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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Kahaa kahon tere bhaagya kii mahima nandaldeto paayo ..
NityaPad-310
कहा कहों तेरे भाग्य की महिमा नंदलडेतो पायो ॥ स्थामतमाल रसिक नटनागर बाहुवेली अरुझायो ॥१॥ पिय अतिसुघर सुघर तू प्यारी संगमिल यश गायो ॥ पार्वतीपति को अग्निबल जारद्ो मदन जिवायो ॥२॥ जान सिरोमणि लाल छबीलो कछुक जनाय भूलायो ॥ कृष्णदास प्रभु गोवर्धनधर कुच भुजबीच बसायो ॥। ३॥
Kalyan
Yaachak jan govardhandhar koo vallabhadwar varr bhaave . rangabhoomi
Part1-129
याचक जन गोवर्धनधर को वल्लभद्वार वर भावे । रंगभूमि यदुकुलदीपको दे असीस पहुँचावे ॥१॥ जमुनापुलिन सुभग वृन्दावन ब्रज गोकुल सुधि पाई । गिरि चरनाट सुरसुस्कितट वल्लभगहजु बधाई ॥२॥ पुरुषोत्तम जाके गृह प्रगटे ढाठी तामुं कहाऊं । जो कछु चरित्र किये अरु करिहं साख वेद मत गाऊँ ॥३॥ मच्छ कच्छ वाराह नृसिह वामन भृगु रघुराई । हलधर बुद्ध कलंकी रूप धर प्रकटे कृष्ण सुखदाई ॥४॥ नंदरायके भवन प्रकट भये बालकरूप मुरारी । बकी आदि दुष्ट सब मारे पंच अविद्या टारी ॥५॥ महामेघ बरखत गोकुलमें लीला गिरि कर लीने । सुरपति मान उतारी रसिकवर गोप अभयपद दीने ॥६॥ बंसीवट-तट रसिकसिरोमनि मुरली मधुर बजाई । प्रेम पुंज गोकुलकी नारी ख़बन सुनत उठ धाई ॥७॥ जुवति-जुवति प्रति रूप-रूप धर रासरमन रति ठानी । मंडल मध्य प्रगटे पुरुषोत्तम संग श्रीराधारानी ॥८॥ वृन्दावन रससुखकी परमित शेष रुद्र नहि जाने। बानी ब्रह्मा पार नहीं पावे कविकुल कहा बखाने ॥९॥ बोल अक़ूर कंसयों भाष्यो काज हमारो कीजे । रामकृष्ण पोहोंचाय मधुपुरी बोल यहाँ लों लीजे ॥१०॥ सुफलकसुत सुन हरख भयो अति प्रेमसहित ब्रज आयो । हरि हलधर ठाड़े गोकुल में दरस परस सुख पायो ॥११॥ ज्यों दीपकसों दीपक जोरे भक्ति हेतु विचारयौ । संकर्षणसंग आय मधुपुरी प्रथम रजक सठ मारबौ ॥१२॥ तोस्बो धनुष कुवलिया मारथों रंगभूमि चल आये । दसविध रूप धरयौ पुरुषोत्तम नाना भाँत दिखाये ॥१३॥ मारे मल्‍ल भोजवंस मर्यो कंस केस गहि मारयौं। मात पिताको आनन्द दीनो सब विधि ताप निवस्यौ ॥१४)॥ चरन परस वसुदेव देवकी उग्रसेन नृप कीनो । यादव वंस उद्योत कियो है पांडव सुध जु लीनो ॥१५॥ दुर्योधन की सभा द्रौपदी अंबर हरत उबारी । असरन सरन दिखाय बिरुद जग करुनासिधु मुरारी ॥१६॥ जरासंघकी सेना वध कर पुरी द्वारिका वासी | सोरह सहस्र एक सौ आठें रानी भोग विलासी ॥१७॥ पवनजतें मागध मरवायो नृप बंधनतें छोरे । राजा सकल बंदतें छूटे चरन परस कर जोरे ॥