top of page
Sheetkal Ke Pad
To get full expanded Kritan text click on any column of the kirtan row in below table.
Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Mandal jore jore bethore bhaiya sub mill bhojan keeje .. veejan munn ranjan leey aaee rangili gwalan | NityaPad-209 | मंडल जोर जोर बेठोरे भैया सब मिल भोजन कीजे ॥ वीजन मन रंजन ले आई रंगीली ग्वालन
बदननिरख जीजे ॥१॥| आपुन खात खवावत ग्वालन फिर चाखत रसिकराय
बदन निरखनअधघैजे ॥ हरिनारायण स्थामदासके प्रभुकी लीला परमत बाड़ी
जाय जमुना जल पीजे ॥३॥ | Saarang |
Rahee urr laay lalan kachhu khenho ..| bahu meva pakwann mithaai | NityaPad-030 | रही उर लाय ललन कछु खेंहो ॥| बहु मेवा पकवान्न मिठाई
जो भावे सो लेहो ॥१॥| जेवबुंगो जब कही मेरी करि हां मोहि बाबा की आन॥।
गोपीजन ब्रजवासी बोले अरू बोले वृषभान ॥।२॥ इंद्र ही मेटी गोवर्द्धन थापे
कान्ह कही सो मानी ॥ ग्वाल बोल हरी संग बैठारे परोसत हें नंदरानी ॥ ३॥। हरि
हलधर जब कियो कलेउ जननी तात सुख पायो ॥ ब्रजबासी एकंत व्हे बैठे
सूरश्याम मन भायो ॥।४॥ | Devgandhar |
Jhoolat phool bhaee atee bhaari .. | Part3-371 | झूलत फूल भई अति भारी ॥
निर्मित वर हिंडोल विटप तरु बृं दा विपिन विहारी ॥१॥
सरंत्री सकल अति मुद्दित भई हैं पहरें विविध रंग सारी ॥
भुकुटी भृंण लावण्य अंग अंग प्रति कोटि मदन छबि टारी ॥२॥
वरणन करिये कहा प्रेम को रूचिदायक तहां गारी ॥
व्यास स्वामिनी की छबि निरखत प्राण संपदावारी ॥३॥ | Devgandhar |
Hoe hoe chhori boley . nand kunwar madmato dolai | Part3-276 | हो हो छोरी बोले । नंद कुँवर मदमातो डोलै
॥१॥ सखा बुन्द लये संग आवै ॥ ब्रज नारिन मन मोद बढ़ावै ॥|२॥ केसरि
भ्रि कनक पिचकाई छिरकति स्याम जुबती मन भाई ॥३॥ सुरंग गुलाल
अबीर उड़ाबै ॥ मालव राग सरस सुर गाबे ॥४॥।| बिबिधि सुगंध अरगजा
कीनौं ॥ मनमोहन सब ग्वालन दींनौं ॥५॥ ताल मृदंग पटह ढफ बाजै ॥
स्रबन सुनति धुनि घन जिय लाजै ॥६॥ ब्रिंदावन जमुना तट सोहै ॥ सबहिन
को मन मिरिधर मोहै ॥७॥ कौतिक देखि थके सुर मुनिगन || मगन भई
हुलसी गोपीजन ॥८॥ प्रेम सिंधु बरनो कहाँ ताँई ॥| रसना बिधिना इक
बनाई ॥९॥ यह लीला ब्रजजन मन भाव ॥ “गोकुलचन्द” चरन रज पाबे
॥१०॥ | Malav |
Mille piya sankari gully .. madanmohan piya haskar daari | NityaPad-116 | मिले पिय सांकरी गली ॥ मदनमोहन पिय हसकर डारी
मोतन चंपकली ।।१॥ वारिज वदन देख विधकित भई घुंघटमें न समात अली ॥॥
मोविंदप्रभुप्यारी जु परस्पर रहे रसमत्तरली ॥ २॥। | Bihagaro |
Pichhodi baanhan dey hoe daan | soodhe munn tum lehu gursai raakhi | Part1-219 | पिछोड़ी बाँहन दे हो दान | सूधे मन तुम लेहु गुरसाई राखि
