top of page
Sheetkal Ke Pad
To get full expanded Kritan text click on any column of the kirtan row in below table.
Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Giridharlal ladaaiye hoe jaako bhakt vatsal | Part3-213 | गिरिधरलाल लडाइये हो जाको भक्त वत्सल
हरि नाम ॥| जोकुल गांव सुहावनो हो नंदमहर कौ राज ॥ कान्ह कुमर
को खेलनो हो सब गोपिन सिरताज ॥१॥ हाथन डफ पिचकाई लीने हो
फ़ैंटन भरी अबीर ॥ इत राधा चंद्रावली हो उत हलधर दोऊ बीर ॥२॥
मोहन स्यामा भेख धरे हो स्यामा भेटी जाय ॥ छल बल भुजा छुड़ाय के
हो चिते चलि मुस्काय ॥| ३॥ ललिता एक मतो कियो ह ै मोहन पकरे जाय ॥
आँखि आजि मुख मोड़ि के हो नेक लीने ताल बजाय ॥४।| लीला गिरधर
लाल की हो गावे सब संसार ॥ “ दास नारायण ” यों कहें हो तुम खेलो
फाजग भरमार ॥५॥ | Kaafi |
Baney aaj nandlal saradi premamaadik piyein sanga lalana liyein yamuna | NityaPad-136 | बने आज नंदलाल सरदी प्रेममादिक पियें संग ललना लियें यमुना
तीरें ॥ फूली केसर कमल मालती सघन वन मंद सुगंध सीतलसमीरें ॥१॥
नीलमणि वरण तन कनक मंडित वसन परम सुंदर चरण परस माला ॥ मधुर
मूदुहास प्रकाशदशनावली छबि भरे इतरात दृूग विशाला॥। २॥ कियें चंदनखोर
बदनारविंद मकरंद लुब्ध भ्रमरकुटिल अलकें ॥ हलत कुंडल लटक चलत जब
स्यामघन मणिनकी कांति कलगंड झलकें ॥। ३॥ एक चंपकतनी कृष्ण रसमाती
करे रागपंचम संग लागि सोहें।। एक हरिमरुख निरख धररही ध्यान मन चित्रसम
भई हरि हिये मोहें ॥।४॥ एक दामिनसी भुजमेल ग्रीवा बात कहन मिस मुखसोजु
मुख मिलायो ॥ एक नवकुंजमें खेंचरही कटिबंध आपनो लाल चितचोर
पायो॥५॥ एक स्यामहि हेर सुभग लोचन फेर विहस बोली भले कान्ह कपटी ॥
एक सोधे भरी छुटे बारन खरी एक बिन कंचुकी रीझ-लपटी ।॥॥६॥ एक स्यामा
कनक कंज बदनी प्रेम मकरंद भरी हरि निरख विकसी ॥ ताके रसलुब्ध रहे लपट
सांवरों भ्रमर प्राण प्यारी भुजन बीच जुलसी ॥|७॥ रसिकमणि रंगभरे विरहत
बूंदाविपिन संग सखी मंडली प्रेमपागी।। कहत भगवान हित रामरायप्रभु सोईजाने
जाही लगनलागी ॥८॥ | Khat |
Shree lakshman bhawan anand.. prakate srivallabh | Part2-278 | श्री लक्ष्मण भवन आनंद॥ प्रकटे श्रीवललभ
हरिमुखचंद समय सकल गुण भाये॥ जसुमति सुत जिन सदा सुहाये ॥
ढाल ॥ सुहाय दरस सनाथकीने दैवीजन चित चायसों ॥ गिरिराजधर पीय
सरसलीला अमित पुरुष सुहायसों ॥ खंड मायाबाद सहजहि हुलसि सब
गुन गावहीं ॥ धन्य धन्य दक्षिण देश सब मिलि तात गोद लडाबहीं ॥१॥
धन धन माधो मासा॥ एकही पाखंड खंड परकासा ॥ तिथि एकादशी
