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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
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Kirtan
Raag
Aaj vrishbhaanken anand | bundavipin vihaarini pragati sriradhaju
Part1-184
आज वृषभानकें आनंद | बूंदाविपिन विहारिनि प्रगटी श्रीराधाजू आनैंदकंद ॥१॥ गोपी ग्वाल गाय गो सुत ले चले यशोदा नंद । नंदीसुर ते नाचत गावत आनंद करत सुछंद ॥२॥ लेत विमल यश देत बसन पशु धरत दूब शिर बूंद । लोचन कुमुद प्रफुल्लित देखियत ज्यों गोरी मुखचंद ॥३॥ जाचक भये परम धन कहियत गोधन सुधा अमंद । भये मनोरथ व्यासदासके दूरि गये दुख दंद ॥४॥
Saarang
Ruchir chitrasari podhe dodd navalan kunwar rasik russ nidhan ...
NityaPad-346
रुचिर चित्रसारी पोढे दोड नव॒ल कुंवर रसिक रस निधान ॥। सघन कुंज चहुं ओर उसीर महेल रावटी मध कुसुम सेज रहे प्यारी ने दीयो मान ॥ १॥ हंसि हंसि अंक भरत रति रस केलि करत हरत मदन बिथा करत रसदान ॥ सुख विलास जमुना पुलिन मध खसखांनो रच्यो एसे ब्रजाधीश जू श्याम सुजान २॥
Bihaag
Chaitramas sambatsar pariva nayo parav manyo haye aaj ..
Part2-244
चैत्रमास संबत्सर परिवा नयो परव मान्यो हे आज ॥ नूतन लाड लडाबत सब विधि श्रीवल्लभ श्रीविष्ठल महाराज ॥१ ॥ नये बसन मनिगन आभूषण धरत असन नये रुचि उपजाय।॥ अचमन करिमुख पोंछि बसनतें बीरीदेत सुगंध मिलाय॥२॥ विविध फूलमंडली मनोहर आंगन मोतिन चोक पुराय॥ आरती करत जु मात जसोदा न्योछावर करि अति सचुपाय॥३॥ नवदल निम्ब मधुर मिश्री ले देत सबनकों मन हरखाय ॥ ब्रह्ददासकों माला बीडा देत प्रभु अति निकट बुलाय ॥।४ ॥
Saarang
Badhaai deejai hoe vrishbhan . pragat bhaee tribhuvanaki shobha rasik
Part1-191
बधाई दीजै हो वृषभान । प्रगट भई त्रिभुवनकी शोभा रसिक जनन सुखदान ॥१॥ गोपी नाचति गावति आईं तिनको दीजे मान । जाके हित प्रकटे नंदनंदन सुंदर सुघर सुजान ॥२) गावत गुण गंधर्व अरु किन्नर तिनकौो सुनिये गान । बंदीजन भूपति सब कीने विप्रन दीने दान ॥३॥ श्रीवललभ श्रीविद्लनंदन जाके लागे कान | कुंज बिहारि बिहारिन दोऊ बृंदावनके प्रान ॥४॥
Saarang
Yeh chirjiyo tumare bhaagya badehi paayau . leti balaay sakal
Part1-040
यह चिरजीयो तुमारे भाग्य बड़ेही पायौ । लेति बलाय सकल गोपीजन तुम ऐसौ सुत जायो ॥१॥ अति आनंद भयौ सबहीकें घरघर बजत बधायो ॥ शोभा कही न जात या व्रजकी जबते ये घर आयो ॥२॥ यह उच्छाह समात न मनमें अति रस मंगल गायो ॥ श्रीविहल गोकुलके जीवन गिरिधर सुख उपजायीौ ॥३॥
Sarang
Mudit vrajnagari pahari naye-naye busson aaee sub kunj leey asson mohan kaaj.
