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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
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Kirtan
Raag
Hansahans doodh peevat naath ..
NityaPad-304
हँसहँस दूध पीवत नाथ ॥ मधुर कोमल बचन कहि कहि प्राण प्यारी साथ ॥| १॥॥ कनक कटोरा भरयो अमृत दियो ललिता हाथ ॥ लाडली अचवाय पहिले पाछें आप अघात ॥२॥ चिंतामणि चितबस्यो सजनी नाहिन और सुहात ॥ श्यामा श्याम की नवल छबि पर रसिक बल बल जात ॥ ३॥
Bihaag
Keerati raani paalane jhulaavai | rattan jatit koo palana banyau
Part1-205
कीरति रानी पालने झुलावै | रतन जटित को पलना बन्यौ है मोतिन जाल गुथावै ॥१॥ विबिध भांति पाटकी डोरी हीरा बहुत जरावै । गजमोतिनके बने झूमका पचरैंग चीर विछावै ॥२॥ नंदीसुरते जसुमति रानी ग गावत आवै ॥ सब सखियन मिलि पलना झुलावै गरीबदास गुन गावे ॥३॥
Aasawari
Maande dwaar harad rorison laagat param suhaaye . vandanwar saathiye
Part1-135
मांडे द्वार हरद रोरीसों लागत परम सुहाये । वंदनवार साथिये कोरेन आएछे चित्र बनाये ॥१॥ गलिन गलिनमें यह कौतूहल कहत कहा निधिपाये । निधरक भये सकल व्रजवासी अब निज गोप कहाये ॥२॥ अतिरस उमगि भरे नरनारी नंद भवन फिरि आये । श्रीविहलगिरिधरन सबन मिलि लै लै - गोद खिलाये ॥३॥
Saarang
Namo devi gange namo maat gange harr seersi
Part2-338
नमो देवी गंगे नमो मात गंगे हर सीरसी निखिल मघ मलकनंदे ॥ ध्रु० ॥ मधु मथन मूर्तिवर बिंदु कर कामक॑ बहसि बहुबआए बार सतरंगे ॥ हरिचरण नख भीधुर गजदंत निर्गता ब्रह्म जल कृत पात्र गे॥ नमो देवी गंगे।।१ ॥ त्वमसि जलपावनी चतुरुदथि गामिनी सप्त ऋषि सुकृत कुल साले | कनक गिरिलंबिता सकल मुनिवंदिता हर मुकुट सित कुसुम माले॥ नमो देवी गंगे॥२ ॥ पावयति नागरं पूरयति सागर संगता विदुर्गिरि पादे॥ तीर्थवर कारिणी स्वर्ग जो उघारिणी हेम शैल पाषाण भेदे॥ नमो देवी गंगे॥३॥ इह निखिल सुरगणै रिह निखिल मुनीजने रिह निखिल वेद समुचारे। सुयश गीयसे पीयसे जहनु मणीकर्णिके देवी संसार सारे॥ नमो देवी गंगे ॥४ ॥ गलुष जल मीष्टत॑ सत मेघतो फल तब कर मकर गंभीरतोये ॥ तट निकट सिंधुरसी परलोक बंधुरसी सुरसदन साधनोपाये ॥ नमो देवी गंगे ५ ॥ कृत सलील नीरथधुता पुलीन मुपकुर्विता तब नाम निर्मला लापे॥ नीरयति बाधके निर्वाणपद साधके भक्तजन दहती संतापे॥ नमो देवी गंगे॥६ ।| सगर सुत संगमे लसदमर सुंदरी दुती के दुष्कृत दुराय रापे ॥ सेविता चिन्तिता तर्पितावगाहिता मर्जिता मम हरसि पापे॥ देवी गंगे।७॥ इति राम लक्ष्मणो कौशीको नुज्ञया सुर सुरीत कृत नमस्कारे ॥ बद॒ति मतिसागरे धीर जयदेव कविस्तारयसि भव जलधि पारे॥ नमो देवी गंगे ॥८ ॥
Bibhaas
Brindavan bansi rutt bansibat yamunake tata raasmein rasik pyaari
Part1-340
बृंदावन बंसी रट बंसीबट यमुनाके तट रासमें रसिक प्यारी खेल रच्यौ बनमें ॥ राधा माधी कर जोरें रविशशि होतभोरें मंडलमें नृत्यत दोऊ सरस सघनमें ॥१॥ मधुर मृदंग बाजै मुरली की ध्वनि गाजै सुधि न रही री कछू सुरमुनि जनमें || नंददास प्रभु प्यारी रूपउजियारी कृष्ण क्रीड़ा देख थकित सब जन मनमें ॥२॥
Jejvanti
Maan lagyau girivar gaavai ..
Pustak1-319
मान लाग्यौ गिरिवर गावै ॥ तत थेई तत्त थेई तत ताथेई थेई भैरों राग मिल मुरली बजाबै ॥१॥ नाचत नव वृषभान दुलारी अब घर गतिमें गति उपजावै ॥ गिरिधर पियप्यारी की पद रज कृष्णदास ले शीश चढ़ावै ॥२॥
Bhairav
Kusamit vann dekhan chaloaaj .. tahaan pragatbhayo
Part3-057
कुसमित वन देखन चलोआज ॥ तहां प्रगटभयो रति रंगराज ॥ अति गुंजत कोकिल कलसमेत || जुवतीजन मन आनंददेत ॥१॥ राधिका सहित राजत निकुंज तहां मदन मोहन सुंदरता पुंज ॥ दंपति रतिरस गावें हुलास ॥ यह सदां वसोमन सूरदास ॥२॥
Basant
Bhor bhayo jaage jaam laal hoe abb ramkali udey bhayobhan...
