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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Dekhauri runuk jhunuk penjani pug dagmagi chaal lalke tribhuvanaki
Part1-165
देखौरी रुनुक झुनुक पेंजनी पग डगमगी चाल लालके त्रिभुवनकी शोभासिंधु लागी डोलै अंगन । पचरंग पीरी पाटकी कोंधनी कटि पट बाँधे कंचन मनी नूपुर धुरि धूसर रत्ननगन ।॥१॥ आगें चले जात तब जननी डर पावत हैं डरपि डरपि किलकि किलकि जसुमति उर लागत तन । सूरदास मदनमोहन लीलासागर गुनआगर व्रजनारी सुरनर मुनि मगन ॥२॥
Gori
Manmohanki yaar gori goojari .. sub vrajke
Part3-152
मनमोहनकी यार गोरी गूजरी ॥ सब ब्रजके टोकत रहें याते निकसे घूंघट मार ॥१॥ झूठे हूं कोऊ कह्ति उठे आये मदन मुरारी ॥ रहि न सके इत उत तके मुरिदेस्ते बदन उघारि ॥२॥ तनसुख की सारी लसे कंचन सोतन पाय ॥। मानो दामिनि की देहसों रही जोन्हलपटाय ॥३॥ धरतपणन लाली फिरे ढरे भरें रीत जाय ॥ काचकरोती जल रंग्यो कछु यही जुगति ठडराय ।।४॥ गुरु निबंतमधि पातरो ओप्यो सो मुखइंदु ॥ अरुन अधर मुसिकातसो भाल सेंदुरको बिंदु ॥५॥| लाललखें लाली चढे उतसासन्नास पियराय ॥ मानोसंयोगिनि विरहनी अरुझी बीच सुभाय ॥६॥ ज्योंज्यों नरनारी सबे हिलिमिलि करत चवाव ॥ सिरोमनि प्रभु दोऊ मिले तातें भयो चोगुनों चाव ॥७॥
Dhanashri
Raat faag kheli praat aae laal pyaare .. anga
Part3-074
रात फाग खेलि प्रात आए लाल प्यारे ॥ अंग अंग मरणजे बागे सुंदर रंग सौंधे सुवास मंद मंद आवे अति उनीदे सिथिल - नैंन तारे ॥१॥ अलक भ्रकुटि भाल गाल, चिबुक भूषन अति रसाल, रसमसे रंजित गुलाल भाँमति रस भारे | डगणमगाई चलति पाई मुख जेँभाई मुसिकाई मद सुरत चिकहत चरचित तानन सुनि प्यारे साँचें बोल प्रीतम- प्यारे मन सलोल बालम बदन बोल अपुने बिसतारे ॥ गोकुल प्रभु भले जु भले वेऊ भली, भ्रकुटि जिन भुराए आए हमारे सो यह करन उन सौं जारि बिजारे ॥३॥
Bhairav
Jaya srivallabhavar avtaar ..
Part2-272
जय श्रीवल्लभवर अवतार ॥ प्रकटभये पूरण पुरुषोत्तम सकल श्रुतिनके सार ॥१॥ तबही प्रकटभये हक तुम हयोसकल भूभार॥ बालकेलि सुख नंदमहरकें विविध विस्तार ॥२॥ जात वहेहे सकलजीव कलि भवसागरकी धार॥ तिनकीबांह गही कमलपद राखे परम उदार ॥३॥ युगयुगराजकरो श्रीगोकुल ब्रजमें नित्यविहार ॥ रामदास प्रभु सब भक्तनके जीवन प्राण आधार ॥४ ॥
Devgandhar
Bhayo nandrayake ghar kheech..
Part2-236
भयो नंदरायके घर खीच॥ सब गोकुलके लरकन के संग बेठे हैं आये बीच ॥१ ॥ परोस थार धरे ले आगें सद्य मांखन घी खीच॥ परमानंद प्रभु भोजन कीनो अतिरुचि माग्यो ईछ ॥२ ॥
Pancham
Milahi nagri piya giridhar suzanso ..