हमारे मान ॥१॥ मारग रोकि रहत मनमोहन सब गुन रूपनिधान । बदन
भोरि मुसिकाय भामिनी नयन बान संधान ॥२॥ नंदरायके कुँवर लाड़िले सबके
जीवनप्रान । परमानंद स्वामी नागर हो तुमतें कौन सुजान ॥३॥ | Devgandhaar |
Bhojan keeno ree girivar dhara.. | NityaPad-220 | भोजन कीनो री गिरिवर धर॥
कहा वरनो मंडलकी शोभा मधुबन तालकदंब तर ।। १॥
पहिले लिये मनोरथ व्यंजन जेपठये वब्रजघरघर |
पाछे डला दियो श्रीदामा मोहनलाल सुघरवर ॥२॥
हँसत सयानो सुबलसेन दे लाल लियो दोनाकर॥
परमानंदप्रभु मुख अवलोकत सुरभी भीर पार पर॥३॥ | Saarang |
Raghuvanshi jijman tihaaro dhaadhi aayoho .. | Part2-266 | रघुवंशी जिजमान तिहारो ढाढी आयोहो ॥
रामजन्म सुन हो आ हों आयो राख हमारो मान ॥१॥
एक वार हों पहलें आयो अब
॥ दे गहनों ढाढिन पेहेराई बहुत बधाईपाई ॥२ ॥
अब जन्मे भरत शत्रुधन लक्ष्मण रघुपति परम उदार ॥
चारोंनेग निवेरो मेरे दशरथनृप दातार ॥३ ॥
बडीबेस सुत दियो विधाता तबही आयहों गायो ||
अश्व रक्षगज सोंनो मोती दे यशवितान जगछायो ॥४ ॥
करहा बाजदिये करजोरे कनक रत्न भर नाग॥
बहुत दूधकी भेंसेंदीनी भले हमारे भाग ॥५ ॥
मेरेआस तिहारे घरकी ओरनसों नहि काज॥
फलो अशीश हमारे मुखकी बढोवंश रघुराज॥
करहाकी गति नाचन लाग्यो ढाढिन हुरक बजाई॥
कौशल्या कैकई सुमित्रा कंचनमुठी चलाई ॥७ ॥
बारबार दान देत हें लेहिं जननकों लागो ॥
दियोदुशाला कियो निहाला ओर गुदीतेंबागो ॥८ ॥
रत्नजटित टोडर पेहेराये ढाढी कुंडलकान॥
महाराज दशरथ तिहीं अवसर हाटक वरस्थो दान ॥९ ॥
ढाढिनकों भीतरतें आयो कंचन पचरंग चीर ॥
फूली डोले चांयन चांयन छायो तिनपें हीर॥१०॥
गागन भेंस पोरी मुकलाई मेल गुदीमें हास॥
रलदाम मानों हेमजराये दे खोली मनगांस ॥११ ॥
तब ढाढी प्रफूल्लित व्हे बोल्यो सुन नृप मेरी बात॥ पोरी
बंधावो रावरी फुल्यो अंग न मात ॥१२ ॥
यह मनोरथ मेरे मनको द्वार पर्यो हों गाऊं।
कौसल्या सुत नयनन देखों अपनी गोद खिलाऊं ॥१३॥
जन्म बधाई दशरथ सुतकी सीखे सुने ओर गावे
धर्म अर्थ कामना अकिकल भक्ति पदारथ पावे ॥ १४ ॥
बहुत भांत ढाढी पेहेरायो जो माग्यो सोदीनो ॥
अग्रदासकों दान अभयपद बहुत अयाचीकीनो ॥१५ ॥ | Saarang |
Piya sanmukh gavanat gaj gamini .. saaj singar pahar putt | Part1-340 | पिय सन्मुख गवनत गज गामिनी ॥ साज सिंगार पहर पट
भूषण नखसिख अंग अंग अभिरामिनी ॥ यमुना पुलिन सुभग वृंदावन तैसीय
सुभग शरद की जामिनी ॥ कुंजकुंज प्रफुलित द्वमवेली देखत प्रेम मगनभर
भामिनी ॥२॥ अति उदार गिरिधरन रसिक पिय भुजभर भेंटत वह कामिनी॥
चत्रभुज प्रभु गिरिधर ऐसे शोभित मानों नवधन में दामिनी ॥३॥ | Rayaso |
Laalan sir sohat heju tiparo .. mulllakaachh kaachhe chhabi aachhe | NityaPad-171 | लालन सिर सोहत हेजु टिपारो ॥ मल्लकाछ काछे छबि आछे