नीकी॥ लीला भाव ललित प्रभुजीकी ॥ ढाल॥ शुभ ग्रह लग्न नक्षत्र
तारा योग करन सुठानहे। सबगुन संयुत शरण आये उदये अंश
सुथानहे॥ ए ऋतु बसंत अनंत गुननिधी केल सुखहिन रासी ॥ तिहिं समें
हरिमुख श्रीवल्लभ प्रकटे नित्य बिलासी ॥२॥ अंबुजनेंन विशाला॥
ललित सुभग निथी शोभित भाला॥ गुननिधी श्याम शरीरा॥ लीला
जलनिथी रास गंभीरा ॥ढाल॥ भुजदंड प्रबल अखंड पदयुग अं कब खा
जग जोहना॥ अरविंद मुख अलिवृन्द कुंचित अलक गन मन ॥
युग गंडमंडल रवि अखंडल कोटि कुंडल वारियें॥ पिय नंदनंदनरूप
प्रतिनिधी अलि विचित्र निहारियें॥३ ॥ अबतरने हरि रूप॥ श्रीवल्लभ
लीला रस रूप ॥ देवी किये उद्धारा ॥ प्रगटे हें प्रभु गुणन अपारा ॥ ढाल ॥
अपार शुकवच् सार पथ उच्चार निगमनि ॥ युगरूप एकही रूप
सवुधव प्रगट दासनिपायो ॥ खंड परमत डंड कुगति सनाथ सब तीरथ
॥ निश्चय चरण मनवच शरण प्रभु विचित्र उर धर जिये ॥४॥ | Bilawal |
Batna gaee sthammanohar gaat .. | NityaPad-076 | बत्न गई स्थाममनोहर गात ॥
तिहारो वदनसुधानिधि शीतल अचवत दृगन अघात ॥ १॥
पलक ओट जिन जाउ पियारे कहत यशोदामात ॥।
छिन एक खेलन जात घोष में पल युग कल्प बिहात ॥ २॥
भोजन आन करो दोऊ भैया कुंवर लाडले तात ॥
परमानंद कहत नंदरानी प्रेम लपेटी बात ॥।३।। | Dhanshree |
Aou maanon maaee ghanghan antar damini ..| | Pustak1-357 | अऔ मानों माई घनघन अंतर दामिनी ॥|
घन दामिनी दामिनीघन अंतर शोभित हरि व्रज़भामिनी ॥१॥
यमुना पुलिन मल्लि का मुकुलित शरद सुहाई यामिनी ॥
सुंदर शशि गुण रूप राशि निधि आनैँद मन विश्रामिनी ॥२॥
रच्यौ रास मिल रसिकराय सौं मुदित भई व्रजभामिनी ॥
रूपनिधान श्यामघन सुंदर अंग अंग अभिरामिनी ॥३॥
खंजन मीन मयूर हंस पिक भई भेद गज गामिनी ॥
कौतुक घने सूर नागर सँग काम विमोह्यो कामिनी ॥४॥ | Bihaagro |
Jaba mohoman aaj sakhiri mohan balbir .. madhur | Part3-053 | जब मोह्ोमन आज सखीरी मोहन बलबीर ॥ मधुर
मधुर मुरली स्वर गावति सकल यमुना तीर ॥१॥ कनक कपिस अति
शोभित कटित वरचीर ॥ मानिक चूति ओढनी सांवल शरीर ॥२॥ सिखि
शिखंड शिर सिंधु मुदित भेषअहीर ॥| मुकुलित नववृंदावन कूजति पिककीर
॥३॥ कृष्णदास प्रभु के हित त्रिगुनबड़े समीर ॥ गिरिवरधर जुवतिन संग
बिहरति रतिर्नधीर ॥४॥ | Basant |
Jey veer sahajamen hoy tou bal naan keeje .. raat mahapurush kii | Part1-300 | जे वीर सहजमें होय तो बल न कीजे ॥ रात महापुरुष की
आदि ते अंत लों जानिकें काहूकों दुख न दीजै ॥१॥ जाय अंगद कहौ