NityaPad-335
मिलही नागरी पिय गिरिधर सुजानसो ॥ सुन्दरी कबक तन साज भूखन बसन कुंज के महल चलि बेग तजी मान के ॥।१॥ तरनि तनया तीर परम रमनीक बन बिहर संग करहि बस सब गुन निधान को ॥ राग केदारो सुन श्रवन बड भागिनी निरखी अंग अंग मुरली कल गान को ॥१॥ चतुर्भुजदास प्रभु चतुर चुडारत्तन करत अभिलाख तुब अधर रस पानकों ॥ अरपी सर्वस्व कुसुम सेज सुख बैठी सखी भेटी सुन्दरी सुघर सांवल सुठानकों ॥। ३॥
Kedaro
Merrie aalee bhanusuta key teer abir udaavahin ..
Part3-131
मेरी आली भानुसुता के तीर अबीर उडावहीं ॥ मिलि गोपी मोपकुमार मधुर स्वर गावहीं ॥१॥ बाजत मधुर मृदंग वेनु सुहावनी ॥ आबवज सरस उपंग चंण मनभावनी ॥२॥ नाचत गोपीग्वाल ताल बजावहीं ॥ मधुर भाभती गारी सबे मिलि गावहीं ॥३॥ भाल सुभग मध्य विशाल मुलाल विराजहीं ॥ चिंबुक चारु अबीर अधिक छबि छाजहीं ॥४॥ कृष्णागरकोपंक बदन लपटावडीं ॥ सुरंग गुलाल उडाय गगन सब छावहीं ॥५॥ केसर भर पिचकारी परस्पर मारहीं ॥ केसू कुसुम निचोय सीसपर ढारहीं ॥६॥ पियके सीस सेहरो सब मिलि बांधही ॥| चपल नयन की चोट मेंनसर सांधही ॥७॥ प्यारीकों ऊबट नहवाय वसन पहरावहीं ॥ मधुर व्याह के गीत सबे मिलि गावहीं ॥८॥ करत ब्याह को खेल सकल मिल भामिनी ॥ विविध सुगंध उडाय कियो दिन यामिनी ।।९॥ दूल्हे दुलहनि जोट बनी मन भामनी || राजत मंडल मांझ परम सुहावनी || १ ०॥| यह विधि नित ब्रज मांझ परम सुख वरखही ॥ ब्रजयुवतिन मुखनिरख अधिक मन हरखटही ॥११॥
Dhnashri
Laalan aisee baat chhaandion .. madangopal chhabilau dhota nita
Part1-244
लालन ऐसी बात छाँड़ीो ॥ मदनगुपाल छबीलौ ढोटा नित उठि मारगआड़ौ ॥१॥ अनौखे दानी अबही भये है मारग रोकत आन ॥ प्रातही तें इहाँई होत ठाढ़े ऊगन न पावै भान ॥२॥ चंद्राबलि कहे सुनो मनमोहन यह जो समै है और | परमानंद प्रभु जान देहु नंदसुवन शिरमौर|॥२॥
Saarang
Barasaaneten dauri naari aeka nandbhavanmein iju . aaj sakhee
Part1-179
बरसानेतें दौरि नारि एक नंदभवनमें आईजू । आज सखी मंगलमें मंगल कीरति कन्या जाई ॥१॥ सुनि जसुमति मन हरख भयौ अति बोलिलई व्रजबाला ! मुक्ता मणिमाला भूषण वर पठई साज रसाला ॥२॥ चलीं गज गामिनि साथन हाथन कंचन थार सुहाये | कमलनके ऊपर खेलत मानों अगनित चंदजु धाये ॥३॥ डहड्हे मुख छबि छाजत राजत लाजित कोटिक मैना | कंजन पर खेलत मानौ खंजन अंजन रंजित नैना ॥४॥ कुंडल मंडित बने अति राजत उपमा अधिक वबिराजै । हार सुढार उरनपर सोहत निरखि शची छबि लाजै ॥५) गावत गीत करत जगपावन भामिनि मंदिर आई । नंदरायजू के आँगनमें आनंद बजत बधाई ॥६॥ देखि मुदित वृषभान भये अति भेट रुची सों लीनी । गदगदू कंठ सबन सों बोलत बीथनि पावन कीनी ॥७॥ कीरति ढिंग निरखी सुठि कन्या धनन्‍्या अधिक अपारा । कौतिकमें कौतिक रस भीने बरखत शीशन धारा )!८)। सब जगधाम धाम पुनि जाकौ शेष धाम जिहि मानें । नंददास सुखकौ सुखसागर प्रगटी है बरसानें ॥९॥