मुरली बजावत प्यारो | १॥। बनबन ठाडे सखा अंसभुज जहां हे बमुना किनारो ॥
सूरदासप्रभु बेनु बजावत उठत तरंग रंग भारो ॥२॥ | Saarang |
Gwalini sondhe bheeni angiya sohe kesar bheeni | Part3-234 | ग्वालिनि सोंधे भीनी अंगिया सोहे केसर भीनी
सारी ॥ लहेंगा छापेदार छबीलो छीन लंक छबि न््यारी ॥१॥ अधिक वार
रिझवार फाग खिलवार चलत भुजडारी ॥ अतर लगाये चतुर नारि तब
गावत होरी की गारी ॥५॥ बडी बडी वरुणी तरुणी करिणी रूप जोबन
मतवारी ॥ छबि फुलेल अलकें झलकें ललकें लखछेल बिहारी ॥३॥ हाव
भाव के भवन केधों भ्रृंडन की उपमा भारी ॥ वसीकरन केधों जंत्रमंत्र मोहन
मनकी फंदवारी ॥|४॥ अंचलमे न समात बडी अखियां चंचल अनियारी ॥
जानों मांसी गजबेल कामकी श्रुति खरसान संबारी |॥५॥ वेसर के मोती
की लटकन मटकन की बलहारी ॥ मानों मदन मोहन जूको मन अचबत
अधर सुधारी ॥६॥ बीरी मुख मुसकान दशन चमकत चंचल चोकारी ॥
कोंधि जात भानों घनमें दामिनि छबि की पुंज छटारी ॥७॥ श्याम बिंदु
गोरी ठोडी में उपमा चतुर विचारी ॥ जानों अर्विंद चुभ्यो न चलें मचल्यो
अलिको चिकुलारी ॥८॥ पोति जोति दुलरी तिलरी तरकुली श्रवण
खुटिलारी ॥ खयनवने कंचन विजांयठे करन चूरी गजरारी ॥९॥ चंपकली
चोकी मुंजा गजमोत्तिन की माला री ॥ करें चतुरचित की चोरी डोरी के
जुगल झवारी ॥१०॥ पेने सुख देने कंचन कुच खुभी कंचुकी कारी ॥
काम कुटी करदीनीहे कीनी शिव सो फिर यारी ॥११॥ एडी लाल महावर
जेहर तेहर बाजन वारी ॥ घायल किये पाय पायल कर सायल नंद ललारी
॥१२॥ जोर दीठसों दीठ ईठमंजीठ रंगनरंग भारी ॥ लगी लाल के पणी
खणी चित चितबन की पिचकारी ॥१३॥ मोहन मदनगोपाल लालपर पढ़
गुलाल जब डारी ॥ संग लग्यो डोले रसीया वृंदावन में बनवारी ॥१४॥
छबि दौरन मोरन मरोर पिय जाय भरे अंकवारी ॥ प्रेम फंद पकरे जकरे
गोरी नें गिरिवरधारी ॥ १ ५॥ छीन लई मुरली करते पटुका पट पीत उतारी ॥
ग्वालिन अधर धरी बंसी वरषी रस सिंधु सुधारी ॥१६॥ जो भावे सो ले
ललना कलना पलना मोहि प्यारी ॥ तोहिददाकी सोंहे ग्वालनी देबंसी हा
हारी ॥१७॥ बाहनमें बाहें चाहें मुख चंद चकोर पियारी ॥ मोहन स्यामत
माल बाल लपटानी हेम लतारी | १ ८॥ गांठ जोर गोविंद चंदसों दीनी सखिन
संवारी ॥ तारी देदे गारी गावें ग्वाल देत किलकारी ।। १ ९॥| वशीकरण बतियन
रस वरखत वरसाने की नारी ॥ प्रभु घनस्याम दियो मनमेवा फगुवा प्रानप्यारी
॥२०॥ | Sarang |
Bado parv tyauhar deewaari .. | Part2-041 | बड़ो पर्व त्यौहार दीवारी ॥
विविध शृंगार कियो लरिकन को रोरी तिलक सोहत रनी भारी ॥१॥
कंचन थाल साज ब्रज बनीता नंदराय घर आयी॥
पुलके दिप समीप सोंज भर गावत गीत सुहाई॥
श्रीविट्टल गिरिधरन लाल छबि संग-अंग अधिकाई ॥
यह शोभा कछु कहीन परत है देखत रही मुसकाई ॥ | Bilawal |
Page 1 of 1
bottom of page