Part2-247
मुदित ब्रजनागरी पहरि नये-नये बसन आई सब कुंज ले असन मोहन काज। खाटे खारे मधुर तिक्त व्यंजन विविध बहोत पकवान फल-फूल डलियन मांझ ॥१ ॥ धरे आगे लाय-लाय जिय सचुपाय-पाय करत गुनगान कर मांझ ले ले साज। 'कृष्णदासनिनाथ' जेंबत राधा साथ चेत्र सुद तीज गनगोर मानी आज ॥२ ॥
Saarang
Merey nana lagey vrajpalason .. bolat vachan rasalaso
Part3-139
मेरे नन लगे ब्रजपालसों ॥ बोलत वचन रसालसों ॥ध्रु०॥ मोरचंद्रका सोहे सीस ॥ संग सखा सोहें दसबीस ॥|१॥ मृगमद तिलक बनाये भाल ॥ गति मोहे जजराज मराल ॥२॥ भोंह नचावें गावें गीत ॥ सोहें अंबर ओढे पीत ॥३॥ कानन कुंडल दुलरीकंठ ॥ मधुरमधुर बाजे परिमंठ ॥७9॥ अरुन कमलदल नेन विसाल ॥ उर सोहें वैजंतीमाल ॥५॥ रतनजदित पोछोंची अतिवनी ॥ निरखि थकी सरदशशिवदनी ॥६॥ नासा को मुक्ता अति चारू ॥ सब ऊपर गुंजा को हार ॥७। कटि किंकिनी मोड़े रतिमेन ॥ गोपिन रिझवत देंदे सेन ॥८॥ रुनुझुनु नूपुर बाजें पाय ॥ जनु पंकन अलिकुल किलकाय ॥॥ भूषन विविध सजे सब अंग ॥ देखि भयो रवि को रथपंग ॥१०॥ वनवन फिरें चराबें धेनु ॥ जमुना के कुल वजावें धेनु ॥११॥ हाथ लकुटिया नाचें सुदेस ॥ गौरज मंडित सोहें केस ॥१२॥ ग्रहग्रहते दौरी सबअली ॥ फूली सरद सरोजसी कली ॥ १ ३॥| अंचल पटमुख देजुहसी | सब हरिके उरवीचबसी ॥१४॥ जबमोहन दुरिकें चितयो ॥ ते छिन मोमन चोरिलयो ॥१५॥ सोचि संभारि संकेत चली ॥ भूलि गई नवकुंज गली ॥8६॥ तहां ओचकामो भुजगही ।। बिनबोलें मुख देखि रही ॥१७॥ मुखसों स्वात खवावत पान ॥ करत मधुर अधरा मृत पान ॥१ ८॥ तब उरलागि करी रति केलि ॥ पलपल बढी परम सुख वेलि ॥१९॥ यह सुख निरखित सुरनर रहे भूलि ॥ आनंद बरखे नौतन फूलि ॥२०॥ पुनि विपरीत सुरति मति करी ॥ राग रंग आनंद भरी ॥२१॥ त्रिविधि सुखद मलया निल चल्यो ॥ सबे निकुंज फूलीले हल्यो ।|२२॥ तिहिं औसर पलटे पटचीर ॥ देखि बलैयां ले रघुवीर ॥२३॥
Todi
Laal gulal kii dhoom mutchy haye rasbhar khelat
Part3-337
लाल गुलाल की धूम मची है रसभर खेलत है हरि होरी॥ रत्तन जटित पिचकाई कर लिये छिरकत रसिक नवल किसोरी ॥१॥ ललिता प्रीतम को मुख मांड्यो केसर सों पट बोरी॥ “बिचित्र' बिहारी देखि रीझे परस्पर आनंद सिन्धु झकोरी ॥२॥
Iman
Arujharahe muktahal nirvaarat sohat ghoogharwaare vaar ..
NityaPad-142
अरुझरहे मुक्ताहल निरवारत सोहत घूघरवारे वार ॥ रति मानी संग नंदनंदनके छूटेबंद कंचुकी टूटे हार ।।१॥ निशिके जागे दोऊ नयना ढरकरहेचलत जोबन भार ॥ सूरस्याम संग सुख देखत रीझे वारंबार ॥। २॥
Bhairav
Laalan jagoho bhayo bhor ..