Aasawari
Barsaanen tein vrishabhaanu puraa kii horry khelani
Part3-147
बरसानें तें वृषभानु पुरा की होरी खेलनि निकसी हो ॥ बरन बरन बन ठन आभूषन कनक बेलसी बिणसी हों ॥१॥ जोबन रूप मदन मनमथ कौं उर मोहन मदमाती हो ॥ ऐंड्त चले चाल गरबीली मंद मंद मुसिंकाती हो ॥२॥ झोरी भरि अबीर कुँमकुमा करन कनक पिचकाई हो || आबवति चंग उपंग बजावति गाबति हरि कौं गारी हो ॥३॥ ठाड़े जहाँ सखा संग लीने चतुर खिलारि कन्हाई हो ॥ सीस नवाई दूर भई ठाड़ी हँसि हँसि निकट बुलाई हो ।॥।४॥ उमड़े हैं गोपी ग्वाल परसपर भारी खेलि मचायौ हो ॥ उड़ति गुलाल अबीर अरगजा अति ही अंबर छायो हो ॥५॥ गोपीन मतो बनाई धाई कें मनमोहन गहि लीने हो ॥ आँखि ऑजि मुख माँडि महावर हो हो करि तजि दीनें हो ॥६॥ अपुने दाव स्याम हु पाए तब गहि लीने राधे हो ॥ जेतेक दाव चाव चित उपजे सकल मनोरथ साथे हो ॥|७॥ बेनी गुही बनाई उलटि के कछुक सेंधानी कीनीं हो ॥ दुहुँ और दिठौना दे कैं तब छाँडि रंग भीनीं हो ॥८॥ तारी दे दे ग्वाल हँसति है गोपिन मन मुसिकानी हो || मन में मुदित भई बाहिर तें राधा कछु कुमलानी हो ॥९॥ नँद नंदन वृषभानु लली की सोभा कहा बखानें हो ॥ ब्यास-दास' प्रभु रीझि भिंजि सौं वारति तन मन प्रानें हो ॥१०॥
Aasawari
Kaun thagori bharee hari aaj bajaai ree bosuria rangabheeni ..
Part1-282
कौन ठगोरी भरी हरि आज बजाई री बॉसुरिया रँगभीनी ॥ श्रवण परी जिनके तिननें तबहीं कुल कान बिदा कर दीनी ॥१॥ घुमें घरी घरी नंदकेदारे नवीनी कहा कहूँ बात प्रवीनी ॥ या व्रजमंडलमें रसखान सो कोन भटूरी लू नहीं कीनी ॥२॥
Khat
Heen tau tihaare gharki dhaadhi jaachon nand sujan . soee lehun joe
Part1-118
हीं तौ तिहारे घरकी ढाढ़ी जाचों नंद सुजान । सोई लेहुँ जो मनकौ भायौ नंदरायकी आन ॥१॥ धन्य नंद धन्य यशोदा धन्य धन्य जायो पूत । धन्य धन्य भूमि धन्य ब्रजवासी आनंद करत अकूत ॥२॥ घरघर होत आनंद बधाई जहाँतहोँ मागध सुत । मनमानिक पार्टंबर अँबर दीने नंद बहूत ॥३॥ हय गज हेम भंडार दिये सब फेरि भरे सौ भाँत | जबही देत तबही फिरे देखें संपत्ति घर न समात ॥४॥ ते मोहि मिले जात घर अपने मैं बूज्ञी तब बात । हँसि हँसि दौरि मिले अंक भरे हम तुम एकै जाति ॥५॥ संपत्ति देहूँ लेहुँ नहीं एकी अन्न वस्त्रके काज । जो तुमपै हो मांगन आयौ सोही लैहों ्रजराज ॥६॥ अपने सुतकौ बदन दिखावौ बड़े महर शिरताज । तुम साहिब हौ ढाढ़ी तेरो प्रभु मेरी ब्रजगाज ॥७॥ चंद बदन दरसन संपत्ति दे सोई घर ले जाऊँ | जो संपत्ति सनकादिक दुर्लभ सो सब तुमरे ठाऊँ ॥८॥ ब्रजमें रहों आन नहीं जाचों प्रसाद तिहारो पाऊँ । हों तो जन्मजन्मकौ याचक सूरदास . मेरौ नाऊँ ॥
Dhanashri
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