro jaise hathatyaje | NityaPad-122 | लाडिली नमानेहो लाल आपहीं पाऊंधारो जैसे हठत्यजे
प्यारी सोई यतन विचारो ॥१॥ वातेंतो बनाय कही जेती मति मेरी ॥ एकहूं
नमाने हो लाल ऐसी त्रिया तेरी ॥२॥॥ आपनी चोपके काजें सख्ीभेष कीनो ।।
भूषण वसन साजें बीना करलीनो ॥। ३॥ उतते आवत देखी चक्रत निहारी ॥ कोन
गाम वसतहो रूपकी उजियारी ॥।४॥ गामतोहें नंदगाम तहांकीहों प्यारी ॥ नामहै
सांवलसखोी तेरे हितकारी ॥५॥| करसों करजोरें स्थामा निकट बैठाई॥ सप्तस्वरन
साज मिल स्वल्प बजाई ।॥६॥ रीझ मोतीहार चारु उरले पहरावें ॥ ऐसेही हमारो
. भट्दू सांवरो बजावें ॥७॥ जोईजोई इच्छा होय सोई माग लीजे ॥ ऐसी बातें
सांवरेसो कबहुं मान न कीजे ॥८॥| मुखसो मुखजोरें स्थाम दरपन दिखावें॥।
निरख छबीली छब्िप्रतिबिंब लजाबें॥ ९॥॥ छल तोऊ घर आयो हस पीठ दीनी ॥।
नंददास बलप्यारी आंकों भरलीनी ।।१०॥ | Bihagaro |
Ubban gokul koo jeevani munn haradyo hoe sakhee ree | Part3-189 | ुब्॒बन गोकुल को जीवनि मन हरद्यो हो सखी री
स्तेलति होरी फाग ॥ ध्रु० ॥ दहँदिस रंग बढ्योौ अति भारी सोभा कही
न जाई ॥ नाँचत ग्वाल करति कुलाहल सुरँग-गुलाल उड़ाई ॥१॥ ले लै
करन करन पिचकाई केसरि कलस भराई ॥ चोबा साख जवादि कुँमकुमा
गोरा मेद मँगाई ॥२।| सनमुख छै छिरकत गोपिन कौं ग्वाल सबै सतराई ॥
दीठि बचाई आई ललिता तब पकरे हलधर धाई ॥३॥ अपने मन को भायौ
करि के छाड़े है तब जाई ॥ पिय तन देखि रही ब्रज बनिता आनँद उर
न समाई ॥४॥ दंदभि ढोल पखावज आबज बाजत ढफ सहनाई ॥ बैंनु
रबाब किन्नरी मह॒वरि मुरली मधुर बजाई ॥५॥ सब समाज लै कै घर आए
प्रफुल्लित भए नंदराई ॥ करि आरति जसुमति अति आदर सौं आ तुर सनमुख
आईं ॥६॥ इंद्रादिक सनकादिक संकर कुसुमन वृष्टि कराई ॥ यह जोरी अविचल या जग में “रामदास” बलि जाई ॥७॥ | Kaafi |
Devak udadhi devaki seep vasudev swanti jall barkhyau hoe . | Part1-032 | देवक उदधि देवकी सीप वसुदेव स्वांति जल बरख्यौ हो ।
उपज्यौ सुवन विमल मुक्ताफल सुनि सुनि सब जग हरख्योहों ॥१॥ निर्मोलिक नग हाथ यशोदा नंदजू को चित्त आकरष्यो | बिधि नारद शिव शेष जौहरी तिनपै
जात न परख्यौ ॥२॥ सुर नर मुनि जाकौ ध्यान धरतहैं सो ब्रज जुवतिन
निरख्यौ। सोई श्यामा उर हार बिराजत कल्यान श्रीगिरिधर सरीखो ॥३॥ | Asawari |
Chitwatahi sub gaye jurai.. sakuch kyo kaapar ris raaee ..1 .. | Part2-081 | चितवतही सब गये जुराई॥ सकुच क्यो कापर रिस राई ॥१ ॥
क्षमाकरो आयुश हम पावें॥ जापर कहोतिहीपर धावें ॥९॥
सेन सहित प्रभु हमहिं बुलाये। आज्ञा सुनत हि उठ धाये। हा ॥
ऐसो व मद प्रभुकोपे ॥ जीव नाम सब तुम्हारे रोपे ॥४ ॥
सूर कही यह मेघन बानी॥ नह सुनसुरा रिस कछक बुझानी ॥५ ॥। | Bilawal |
Shree vrindaavan saghan kunj phoole | NityaPad-317 | श्री वृन्दावन सघन कुंज फूले
