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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Khel khelri kanhar trian phulwari main chhiraki | Part3-053 | खेल खेलरी कान्हर त्रियन फुलवारी मैं छिरकि
छिरकि रंग भरतयोंसुखकरे ॥ अतिउत्तम चंदनबंदन लीने ओर अरगजा
करिकें ऐसे अनुराग छिरकि छिरकि तरुनी बिहरें ॥१॥ एक कर पहुप
माल गलेंमेलति दूजे मोर धरावति कोऊ धूप अगरले सुबास करें हरिदास
के स्वामी स्याम कुंजबिहारी तीन लोक जाके बस सो राधाके मुखपै
अबीडरपकैं धरें ॥२॥ | Basant |
Chali dekhani jaiye nandlal ..shru0.. bunny thhani | Part3-066 | चलि देखनि जैए नंदलाल ॥श्रु०॥ बनि ठनि
आई सब ब्रजकी बाल ॥ आज क्रतु बसंत गावहु रसाल ॥१॥ चली राधे
कुँवरि सहचरिस संग ॥ लीए ढफ आवज किजन्नरी मृदंग ॥ बिच महुवरि
मधुर बाजै उपंग ॥ लै मिली स्यामा जू कौं राग रंग ॥२॥ रँँग रँंगी भूमि
भवन पच रँग अबीर ॥ आए करति कुलाहल जमुना तीर || ठाडै मधूसूदन
रसन गोपी नीर ॥ नव केसरि कें रँग रँँगे है चीर ॥३॥ जिह कुंज मधुप
गुनी बास ॥ बोलै अंब डार कोकिल प्रकास ॥ जहँ स्याम सुंदर करैं बिलास ॥
श्रीजगन्नाथ भजि 'माधौदास' ॥४॥ | Basant |
Yuvatiyuth sanga faag khelat nandlal kunwar hoho | Part3-269 | युवतीयूथ संग फाग खेलत नंदलाल कुंवर होहो
होरी बोलना ॥ गावत नटनारायण राग मुद्दित देत चेतफाग चहुंदिस जुर
गोपबाल वृंदलोलना ॥१॥ बाजत आवज उपंग बांसुरी सुरबीन चंग शंख
बंस झांझ डफ मृदंग ढोलना ॥| चलत सुर अनेकताल सुघरराय श्रीगोपाल
वेणु मध्यगान करत होरी होलना ॥१॥ पहरें तन भांत भांत शोभा कछु
कहीनजात भूषण आभरण विविध पट अमोलना ॥ कुंकुमा सुरंग छिरकत
पिचकाई भरभर परस्पर देत कूक ब्रजकी मोरी खोरी डोलना ॥ ३॥ काइँको
काहूको गहत हारतोर काहूकीगहत भुज मरोर काइूकों पकर छांड देत कर
झंझोलना ॥४॥ जगोकुलविचकीचमची सौरभ चहंओर बढ्यो सब तन अनुराग
उमग, रसअतोलना ॥ कुमनदास प्रभु गिरिधर प्रेम सिंधु प्रगट भयो सुरविमान
विथकित देख ब्रज कलोलना ॥५॥
चिबुक चारु परस काहुकी वेसर खूभी काहूके करत कंचुकीके बंद खोलना ॥ | Nat |
Taadhi kahati sakal vrajnari .. tumari suta chirjivo hoe raani | Part1-041 | टाढ़ी कहति सकल व्रजनारी ॥ तुमारी सुत चिरजीवो हो रानी
बांधी सुखकी पारी ॥१॥ जादिन ते तुम्हारे गृह प्रगटे भये सबन मन चाय ॥
फूले ग्वाल गोप अति डोलत फिरिफिरि रस गुन गाय ॥२॥ नेंकहु रह्मौ न जात
भवनमें और कछू न सुहाय ॥ श्रीविद्डल प्राननके प्यारे ग्रिरिधर उर
लपटाय ॥३॥ | Sarang |
Jopein srivallabh pragat naan hotey. bhootal bhushan | Part2-302 | जोपें श्रीवल्लभ प्रगट न होते। भूतल भूषण
विष्णुस्वामी पथ श्रंगार शा स्त्र सब रोते ॥१ ॥ प्रेमस्वरूप प्रकट पुरुषोत्तम बिनपाये केसें जोते॥ सेवा काज लाल गिरिधरकी कुंपुम दास केसें
पोते ॥२ ॥ कर आसरो रहे जे निजजन ते भवपार क्यों होते।। सगुणदास
सिद्धांत बिना यह उर कपाट क्यों खोते ॥३ ॥ | Nat |
Perry mati radhika charan raja mein raho .. | NityaPad-367 | पेरी मति राधिका चरण रज में रहो ॥
ये ही निश्चय कर्यो अपने मन में वर्यो भूलि के कोऊ कछु और वह फल लहो ॥।१॥
कर्म कोऊ करी ज्ञान हूं अनुसरो मुक्ति के बल करी बृथा देही दहो ॥।