NityaPad-017
लालन जागोहो भयो भोर ॥ दूध दही पकवान मिठाई लीजे माखन रोटी बोर ॥ १॥। विकसे कमल विमल वाणी सब बोलन लागे पंछी चहुं ओर ॥ रसिकप्रीतमसों कहत नंदरानी उठ बैठोहो नंदकिशोर ।२॥
Bhairav
Jaba hii
NityaPad-270
जब ही में देख्यों नागर नंद को मन भई प्रीति करिवेकी कहु अचरा इंडुरी डारी दई कहें गागरि सुधि विसरी गई भरिवेकी । चित चुभि रही छबीलेकी छबि सैनेन से दे मन हरिवेकी ॥ ब्रजपति देह दितापित कित भई रहें तन मग पग धरवेकी ।।
Todi
Jopein srivallabh roop naan jaanen.. tou kesein yeh jan
Part2-306
जोपें श्रीवल्लभ रूप न जानें॥ तो केसें यह जन लीलाके नित्य संबंध करि मानें ॥१ ॥ प्राकृत निखिल धर्मनही परसत अप्राकृत जो बखाने।॥ प्रतिपादित निगमादिक बचनन साकृत सिद्धि निदाने ॥२ ॥ कलि कालादि दोषके तमकर पंडितहू नही जाने॥ संप्रति अविषय ताहीतेहे भुव प्रादुर्भाव कहाने ॥३ ॥ दया देख निजभाव प्रकटकों देत महातम दाने ॥ वाणीकर जब तब निजमुखकों प्रादुर्भाव बखाने ॥४ ॥ तिनको कह्मो अबोल सबनकों तुरत सुबोध बखाने॥ अष्टोत्तर शत नाम जपनकर पाप होत सबहाने ॥५ ॥ अग्निकुमार ऋषी श्वर बरन्यों जगती छंद बखाने॥ देवरूप श्रीकृष्ण रसानन बीज कारुणिक जाने ॥६॥ कर विनियोग भक्तियोगमें प्रतिबंध सबहाने।। अधरामृत रसस्वाद कृष्णको यह सिद्धि करमाने ॥७॥ आनंद परमानंद रूप मय कष्ण मुखाकृत खाकृत आने॥ कृपासिंधु दैवीजो उद्धारक स्मृति आरतिहि ॥८ ॥ श्रीभागवत गूढार्थनको प्रकट परायण जाने ॥ गोवर्धनधर साकृत निश्चय स्थापक वेद बखाने॥९॥ मायावाद निराकारण कर सकल बादबलहाने ॥ मार्ग भक्तिकमलकर बरन्यो तिनके रवि कर माने ॥१० ॥ नरनारी उद्धार करणकों समरथ प्रकट कहाने॥ अंगीकृत कर गोपीपति मानव निज्रवश कर गही आने॥११॥ अंगीकृत मर्यादा बोधक करुणाकर विभुगाने॥। नाहिन दीयो काहूने एसो दान परायण जाने ॥१२॥ महाउदार चरित्र जिनके निजगावत निगम बखाने॥ कर प्राकृत अनुकृति मोहे सर जनवृन्द समाने ॥१३ ॥ जोपें अग्निरूप तन बवलल्‍लभ रूप जलधि नहिं आने॥ भक्तनके हित कारण ऐसे नही देखे न कहाने ॥ १४ ॥ सेवकजन शिक्षाके कारण कृष्ण भक्ति प्रकटाने ॥ निखिल सृष्टि इष्टके दाता इच्छा यह मनमाने ॥१५ ॥ लक्षण सर्व संपन्न महाप्रभु कृष्ण ज्ञान यह दाने ॥ याहीते गुरु वेद पुरान पुकारें कहेत परमाने ॥१६ ॥ आनंदभर परिपूरण अंबुज नयन देख ललचाने॥ कृपादृष्टि आनंद दे दासी दास प्रियापति जाने ॥१७ ॥ रोष दृष्टि के पात भयेतें भक्त वृन्दारिपहाने ॥ याहीतें भक्तन कर सेवित यह निरधार बखाने॥१८॥ सुखको सेवन करिये जाकों दुराराध्य करमाने॥ दुर्लभ चरण कमल जाके निज उग्र प्रताप कहाने ॥१९ ॥ वानी कर पूरत सेवक जन निज शरणागति आने ॥ श्रीभागवत समुद्र मथनकर रासरूप हरिजाने ॥