१ ८॥ राजसूय जग्न कराय चैद्य हत्यो जोतिथान पोहोंचायो । अवभृथस्नान कराय युधिष्टिर कीर्ति बहु जग छायो ॥१९॥ बिनु स्रम कौरवसेन संहारी अर्जुनको यस दीनों । ब्रह्मअस्नतें जरत परीक्षित राख दयानिधि लीनो ॥२०॥ सतयुग त्रेता द्वापर सुरहित वसुधा भार उतास्वौ । कलियुग जीव अनाथ जानके गिरिधर द्विजवपु धास्यौ ॥२१॥ श्रीविड्लनाथ प्रकट पुरुषोत्तम भक्तनकों सुखदायक । कर्मधर्म थापेंगे भुव पर ब्रजपति गोकुलनायक ॥२३२॥ श्रुतिपथ्‌ प्रकट करेंगे श्रीमुख मायामत सब खंडे । निज स्वरूपकी सेवा करके अर्थ भागवत मंडे ॥२३॥ प्रेमलक्षणा दे दासन को भजनानंद बतावे | नाम देय सिर पर्स कमलकर अनेक जीव सुख पावे ॥२४॥ सात पुत्र छैहें हरि समसर सकल ब्रह्म यदुराई | वल्लभनाथ 'तिहारे सुतकी कीर्ति बहु जय छाई ॥२५॥ सुन सुतको लछमननंदन ढाढी निकट बुलायो ॥ कंचनथार भरे मुक्ताफल भक्ति वसन पहरायो ॥२९॥ मनवांछित फल बहुविध दीनो कियो अजाची ढाठी | मानिकचंद बलि बलि उदारता प्रीति निरंतर बाढी ॥२७॥
Maroo
Banfule-dram kokila bollie madhup jhankaar
Part3-052
बनफूले-द्रम कोकिला बोली मधुप झंकार नलागे ॥ सुनभयो सोर रोर बंदीजन मदन महीपति जागे ॥१॥ तिनहदीने अंकुर पल्‍्लवजे द्रुम पहले लागे ॥ मानों रति पति रीझ जाचकन बरन बरन दीयेबागे ॥२॥ नये पात नई लता पहोप नये नये रस पागे ॥ नवल केलि बिलसति गिरिधर संग सूररंग अनुरागे ॥३॥
Basant
Kanhar chhadoho larkai.. kaahekon jaat paraayen chori ghar goras adhikai .. 1....
NityaPad-308
कान्हर छाडोहो लरकाई॥ काहेकों जात परायें चोरी घर गोरस अधिकाई ।। १॥॥ होंतो बहुत करी नकवानी अबही उराहने आई ॥ बाहर द्वार जाउ जिन अबतें घर खेलो दोऊभाई ॥। २॥| हों बलबल मेरी सिख मानों देहों मधुर मिठाई ॥ सुनहैं जो ब्रजराजमहेरत्नो खिजहें कुंवरकन्हाई ॥३॥
Kalyan
Shobhit nasika giridhar gaj motee ..|
NityaPad-305
शोभित नासिका गिरिधर गज मोती ॥| खोलत बीरा खात हँसत डोलत अरुण अधरकी दीनी पोती ॥१॥ कुंडल लोल कपोल बिराजत जगमगात मुख मंजुल जोती ॥ गोविंद प्रभुकोजु श्रीमुख निरखत रसना कहबरनूं मतिबोती ॥२॥
Kanharo
Ladilochhakkhat banmaanh .. apane sanga key sakhan bulawat karkar unchibaanh ..1... mereri
NityaPad-217
लाडीलोछाकखात बनमांह ॥ अपने संग के सखन बुलावत करकर ऊंचीबांह ॥१॥। मेरेरी सनमुखनंदनंदन बेठ कर्दंबकीछांह ॥ अति कोमल लटकत उरऊपर सघन पांतकीलोंह ॥२॥ आइरी देखतुं उनको, मोहे अचंभों आवे ॥ श्रीविद्डल गिरिधरनलालकी मनसगरी सुधि लावे ॥३॥
Saarang
