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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Vrindaavan biharati basant chali dekhon nand dularo ..
Part3-032
वृन्दावन बिहरति बसंत चलि देखों नंद दुलारो ॥ नटवर भेष सज्यों रंग भीनों सोभित सीस टीपारो ॥ १॥ सेंग सखा सोभित रँग भीनें रैंगन रगमगे ग्वाल ॥ सुनति चली उठि धाई लाडिली सँँग लीए ब्रज बाल ॥२॥ साजि सिंगार बनी अति सुंदर इक बेष इक सार ॥ कोकिल कैसें कंठ हि गावति मंगल गीत सुढार ॥३॥ बाजति ताल मृददंग झांझ ढफ लागति परम सोहाये ॥ जूथ परस्पर टोल दोऊन कै सबहिन कै मन भाये ॥४॥ चोवा चंदन अगर कुँमकुमा छिरकति अरु छिरकावें ॥ लाल गुलाल अबीर घुंघरि में तन अभिलाष बढावें ॥५॥ भली भई आयों बसंत नर नारीन अति सुख पायौं ॥ आनँद भयो गयो दुःख अब पसु पंछीन मन सरसायौ ॥६॥ गोपीजन फूले समात नहीं ब्रज सुख कहति न आवें ॥ “नंददास” ब्रज बास बसे अरु जो देखे सौं गावें ॥॥७॥।
Basant
Banyo lalit doll chitchor jhoolat saanvaro ..
Part3-380
बन्यो ललित डोल चितचोर झूलत सांवरो ॥ रंग भरे बने अंग निरखि द्रग होत मदन मन बावरो ॥१॥ शोभित प्रिया संग मन मोहन अंग शुंगार सुहाये ॥ गावत हित सहचरी झुलावत बहोत सबन मन माये ॥२॥ बाजत ताल मृदंग रंग भरे छिरकत रंग रंगभीनी ॥ जन जे कृष्ण बसो ऊर अंतर जोरी परम प्रबीनी ॥३॥
Kafi
Pyaari tero mukhchanda summ karveko chandaa bahut tapayo..
NityaPad-118
प्यारी तेरो मुखचंदा सम करवेको चंदा बहुत तपयो।। उडगनको ईस भयो पुनरोसधीस भयो ईससील लो गयो ॥। १॥। सुधामय सरीर कियो बांटबांट सुरन दयो मरमरके फेर जियो तन धरकें नयो ॥ नंददासप्रभु प्यारी तदपि कछु न अर्थ सर्यों जाय समुद्र पर्यो बिधि बूडन न दयो ॥ २॥
Kalyan
Kaahekon kalah baadhyau darun daamari baandhyo kathin lakut
Part1-144
काहेकों कलह बाध्यौ दारुन दामरि बाँध्यो कठिन लकुट करे ज्रास्यो मेरी भैया । नॉहिं कसकत मन निरखि कोमल तन तनक दधिके कारनें भूलीरी तू मैया ॥१॥ हों न रह्मौरी घर देख तो तेरी यों अरि फोरतो भाजन सब सुजानत बलैया । सूरदास हित हरि लोचन आये हैं भरि बलिहूकौ बल जाकौ सोहै सुकन्हैया ॥२॥
Bilawal
Sajani abb mohi samajh purry .. anga anga jey hariki upama
Part1-280
सजनी अब मोहि समझ परी ॥ अंग अंग जे हरिकी उपमा कबिता बनाय धरी ॥१॥ भ्रमर क्ुटिल कुंततलकी शोभा सो हम सही करी॥ मुख छवि शशि पटतर धर दीनौ यातें अधिक डरी ॥२॥ नवजलधर तनु कहियत शोभा दामिनि पट फहरी ॥ सूर सहाय भई यह मुरली अपने कुलहिं जरी ॥३॥
Ramkali
Houn kitt
NityaPad-270
हों कित जाऊंरी कौन घाट कौन वाट कित कहुंपाऊं अरी नंदनंदन ॥ ले गयोरी मन मानिक मेरो दे गयोरी धीरनिकंदन ॥१॥ मुरलीबजायकें कसकस मोहन बस कीमी व्रजचंदरी ॥। रसिकप्रीतम कोऊ कैसें बसिहैं या छैलके छैलफंदरी ॥॥२॥। (की! राग कानहरो
Bilawal
Bhaiya hoe gheri ghero hoe vrajnari zaan joe pai naheen paavai ..