२० ॥ सानिध्यतें जु दियो हित हरिको भक्ति मुक्तिके दानें॥ लीला रास विलास एक रचि कृपाकथा परमानें ॥२१ ॥ अनुभव विरह करणकों सबको त्याग एकमन आने॥ भक्ति आचार दिखायो जनकों मारग कर्म निदाने॥२ | यागादिक भक्तिनके साधक मनक्रम बच करजाने ॥ पूर्णानंद पूरण रतिपति वागधीश गुणगाने ॥२३॥ यहीतें विदुुधेश्ववर पदकी कहियत चित्तमें निसाने॥ कृष्णसहस्र नामके दायक भक्तपरायण माने ॥२४ ॥ भक्ति आचार विविध बोधनकों नाना वचन बखाने॥ अपने काज तजे प्राणनतें प्रिय पदारथजाने ॥२५॥ तादृश भक्तन कर परिवेष्टित देखत मती हिरानें॥ दासजननके हितके कारण साधन सब दरशानें ॥२६॥ सकल शक्तिव्हे रूप दिखाबत श्रीवल्लभ हरि माने॥ भूतल पुष्टि प्रकट करिवबेकों श्रीविद्दल निधिआने ।२७ ॥ पिताभयो राख्यो महिमा सब अपने कुल मधि जानें ॥ दूरकियो हरिमायामतकों गर्व आप धरमानें ॥२८ ॥ पतिब्रता पति पार लोकिक यह लोकिक वरदानें॥ गूढ हृदय भक्तन मन आशय दायक पर गुणगानें ॥२९ ॥ उपासनादिक मारग करके मुग्ध मोह नशानें ॥ मारग भक्ति प्रकटकर सबतें बैलक्षण ठहरानें ॥३० ॥ शरण आयेतें लये ज्ञानकृष्ण हृदयकी जानें॥ प्रतिक्षण नवनिकुंज लीलारस पूरण निज मनमानें ॥३१ ॥ तिनकी कथा विवश चितव्हेकें बिसरे सबगुण आनें॥ ब्रजपति प्रिय ताहीकों कहीयत प्रिय त्रजवास बखानें ॥३२॥ लीलापुष्टि करण ए कहियत भक्तकाम धर्मदाने॥। सबन अजानी लीला इनकी मोहरूप कहानें ॥३३ ॥ सबते दृढ़ आसक्त भये भक्त बश पतित पवित्र बखानें॥ यश अपने गुण गान श्रवणते आनंद बखानें ३४ ॥ यश पियूष लहरिन कर छांडे अन्य भाव पर जानें॥ लीलामृत रस करि पोखे तब कहेत फिरत महारानें ॥३५ ॥ गोवर्धन वास उत्साह एकचित्त लीलाप्रेम समानें॥ यज्ञभोग बलि यज्ञ करनकों चार बेद विकसानें ॥३६ ॥ सत्य प्रतिज्ञा त्रिगुणातीत सुन नीति विशारद जानें | कीरति बढन महा तत्व सूत्र प्रकाशक मानें ॥३७॥ मायावाद तूल उन्मूलन अग्निरूप कहिगानें॥ ब्रह्मवाद उद्धारण कारणकों भूतल जन्म बखानें ॥३८ ॥ अप्राकृत भूषण परि भूषित सहज हास मुख ठानें। ब्रह्मतोक भुवलोक रसातलके भूषणयुत जानें ॥३९॥ उचघरे भाग्य अवनीतलके निज सुंदर सहज कहानें ॥ भक्तनकर सेवित निज पदरज तेई बहुधन दानें ॥४० ॥ यह प्रकार आनंद निधि प्रभुके नाम पदारथ गानें ॥ अष्टोत्तर शत ते कहीयत जे अपने सर्वस्वमानें ॥४१ ॥ श्रद्धा निर्मल बुद्धि करजे नित्य पढत भक्तजन मानें ॥ एकचित्त करकें अधरामृत सिद्धि यहीते जाने ॥४२ ॥ वृथा मुक्तिबिन पाये ताके पायें यह गतिमानें॥ कृष्ण पदारथ रस ग्रहिवेकों जप करियतहें रानें ॥४३ ॥ यहविधि ट्विजकुल पतिके गिरिधर नाम वितान बखाने॥ श्रीबल्लभ श्रीविट्ठल प्रभुको निज अनुचर चर करमाने ॥४४ ॥
Nat
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