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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Dekhari dekh roop nidhan .. sthaamghan tunn peet umber | Part2-360 | देखरी देख रूप निधान ॥ स्थामघन तन पीत अंबर
लसत तडित समान ॥१ ॥ नीलकुँतल तिलक मृगमद भृकुटी बियसरस
कमान॥ सीस सिखर सिखंड भ्राजत मुरनलिका कल गान॥२ ॥ नयन
कमल विशाल चंचल चितवनी सुखसार॥ सुधा वरषत चित आकर्षत
निरख विथकित मार॥३॥ ललित लोल कपोल कुंडल मानो नृत्यत
काम ॥ नासिका बेसर विराजत देख प्रमुदित वाम ।४॥ अरुणबिंबही
अधर मानों दशन कुंदकली॥ हँसत क्रीडत छेल गिरिधर नंदगाम
गली ॥५ ॥ चिबुक सुंदर शोभा अति तन कंबु कंठ सुदेश ॥ कोटि रवि
शशि मणिप्रकाशित महामोहन वेश॥६॥ चंद्रमणि हाटक खचित
उरपदक पांति अनूप ॥ बडे भाग्यन दृष्टि गोचर कृष्ण ब्रजके भूप ॥७ ॥
विपुलबाहु सुकमल फेरत हेरत राधा ओर | बलबल यह रूपकी सुखर्सिधु
रासकिशोर ॥८ ॥ बहु तापनाशन उदर त्रिवली नाभि सब जगमूल॥
बैजयंतीमालके बिच पारिजातक फूल॥९॥ लालकछिनी ललित
किंकिणी सुभग कटितट चारू॥ बनकी श्रातु विचित्र चित्रित अंगअंग
शुंगार ॥१० ॥ मानों कदलीखंभ जंघा पर रूप रसाल॥ सुभग चरण
सरोज मंगल मत्त गयंद की चाल ॥११ ॥ ध्वजा अंबुज वच्र अंकुश स्थाम
चिन्ह मुरार॥ चित्र मानों बहुविचित्रित निरख थकित विसार ॥१२॥
सकल भूषण भूषणा व्रजनाथ गोकुल राय ॥ पलक ओट न सहि सकें मेरे
नयन रहे हैं लुभाय ॥१३ ॥ जब न देखों मदन मूरति नयन वरसत तोय ॥
हिलगमनकी सोई जाने जाय बीती होय ॥१४ ॥ प्रमदावर घोष बांध्यो
मनुज खग मृग गाय।॥ कृष्ण दर्शन डोरी लागी आन कछू न
सुहाय ॥१५ ॥ नंदनंदन जगतबंदन दीनबंधु दयाल॥ सूरदास ही भक्ति
दीजे रूपरास गोपाल ॥१६॥ | Sorat |
Arrie jinn tuu pathai jaaheepen firzau unmoson akath kathanadi | | NityaPad-332 | अरी जिन तू पठई जाहीपें फिरजाउ उनमोसों अकथ कथानादी |
तोहि पठावत वे क्यों नहीं आवत उनके पायन कछू मेंदी बांधी ।|१॥ मो ढींग
आवबत वचन सुनावत बात कहत आधी आधी ॥ तानसेन के प्रभु वे बहुनायक
प्रीत फंदन कर हो फांदी ॥ २॥ | Poorvi |
Manmohan rijhwaar ree tere nain salonen .. tuu | Part3-227 | मनमोहन रिझवार री तेरे नैन सलोनें ॥ तू
अलबेली आंन गाम की अब ही आई गोने ॥१॥ खेलति नांहि फागु गिरिधर
सौं धरजु रही मुख मोने ॥ मेरे बगर में अब ही होरी के केतिक कौतिक
होने ॥२॥ नीची दृष्टि करे नहीं चितवत यहे सिखई कहो कोने ॥ “कृष्ण
जीबन लछीराम' के प्रभु कौों देखत हीं न लजोंनें ॥३॥ | Kafi |
Srivallabh bhaktan praan. aadhaar.. | Part2-272 | श्रीवललभ भक्तन प्राण. आधार॥