Part1-254
भैया हो घेरी घेरो हो ब्रजनारी जान जो पै नहीं पावै ॥ चली ये जात उत्तर नहीं देत लेउ छिनाइ मटुकिया सीसतें ठीठ देखियत भारी॥१॥ खरिक डुहाय गोरस लियें जात अप अपनें भवन ताकौ दान माँगत जैसें काहू लादी लोंग सुपारी ॥ गोविंद प्रभु आये अनोंखे नये दानी चलौ चलौरी बुलावत घरके लालबिहारी_ ॥३॥
Kalyan
Chonkipari gorihori mein shyam achaanak baanh
Part3-076
चोंकिपरी गोरीहोरी में श्याम अचानक बांह गहीरी ॥ समर छूडाय रिसाइ चढीभ्रु अनखअधर कछु बात कही ॥१॥ चित्तेचित्ते हँसिकेंवसिकें कसिकें भुजमें रस रास लही ॥| हित हरिवंस बाल जाल छबि ख्याल रसालहि देखि रही ॥२॥
Bhairav
Kese kese aaye merey
NityaPad-250
केसे केसे आये मेरे गेहठीक दुपहरिकी झकनिमें ॥| चंबर ढुराउं सेज बिछाउं श्रमकनि झलकत देह ॥१९॥ श्रमनिरवारीये अरगज़ा लेपन करो काहेको करत संदेह ॥ रसीक प्रीतम याहीतें कहावत सूर सुफल करो नेह॥२॥
Saarang
Pyaari pug haulenhaulen dhara .. jaisen tere nupuran baajahi jaagat
Part1-347
प्यारी पग हौलेंहौलें धर ॥ जैसें तेरे नूपुरन बाजही जागत ब्रजको लोग नाहीं सुनायवेयोग हाहारी हठीली नेक मेरो कह्योकर ॥१॥ जौलों बनवीधिनमांहि सघनकुंजकी परछांहि तौलों मुखढांप चल कुंवररसिकवर ॥ नंददासप्रभु प्यारीछिनहुं नहोय न्‍्यारी शरदउजियारी जामें जैहो कहूँरर ॥२॥
Kanharo
Paag sohe latpati gulab key phoolan kulah bharein ..
NityaPad-262
पाग सोहे लटपटी गुलाब के फूलन कुलह भरें ॥ भ्रकुटी विलास हास कुंडल कपोल झाई कोटिक मनमथ मनहरे ॥१॥ कुंचित केश सुदेश तिलक रुचिर भाल माल मोतिनकी विचित्र भेख करें ॥ चतुर्भुजदास प्रभु गिरिधर ऐसी विधि ठाड़े मुरली अधरधरें ॥॥२॥
Kanharo
Shyamaju koo shyam manayake aavat...
NityaPad-334
श्यामाजु को श्याम मनायके आवत।॥ ज्योंज्यों कुंबच्चलत हौलेंहौलें त्योंत्यों पाछेपाछें धावत ।।१॥ कबहुंक आगे कबहुंक पाछे नयनसों नयन जुडावत ॥ कबहुंक पंथके तनिक तिनकादूर करनकों धावत ॥। २॥ कबहुंक लक्षणता रहीहैमानकी तातें अधिक छवि पावत ॥ जो मदमत्त मातंग मातेतें डरपत रहत महावत ॥३।॥॥ अतिशयशंक मोहन अतिआतुर बानिक बहुत बनावत॥ परम रहसि गिरिधर रसलीला जन परमानंद गावत ॥॥४॥
Kedaro
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