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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Surbhi kaana jagaay kharik bal mohan baithe raajat huttery .. | Part2-059 | सुरभी कान जगाय खरिक बल मोहन बैठे राजत हटरी ॥
पिस्ता दाख बदाम छुआरे खुरमा खाजा गूंजा मठरी ॥१ ॥|
घरघरतें नरनारि मुदित मन गोपी ग्वाल जुरे बहु ठटरी॥
टेरटेर ले देत सबनकों लेले नाम बुलाय निकटरी ॥२॥
देत असीस सकल गोपीजन यशोमति देत हरख बहुपटरी ॥
सूर रसिक गिरिधर चिरजीवो नंदमहरको नागर नटरी ॥३ ॥ | Kanharo |
Nandanandan vrishbhan kunbari vraj mein khelein horry .. ita | Part3-272 | नंदनंदन वृषभान कुँबरि ब्रज में खेलें होरी ॥ इत
नबसत साजें तरूणी गण उतही सकल गोकुल के बालक किलकत फिरत
घोखकी खोरी ॥| १॥ बाजत सुर मंडल पिनाक सुरबीनगजक आवज ध्वनि
थोरी ॥ पटह निसान भेरि महुबर डफ परस मृदंग रवाब किन्नरी सुनत नगनत
कींन कोरी ॥२॥ चोवामेद जवाद सार्व नवकेसर अरगजा कुंकुम घोरी ॥
सुंदर करन कनक पिचकाई तक तक छिरकत परममुद्ति मन नवलकिशोर
ओर नवलकिशोरी ॥३॥ एक सखी काजर करले आंजे सुंदर बलसो
बलगोरी ॥ एक सखी अंबर छिरकत अंसन लटकत मटकत नेंकदूग अगणित
झकझोर झकझोरी ॥७॥ तब हरि की मुरली करते भरते अतिलेन सखी
सब दौरी ॥| तोलों उमगि चली ले केसर उर अनुराग जनावत सुंदरि मुख
मांडत करसोरी ॥५॥ आईं सकल सखी चहुंदिशते दुहंपट गांठ जोर
तृणतोरी ॥ सरस गुलाल अबीर उडावत भावत सरस धमार हि आावत
धावत हँसत कहत हो होरी ॥६॥ गोकुल भूप रूप नवचंद कला पूरण निरमल
देख नोरी ॥ तिहि अवसर ब्रज युवती सब परम मुदित मन तृस्ब्रित चहुंदिश
भई आतुर अति नयन चकोरी ॥७॥ यह विध अति क्रीडत सुंदरवर देख
धरत धीरज कह्डि कोरी ॥ विविध भांत कुसुमन वरखत हरखत निरखत
सुरकी ललना सब सुरपति सहित लागी जानों ढोरी ॥८॥ तब बल आन
बीच कीनों दीनों फगुवा लीनों अपनोरी ॥ देत असीस सब सीस नवावत
नाचत पिय हें प्रेम वशहे अति यह ब्रज युगयुग चिरजीयोरी ॥५॥ आन
बिबिध भूषण पट अंबर देत सब नगहि गहि कचडोरी ॥ यह सुख निरख
निरखत नमन सर्वस्व अपनों रघुवीर तिहिछिन बलबलबल कीनोरी ॥|१०॥। | Poorvi |
Mero munn gopal haryori ..| chitwatahi | NityaPad-309 | मेरो मन गोपाल हर॒योरी ॥| चितवतही
उरेंपेठ नयनमग को जाने हरि कहा करयोरी ॥ मातपिता पतिसजन बंधुजन सखी
आंगन सब भवन भर्योरी ॥ लोकबेद प्रतिहार पहर अति नहीं राख्यो दूर
परयोरी ॥ २॥| धरमधीर कुल लाज कूंचीकर जीह तारो दे उर में धर॒योरी ॥
शुंखलभई लाज कबाट कठिन उरएते यतन कछुही न सर्योरी ।। ३॥। बुद्धिविवेक
बलसहित सच्योमैंसोधन अटल कबहुं न टर॒योरी ॥ लियोहै चुराय चितें हंस
चितबित सोच सूरत नजात जर्योरी ॥४॥ | Kalyan |
Bhalein tum aae merein praat. rajnisukh kahun anat kiau piya ! | NityaPad-151 | भलें तुम आए मेरें प्रात। रजनीसुख कहुँ अनत कियौ पिय !