श्रीलक्षमणगृह प्रकटभये प्रभु सेवा भक्तिविहार ॥१ ॥
श्रीभागवत प्रकाश विशद कहि धर्मवेद आचार॥
परमकृपाल दयानिधि पूरण तीनलोक परसार ॥२ ॥
कोनकहे गुण रूपतिहारे लीला अगमअपार ॥
श्रीगोवर्धन स्थित उत्साह निरखत प्रेम भरभार ॥३ ॥
बलबल चरणदास अभिलाखन तोरे भवजंजार ।
अबहुलसत विलसत दिनरातिन दर्शन भोग अहार ॥४॥
| Devgandhar |
Palana phoolan goondh banaayau .. jaati joohi chameli champa | Part1-112 | पलना फूलन गूँध बनायौ ॥ जाती जूही चमेली चंपा
कनेर सुरंग सुहायौ ॥१॥ राईवेल गुलतुर्रा सोहत बीच फोंदना लै लटकायौ॥
लेकर गोद श्याम सुंदरकों जसुमति पलनामें बैठायी ॥२॥ गोदी लियें हुलरावत
गावत तन मन अति आनंद बढ़ायौ ॥ रसिक प्रीतमकी बानिक निरखत व्रज जन
निरख निरख सुख पायोौ ॥३॥ | Aasawari |
Jaag uthhe taba kunwar kanhai ... maiya kahangai moe dhingate sangsovat | NityaPad-127 | जाग उठे तब कुंवर कन्हाई ॥। मैया कहांगई मो ढिंगते संगसोवत
जान्यो बलभाई ॥।१॥ जागे नंद यशोदा जागी बोललिये हरिपास।॥ सोवत झिझक
उठे काहेते दीपक कियो प्रकाश ।॥॥२॥ सपने कुदपर्यों यमुना दहमें काहूदियो
गिराय ॥ सूरस्यामसों कहत यशोदा जिनहो लाल डराय ।३॥ | Bihaag |
Aho vrishabhaanu sutaa nandlal jugal jass gaaie | Part3-211 | अहो वृषभानु सुता नंदलाल जुगल जस गाइए
हो ॥ धनि धनि गाँस सखी बरसानौ जहैँ प्रगटी सुकुमार ॥ मोहन की
कहा कहीौं माधुरी, गोकुल उदित उदार ॥१॥ माँनौं कंचन-बेलि सखी री
कहा बरनें कवि रूप ॥ नब-घनस्याम-तमाल लाड़िलौ नख सिख रूप अनूप
॥२॥ बदन बधू बिधू मधित बिधिनि चाई अमृत सीचों इही ठौर ॥ सरस
कुमार मधित तपैया छबि नहि सुधा बिनु और ॥|३॥ घटदस साजि सिंगार
सखी री मुख तमोल जैसें लाल ॥ कंचन दंड सुखंड खंड द्वै अधरन मुरली
रसाल ॥४॥ श्यामा बृंद सखीन में राजति ज्यों उडगन में चंद ॥ मोहन
ग्वाल बाल संग डोलैं मांनौं मत्त गयंद ॥५॥ ताल मृदंग इत उत तें बाजत
ढफ सहनाई ढोल ॥ अति मीठे मृदु परम भाँवतें गोपिन कोकिल बोल ॥६॥
चोवा चंदन अगर कुँमकुमा और सुरंग अबीर ॥ उडति गुलाल अरुन नभ
ढाँप्यौ बदरन माँनों बिनु नीर ॥७॥ सुंदरि पाँच अगमने पठाईं जान पीया
कौ हेत ॥ फाग समें बड़भागि हमारौ खेलिये आजु संकेत ||८॥ घेरि आँई
सब मिलि मोहन को कीनौ जुबतिन भेष ॥ आजि भलैं नंदलाल बिराजति
अधरन अंजन रेष ॥९॥ स्यामा स्याम कीए ढिंग ठाड़े बनी अनूपम जोरी ॥
सकुच दुराई अंक कौ प्यारी नैंकु हँसीं मुख मोरी ॥१०॥ मुरली छिंड़ाई
कहो ललिता यौं फगुवा देऊ मँगाई || कै तुम अनुचर होऊ हमारे परसों