रसिक वलल्लभ चरणकमल युग शरण पर आस धरि महा यह पुष्टि पथ फल लहो ॥२॥ | Bihaag |
Darshan dey morr mukut vaare || | Part3-383 | दरशन दे मोर मुकुट वारे ||
अरू कटि राजत सुभग काछनी फरकत पीरे पटवारे || १॥
बृंदावन में धेनु चरावे, बाजत बंसीवट चारे ॥
पुरुषोत्तम प्रभु के गुण गावे शेष सहस्र मुख रसना हारे | ३॥
| Hori-Kafi |
Gharaten chhaak leey aaee gwalan .. | NityaPad-208 | घरतें छाक ले आई ग्वालन ॥
दूरतें ग्वालिन मोहन देखी नेनन सेन बुलाई ॥१॥ सखा संग कोऊ नहीं स्यामके
गये चरावन गाई ॥ जब एकान्त देख मोहनको ग्वालिनी मन मुसिकाई ॥।२॥
दोऊ हिलमिल छाक अरोगत बैठ कदमकी छांही ॥ रहस्य निकुंज भवनकी
लीला कापे बरनी न जाई ॥३॥ सिव सनकादिक नारद सारद उनहु न देत
दिखाई ॥ हरिनारायण स ्थामदास _ के प्रभु माई गोपी महा निधि पाई ॥४॥ | Saarang |
Aaj bahot vrishbhan ghoshamen mangalchar badhaaye | prakatin aaya | Part1-189 | आज बहोत वृषभान घोषमें मंगलचार बधाये | प्रकटीं आय
कूखि कीरतिकी भये सबन मन भाये ॥१॥ आनैदराय जसोदारानी सुनत सबन
ले धाये | गोप ग्वाल और सब व्रजसुंदरि यूधन जूरि जूरि आये ॥२॥ बाजे
बजत गावत मंगल सबहिन हुलसि बढ़ाये | देवभान वृषभान सबन मिलि हैँसिहँसि
भवन बुलाये ॥३॥ देखि देखि सौभग मुख सुंदर अपने भाग्य मनाये ।
श्रीविद्लगिरिधरन राधिका अलभ लाभ सो पाये ॥४॥ | Saarang |
Myrie syathama sthaam sthaam ratat sthaama syaam bhaee ..| | NityaPad-292 | माईरी स्यथामा स्थाम स्थाम रटत स्थामा स्याम भई ॥|
अपनी सखिनसों यो पूछतहै श्यामा कहां गई ॥॥१॥
ब्रजवीधिनमें दूंढत डोलत बोलत राधे राधे॥
रही विचार निहार सोच कर सखी सकल मौन साथे ॥२॥
प्रेम लगन जाके जो लागत ताहि कहो सुध कैसी ।।
कहें भगवान हितरामराय
प्रभु लगन लगे जब ऐसी ॥ ३॥ | Gori |
Baithi raani jasumati laalai jhulaavai . laale jhulaavai aru nain | Part1-093 | बैठी रानी जसुमति लालै झुलावै । लाले झुलावै अरु नैन
सिराबै ॥१॥ सीस कुल्हे अरू मोतिन माला । छगनमगन मेरे नैन
विशाला ॥२॥ नेति नेति निगम जाहि भाखें | सो जसुमतिकौ पय पान चाखें
॥३॥ चित्त दृष्टि मन अति सचुपावै | भाल कपोल दिठौना लावै.॥४॥
बजमें नहीं कोऊ बड़भागिनी ऐसी । सूर प्रभुकी मैया जैसी.॥५॥ | Ramkali |
Aaju bhor hii nandpauri vrajnarin dhoom machaai .. | Part3-083 | आजु भोर ही नंदपौरि ब्रजनारिन धूम मचाई ॥
पकरि पानि गष्डि मारि पौरीया जसुमति पकरि नचाई ॥ १॥ हरि भागे हलधर
हू भागे नंद महर हूहेरे || तबही मोहन निकसि द्वार न्हे सखा-नामले टेरे
॥३२॥ द्वारपुकार सुनत नहीं कोऊ तब हरि चढे अटारी ॥ आओरे आओ
सखा सब संजके घर घेरद्यो ब्रजनारी ॥३॥ सुनत टेर संगी सब दौरे जब
अपने अपने धाम अजुन तोक कृष्ण मधु मंगल सुबल सुबाहु श्रीदाम ॥४॥
ग्वालिनिदौरि पौरि जब रोकी आनन पाये नेरे ॥ चंद्रावलि ललितादि आदिदे
स्यथाम मनोहर घेरे ॥५॥ कित जेहो वसपरे हमारे भजि नसको नंदलाल ॥
फगुवामे ं मुरली हमलेहें पीतांबर वनमाल ॥६॥ केसरि डारी सीसतें मुखपर
रोरी मांडत राधे ॥ विष्णुदास प्रभु भुजग हि गाढे मनवांछित फल साथे
॥७॥ | Khat |
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