Gopalahin prem umagi bolati nandrani . aho sridama ! lai
NityaPad-078
गोपालहिं प्रेम उमगि बोलति नंदरानी । अहो श्रीदामा ! लै आवहु किन टेरि-टेरि मधु बानी ॥ भोजन बार अवार आनि जिय सुरति भई आतुर अकुलानी ॥ ढूंढति घर घर आंगन द्वारे लौं तन की दसा हिरानी॥। जसुमति प्रीतिजानि उठि दौरे सोभित मुखकचरजलपटानी, परमानंद' नंद-नंदन को अंखियां निरखि सिरानी ॥
Aasawari
Ebal aavat dugger
NityaPad-270
एबाल आवत डगर डगरी ॥ रतनजटित पटकीये री ओट शीश बिराजत तापर कनक गगरी ॥१॥। भोंहरुर वीदीये छब्वलीसो दसन बसन साजे शोभा राजत सगरी ॥ नंददास नंदलाल रीझे पाछें चल आवत बोलत बचन अचगरी ॥२॥
Todi
Nayananmein basarhiri laal key nagari nenk naan nisrat ...
NityaPad-318
नयननमें बसरहीरी लाल के नागरि नेंक न निसरत ॥। तेरे तनकी नवरंग बानिक रसिक कुंवर के चिततें न विसरत ॥ १॥ तेरोमन अरु गिरिधर प्रियको बहुविधान एको करि मिसरत ।। कृष्णदासगिरिधरन रसिकवर सुवशकरणकों सीखी हैं कसरत ॥। २॥।
Kedaro
Aaj aur chhavi nandkishore .. mill ris ruchir lochan bhaye
NityaPad-148
आज और छवि नंदकिशोर ।। मिल रिस रुचिर लोचन भये अंतर चितबत चित्त तुम्हारी ओर ॥ ९॥ प्रकटत पीठ बलय करकंकण देखियत हार हिये विन डोर।। सोहत बसन नील अरू राते अधरन अंजन नयन तंबोर ॥। २॥। नखसिखलों शुंगार अटपटो पायेमानों पलाने चोर ।। फूले फिरत दिखावत ओरन निडर भये देह सन अकोर ॥३॥ देखत बने कहत न बनि आवबे सोभा सींधु बिना कहुूं ठोर ॥| अचरज क्‍यों न होय इन बातन सूर गहन देखयो बिन भोर ॥।४॥
Bilawal
Aaj rawal mein bajat badhaai . dhol bheri sahanaai shankh dhwani
Part1-175
आज रावल में बजत बधाई । ढोल भेरि सहनाई शंख ध्वनि बाजत देत सुहाई ॥१॥ वह देखो वृषभान भवनमें विमल ध्वजा फहराई । दूब लै द्विन आये तुरतही कीरत कन्या जाई ॥२॥ नंद यशोदा तन मन फूले आनंद उर न समाई । मंगल साज लिये ब्रज बनिता गावत गीत सुहाई ॥३॥ चोवा चंदन अगर कुमकुमा भादों कीच मचाई । व्यासदास कुँवरि मुख निरखत कुसुमावलि बरखाई ॥४॥
Devgandhar
Nigam saakhi dekho gokul hari. jaakon doori daras yog yagya
Part1-142
निगम साखि देखो गोकुल हरि। जाकों दूरि दरस योग यज्ञ कियें बॉध्यौ जसोदा ऊखल सों धरे ॥१॥ चुटकी दे दे ग्वालि नचावत नाचत कृष्ण बाललीला करि । जाके भय भ्रमत पवन रवि शशि जल करें टहल लटुकी डर ॥२॥ क्षीर समुद्र शबन संतत जाकों माँगत रोय पतुखियादै भरि । सूरदास प्रभु गुन के गाहक यह रस गाय गये अनेक तरि ॥३॥
Bilawal
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