दुलहिन पाँर्ड ॥ १ १॥ सुर सिब बिरंचि सेस नारद, चढ़ि बिमान सब आए ॥
कौतुक देरित्र देखि ब्रजपति कौ, मुदित कुसुम बरखाए ॥१ २॥ परम भाँमती
जसुमति रानी कौंन पुन्य ते कीन ॥ कुंवारि कुंवर ग्रह्ल बिहरति जाके, त्रिभुबन
होति अधीन ॥१३॥ गोप ग्वाल पहिंरे पट भूषन पहिरें अंग न मात ॥
'रामदास' प्रभु गिरिधर नागर, नागरि पकरि नाचत ॥१४॥ | Kaafi |
Tum sanga khelat ler gaee toot .. | NityaPad-227 | तुम संग खेलत लर गई टूट ॥
रहो ढोटा तुम खरेई अचगरे मेरो लियो कर सूट ॥॥१॥
योंरिसाय कहतहों तुमसों वचन रहितही घूट ॥
अबही नई पहरहों आई चुरियां गई सब फूट ॥२॥
यह विनोद नीको करपायो मानों पसरी लूट ॥
परमानंदप्रभु जब बीनूंगी तबही करूंगी कूट ॥३।॥| | Saarang |
Naachat vrishbhan kumri girivardhar laal sanga jamuna pulin sarad raine raas rung rei .. | Pustak1-356 | नाचत वृषभान कुमरि गिरिवरधर लाल संग जमुना पुलिन सरद रैन रास रंग रेई ॥
उरप तिर॒प तानमा न परम मुदित करत गान गिडगिडता गिडिगिडि तक थुंग थुंग थेई ॥१॥
दां दां दननन मृदंग तितीकट तारावलि तनन तनन नननन आन आन लेईं ॥
धिकतां धिकतां धिधीकट धीकीटतक थुृंग गावत केदारो राग अद्भुत सुरसेई ॥२॥
ब्रह्मादिक शिव सुजान मोहे सब सुर बिमान निरख थक्यौ सघन चंद उडुगण पग देई ॥
धौंधीके प्रभु नट नागर राधिका के कंठ बाहु कोक कला निपुन नागरि गिरिधर सुख देई ॥॥३॥ | Bihaagro |
Shree balalabh mangal roop nidhan.. | Part2-270 | श्री बललभ मंगल रूप निधान॥
कोटि अमृत सम हस मृदु बोलत सबके होत कल्यान॥१॥
परम उदार चतुर चितामणि देत अभय पद दान॥
विष्णुदास द्वारें बश गावत रुचत नाहि कछु आन ॥२ ॥ | Devgandhar |
Meghavart meghan samajhaavat .. warwar giri tanahi batawat ..1 .. | Part2-084 | मेघवर्त मेघन समझावत ॥ वारवार गिरि तनहि बतावत ॥१ ॥
परवत पर वरसो तुम जाई ॥ येह कही हमसों सुरराई ॥२ ॥
एसें देहो पहार बहाई॥ नाम रहे नहिं ठोर जनाई ॥३ ॥
सुरपतिकी बलि इन सब खाई॥ ताको फल पावे गिरिराई ॥४॥
जेंमत काल्हि अधिक रुचिपाई॥ सलिल देहुँ जिहिं तृषा बुझाई ॥५ ॥
दिनाचार रहेते जग-ऊंपर ॥ अब न रहेन पावेंगे भूपर ॥६ ।।
सूर मेघ सुरपतिही पठाये ॥ व्रजके लोगन तुमहि बहाये ॥७ ॥ | Bilawal |
Nayan chhabile tarun madmaate .. chanchal chapal bhukuti chhabi | NityaPad-112 | नयन छबीले तरुण म दमाते ॥ चंचल चपल भूकुटी छबि
उपजत आनआन मुसकाते ॥१॥ भक्त कृपारस सदाई प्रफुल्लित मानहु
कमलदल राते ॥ गोविंदप्रभुको श्रीमुख निखरत पानकरत न अघाते ॥२॥ | Kanharo |
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