नवदल पहोप पुंज त्रिविध समीर सीरी मंद मंद आवे ।। उसीर महल मध्य राबटी
रची बनाय बैठी संग प्यारी सों तो पिय मन भावे ॥९॥ अदभुत गुन
रूप रास राजत चहूं ओर सुबास बेन बिलास मध्य केदारो राग गा वे | मनमथ
कोटि कला जे सहचरी सकल समाज प्रेम प्रीत दर्शन आसकरन पावे ॥२॥ | Adano |
Aaj attari parr useer mahal mein rache dampati byaru karat ... | NityaPad-248 | आज अटारी पर उसीर महल में रचे दम्पति ब्यारु करत ॥।
खोवा मलाई बासोंधी ओर पय हँस हँस घूंट भरत ॥१॥ चहुूँ ओर खसखानो
छुटत फुहारे फुही बिंजना बयार सिरी मन को हरत ॥ नंददास प्रभु प्रिया
प्रितम परस्पर हँस हँस कोर लेत सहचरी कनक डबा बीरासों भरत ॥२॥ | Kanharo |
Nicus kunwar khelan chaley || rung hoe hoe horry .. | Part3-194 | निकस कुंवर खेलन चले || रंग हो हो होरी ॥
मोहन नंद के लाल ॥ रंणन रंग हो होरी ॥ संग लीने रंग भीने ग्वाल
बाल ॥ वेगुन रूप रसाल ॥ १॥ कंचन माट भराय ॥ सोंधे भरी हे कमोरी ॥
रत्न जटित पिचकाई करन ॥ अवीर भरें भर झोरी ॥२॥ सुरमंडल डफ
झांझ ताल ॥ बाजत मधुर मृदंग ॥ तिनमें परम सुहावनी ॥ महुबरि बांसुरी
चंग ॥३॥ खेलत खेलत जब रंगीलो लाल ॥ गये वृषभान की पोरि ॥
जेहुती नवल किंसोरी भोरी ॥ ते आंई आगें दोरि ॥४॥ सुनि निकसी नव
लाडिली ॥ श्रीराधा राज किशोरी | ओलिन पोहोप पराण भरे ॥ रूप अनुपम
गोरी ॥५॥ संग अली रंगली सोहें || करन कनक पिचकारी || मोहन मनकी
मोहनी ॥ देति रंगीली गारी ॥६॥ तिनकों छिरकत छबीलो लाल ॥ राजत रूप गहेली ॥ मानो चंद सींचत सुधा ॥ अपने प्रेमकी वेली ॥७॥| नवल
वधुन के रंगीले बदन ॥ अबीर घुमडमें डालें || छुटह निसंक अरुन घनमें ॥
हिम करनिकर कलोलें ॥|८॥ इतने मांझ छिपि छबीली कुबरि ॥ पकरेंहें
मोहन आन ॥ छबिसों परस्पर झक झोरत ॥ कापे परति बखान ॥५९॥
गुप्त प्रीति प्रगटित भई ॥ लाज तनकसी तोरी ॥ ज्यों मदमाते चोर मोर ॥
भलकत निकसी चोरी || १० ॥ सखियन सुख देखन के काज ॥ गांठ दृहन
की जोरी ॥ निरख वलैयां ले सबें | छबिन बढी कछू थोरी ॥११॥ कोऊ
छेल छकि छबिले लाले || छिरकत रंग अमोल॥ कोऊ कमल करले पराग ॥
परसत रुचिर कपोल ॥१२॥ बने हे पियाके कमल लोचन || जब गहि
आंजे अंजन ॥ जनु अकुलात कमल मंडल में ॥ फंदन फंदे युग खंजन
॥ १ ३॥ देखि बिबस वृषभान घरनि ॥ हँसत हँसत तहां आई ॥ वरजीआन
नवल वधू ॥ भुज भरि लिये कन्हाई ॥१४॥ पोछत मुख अपने अंचल ॥
पुनि पुनि लेत बलाय ॥ मुसकि मुसकि छोरत सु गांठ ॥ छबि बरनी नहीं
जाय ॥ १५॥ छोडन न देंही नवल वधू ॥ मांगें कुंवर पें फाग ॥ जोपें फगुवा
दियो न जाय ॥ प्यारी राधा के पायलाग ॥ १६॥ ओर कहां लगि वरनिये ॥
बढ्यो सुख सिंधु अपार ॥ प्रेम कलोल हलोलन में || किन रहिन संभार
॥१७॥ रंग रंगीली ब्रजबधू ॥ रंगाले गिरिधर पीय ॥ यह रंग भीने नित
बसो ॥ नंददास के डीय ॥१६८॥ | Kaafi |
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