जागे सारी रात ॥ झपि-झपि आवत नैन उनींदे कहा कहौं ? यह बात ज्यों
जलरूह तकि किरन चंद की अति समित मुंदि जात ॥ कहुं चंदन, कहूँ बंदन
लाग्यौ देखियतु सांवल गात। गंगा सरसुति मानों जमुना अँग ही मांझ लखात ॥।
भली करी ब्रत वोल निवाहे, मेरे गुह परभात। छीत-स्वामी' गिरिधर सुनि बातें
बदन मोरि सकुचात ॥। | Devgandhar |
Kaun daan daani koo .. curran laage naee reet aae hoe anokhe | Part1-260 | कौन दान दानी को ॥ करन लागे नई रीत आए हो अनोखे
जु दूध दही महि को अजहू नहिं जानी को ॥१॥| चलत हो बिचित्र चाल सुबल
तोक कों चखाय काहु कों कहत गाढ़ो जम्यो काहु को कहत पानी को ॥ “नंददास'
मे आसपास लटक रई कनक बेल ओहन की मटकन में सबहि उरु झानी
' ॥२॥ | Todi |
Khelat bali manmohana ritu basant sukh horry hoe .. | Part3-177 | खेलत बलि मनमोहना ऋतु बसंत सुख होरी हो ॥
सखा मंडली संग लिये बलिराम कृष्ण की जोरी हो ॥१॥ भेरि मृदंग
डफ झालरी बाजत करकठताल |। सबतन मदन प्रगट भयो नाचत ग्वालिनि
ग्वाला ॥२॥ ब्रजजन सब एकत्र भये घोखराय दरबारा ॥ इतवनी नवल
कुमारिका उत्तवने नवल कुमारा ॥३॥ युवति यूथ चंद्रावली अपने यूथ
श्रीराधा || झूमक चेतबगावही बाढ्यो रंग अगाधा ॥४॥ बलि मोहन एकत्र
भये सुबलतोक एक कोदा || दुह्ददिस खेल मचाइयो वाढ्यो हैं मनसिजमोदा
॥५॥ चमकिचली चंद्रावली सुबलतोक पर आई | उतहीकोपि प्यारी राधिका
बलिराम कृष्ण परधाई ॥६॥ कमलन मार मचाइयो जुरेदुहूंनके टोला ॥
मधु मंगल पकरि कढेरियो बांधि गुदी में ढोला । ७॥ बहोत हँसे बलि मोहना
हँसे सकल ब्रजवासी | छोरेहूं छूटेंनहीं परिगई गाढी पासी ॥। ८॥ हँसतहँसत
सब आइयो गावति गारी सुहाई ॥ सेनाबेनी करिसबे बलिमोहन पकरेधाई
॥९॥ बलिजूकी आंखिजो आंजीयो पीयकी मुरली छीनी ॥ मन मान्यो
फगुवालियो पाछें जायबह दीनी ॥ १ ०॥| यह विधि होरी खेलही ब्रज वासिन
सब सुख पायो ॥ भक्तनमन आनंद भयो ॥ गोविंद यह जस गायो ॥ १ १॥ | Jetshri |
Baney hoe rasamse aae. praat.. pyaari nakh pada | Part2-348 | बने हो रसमसे आए. प्रात॥ प्यारी नख पद
रलावली रस रंजित नवरंग गात॥९१ ॥ मुख रेखा मोहन जुवतिन मन
प्रमुदिति पुलकि जँभात॥ “कृष्णदास' प्रभु गिरिधर चंचल जे तरबर के
पात ॥२ ॥ | Suha |
Khelat piya pyaari sondhen bharibhari leeyen kanik | Part3-049 | खेलत पिय प्यारी सोंधें भरिभरि लीयें कनिक
पिचकारी ॥ छलकर छिरकत्ति भरति परस्पर वेतदिवात गारी ॥१॥ छीनलई