आपुनी साधुता यह बचन कहत कछु दोष नाहीं॥ लाभ अति होयगौ शत्रु
करि मित्रता दीनता भाखिये जाय ताहीं ॥२॥ साधु के पास जगदीश कोऊ
कहै बोलिये साधुता टेक छोरी ॥ बालिनंदन प्रति राम ऐसें कहें सबनकी
सूर प्रभु हाथ डोरी ॥३॥ | Maru |
Giridhar peeya rishwat sumukhi alapat raag kaanharon . munn | Part1-347 | गिरिध र पीय रिश्वत सुमुखी अलापत राग कानहरों । मन
अटक्यौ मनमोहन महीयाँ लेत तान है गयो तानरों ॥॥॥ चपलनैन पल्रकन
लगत बिगल्ित भ्रुव करत गानरो ॥ कृष्णदास प्रभु रसिक मुकट मणि गाढ़े
आलिंगन दे बन्यौ बानरों ॥२॥ | Kanharo |
Lunk prati raam angad pathaavo .. jaao baali bali biir suta | Part1-300 | लंक प्रति राम अंगद पठावो ॥ जाओ बाली बली बीर सुत
बालिका बिबिध वाणी कहैं मुखहिं भाव ॥|९॥ बचन अंगद कहैं कहाँ
पठवत मोहि बात इतनी कहौ नाथ मेरे ॥ कहौ तौ प्राकार और द्वार तोरन
सहित लंककों लै धरों अग्र तेरे ॥ _.॥ सकल बनचरनकों लै धरों लंकमें कहौ
तौ गिरिशिलनसों सिंधु पूरूँ !। सूर सुनि बोल अंगद कहत रामसों प्रबल बल
कहौ तौ अरिवंश चूरूँ ॥३॥ | Maru |
Jaijay sriyamuna anand kandini... | Part2-252 | जयजय श्रीयमुना आनंद कंदिनी।॥
दरशपरश त्रिविध ताप जात दुख निकंदिनी॥१॥
अंगअंग छबि तरंग शोभा सिंधुनी ॥
ताहीके अघ कुठार जाकें बंदिनी ॥२ ॥
अक्षय आनंद गोविंद अगम गामिनी ॥
हरिदास तट निवास जन्मजन्मनी ॥३ ॥ | Bilawaal |
Atimanjul jalpravaah manohar sukh avagaahat vidit raajatati taraninandini .. | NityaPad-009 | अतिमंजुल जलप्रवाह मनोहर सुख अवगाहत विदित राजतअति तरणिनंदिनी ॥
श्यामवरन झलक रूपलोललहरवर अनूप सेवितसंतत मनोजवायुमंदिनी ॥१॥
कुमुदकुंजजन विकास मंडित दिसदिस सुबवास कुंजत अलिहंसकोक मधुरछंदिनी ॥
प्रफुल्लित अरविंदपुंज कोकिलकलसारगुंज गावत अलिमंजुपुंज विविधवंदिनी ॥२॥
नारदशिवसनकथध्यास ध्यावत मुनि धरत आस चाहत पुलिनवास सकलदुःख निकंदिनी ॥
नाम लेत कटत पाप मुनिकिन्ननऋषिकलाप करत जाप परमानंद महाआनंदिनी ॥३॥ | Ramkali |
Kesarki dhoti pahenren kesari uparena odhein tilak mudra dharebaithe shrilakshmanbhat dhaam.. | Part2-292 | केसरकी धोति पहेंरें केसरी उपरेना ओढें तिलक मुद्रा धरेबैठे श्रीलक्ष्मणभट धाम॥
जन्म द्योस जानजान अद्भुत रुचि मानमान नखशिखकी शोभाऊपर वारों कोटिकाम॥१ ॥
सुंदरताई निकाई तेजप्रताप अतुलताई आसपास युवती जन करतहें गुण गान॥
पद्मनाभ प्रभु बिलोक गिरिवरधर बागधीश यह अवसर जे हुते ते महा भाग्यवान ॥२ ॥ | Sarang |
Page 1 of 1
bottom of page