मुरली प्रीतम की रंग बढावत भारी ॥ चोवा चंदन बूकाबंदन कुंवरप ैडारी
॥२॥ कैसरि आदि जवाद कुमकुमा भीजि रही रंग सारी ॥ देत नही डहकावति
सुंदरि हंसति करति किलकारी ॥३॥ फयुवा देह लेड पियमुरली के कहो
कुंमरि डाहारी ॥ बरनों कहा कहति नहि आबे बढ्यो सुख सिंधु अपारी ॥४॥
इतमोहन हलधर होऊ भैया उतललिता राधारी ॥ हित हरिवंश लेहु
किन मुरली तुम जीते हम हमारी ॥५॥ | Basant |
Srivallabh rajki balbal jaauun.. | Part2-309 | श्रीवललभ राजकी बलबल जाऊं॥
मुद्रा तिलक सहित मुखजाकी छबि निरख मेरे नयन सिराऊं॥१॥
श्रीवल्लभ पुन श्रीगिरिधर मुरति एक अनेक हियें सोभित नाऊं॥
अभय रास बिलास करो प्रभु लालगोपाल सकल गुणगाऊं ॥।२ ॥ | Gouri |
Haahaa hoe hari nritya karau .. | Pustak1-320 | हाहा हो हरि नृत्य करौ ॥
जैसें कर मैं तुमहि रिझ्ाऊँ त्यों मेरी मन तुमहुँ हरी ॥१॥
तुम जैसें श्रम बाहु करत हो तैसें में हूँ इुलाऊँगी ॥ मैं श्रम देख तिहारे उरकों भुजभर कंठ लगाऊँगी ॥२॥
मैं हारी त्योंही तुम हारे चरन चाँपि श्रम मेंटोंगी ॥
सुरश्याम ज्यों उछँँग लेहु मोहि त्योंही तुम हारे मैं भेटोंगी ॥३॥ | Bhairav |
Sunodhon apanesutaki baat .. dekhayshomati kaana narakhat | NityaPad-193 | सुनोधों अपनेसुतकी बात ॥ देखयशोमति कान नराखत
लेमाखन दधिखात ॥९१॥
भाजनभान डारसबगोरस वाटत हैं करपात ॥।
जोबरजोतो उलटडरावत चपलनयनकीघात ॥ २॥।
जोपावतसो गहत चपलकर कहत नकछु सकुँचात ।।
होंसकुंचत अंचलकरधरकें रहीडॉपमुखगात ॥।३॥।
गिरिधरलाल हालऐसेंकर चले धायमनहिंमुसकात ॥।
दासचतुर्भुज प्रभु जानत हैं यहसोहिदेसात ।।४॥ | Bilawal |
Sou bal kahaa bhayau bhagwan . jihi bal meenroop jall | Part1-080 | सो बल कहा भयौ भगवान । जिहि बल मीनरूप जल
थाप्यौ लिये निगम हति असुर परान ॥१॥ जिहिंबल कमठ पीटठि पर गिरिधर
सजल सिंधु मधि कियौ वितान | जिहिं बल रूप बराह दशन पर धरी घरा करि
पुहुप समान ॥२॥ जिहिंबल हिरणकश्यप उर फास्थो भये भक््तकों कृपा
निधान। जिहिंबल बलि पाताल पठायौ बसुधा त्रिपद करी पर मान ॥३॥
णिहिं बल विप्र तिलकदे थापे रक्षा आपू करी विद्यमान | जिहि बल रावण के शिर
तोरे कियौ विभीषण नृपति समान ॥४॥ जिहिं बल जाम्बदंत बल मरणीौ जिहिं
बल भूष विपति सुनि कान । सूरश्याम अब धामअवधि पर चढ़ि न सकत प्रभु खरे
अयान _॥५॥ | Bilawal |
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