NityaPad-223
भोर भयो जागे जाम लाल हो अब रामकली उदे भयोभान॥। गुन की कली गुन पूरनप्यारी कहा अब होत देव गान ॥१॥ भयो बिभास आभास सब देखियत बलि-बलि जाउं तू सुनि लेरी कान ।। आस न करि तू अपुने प्रीतम की सोरठ समजि ले भन ही मन आन ॥॥२॥ सारंग नाम जाको ताके पास जाय आली सो नट भयो कहा करे अभिमान ॥ चितवति चित पूरव मुख बेठी मधुमाध मद भयो तोकूं आन ॥३॥ ये क्रोध भयो गोरी कोन गुनन ते ए मन कहा करों कहा कहूं आन ॥ केदारुन दुःख मिट गयो कान्हर तेरो जीवन प्रान ॥४॥ रेन बिहाय गई प्यारी पिय पास गई मदनमोहन पिय अति ही सुजान।॥। चलत हिंडोल अंकमाल सोभा बन ठन हरिदास ' के स्वामी स्यामा कुंज बिहारी ललित चरन चित धरु ध्यान ॥५॥
Bhairav
Goras radhika lai nikri | nandkau laal amoli gaahak
Part1-234
गोरस राधिका लै निकरी | नंदकौ लाल अमोली गाहक ब्रजतें निकसत पकरी ॥१॥ उचित भोल कहि या दधिको लेहुँ मटुकिया समरी। कछुक दानकौ कछु एक लैहों कहाँ फिरैगी नगरी ॥२॥ नंदरायकौ कुँवर लाहिली दधिके दान मिस झगरी ॥ परमानंद स्वामीसों मिलिके सर्वसु दे डगरी ॥ ३॥
Bilawal
Godbaith gopal kahat vrajrajason ..
Part2-096
गोदबैठ गोपाल कहत ब्रजराजसों ॥ अहो तात एक बात श्रवण दे सुनोजों मेरी॥ भवनमांझहों गयो धरी जहां सोंज घनेरी ॥ में हँस माँग्यो मायपें भोजनदेरी मोहि॥ कर लकुटी ले यों कह्मो यह क्‍यों देहों तोहि॥१॥ क्षुधितजानकें नेह रोहिनी निकट बुलायो॥ दुधप्याई चुचुकार शीखदे कंठ लगायो॥ यह बलि भुक्ते देवता कह्मो हरें लगकान ॥ तातें रचि पच्ि करतहें शाक पाक पकवान ॥२ ॥ यह निश्चय कर कहो कोनसो देव तुम्हारो॥ जो इतनी बलि खाय काज कहा करे हमारो ॥ कहा देवको नामहे कोन लोकको नाथ ॥ इकलोही भोजनकरेके ले अपनों गणसाथ ॥३ ॥ सुनो श्याम चित लाय देवकी कहूं कहानी ॥ आगम निगम पुराण कहें ऋषिवर मुनि ज्ञानी ॥ सब सुखनिधि सुर लोकहे कहीयत ताको ईश ॥ सेवतहें सब देवता जाहि कोटितेंतीस ।४ ॥ जाके अुा र मेघ वरष जल धरणी पोषें॥| अन्नादिक फल फूल निपज परजा तोषे ॥ बहु तृण उपजें पशुनकों भरे सरोवर तोय ॥ देव दिवारी पूजिये जिये तो ब्रज अति सुख होय ॥५ ॥ एक बात हों कहूं बावा जो सांची मानो ॥ ऐसे अनुचर कोटि कोटि कहि कहा बखानो ॥ अश्वमेध शततें लहे इंद्रासनको भोग॥ ब्रजरज कण पावे नहीं कोटि यज्ञ तप योग ॥६ ॥ सो प्रभु अबही चलो तुम्हें हों निकटबताऊं॥ मन भावे तब बोल आपने संगखिलाऊं॥ गोवर्द्धनकी तरहटी हम वच्छ चरावन जांय॥ अखिल लोकके नाथसों छाक वांट हम खांय ॥७॥ ब्रह्मा शिव पुन रटें तनक पावे न वसेरो॥ काटे विघ्न अनेक सदां ब्रज वासिन नेरो॥ बेद उपनिषदमें कहो सो गोवर्द्धन राय ॥ बडरे बैठ विचार मतोकर गोधन पूजो आय ॥८ ॥ भये नंद मनमुदित बडे सब गोप बुलाये॥ कान्ह कहें सो करो भये सबहिन मन भाये ॥ शकट पूतना आदि दे डारे विध्न नसाय ॥ गिरि प्रताप चिरकालतें धिर ब्रजवास वसाय ॥९ ॥ हरख नंद उपनंद सकल ब्रज दई दुहाई॥ सुणति पूजा मेंट राजा गोवर्द्धनाई ॥ आदिलोक वैकुंठलों ब्रज परिपूरण ॥ ब्रजवासिन हितकारने आये हरि गिरि होय ॥१० ॥ सुन ब्रजवासी सकल हरख मन करी बधाई |! कहाकरेगो इंद्र हमारो कृष्ण सहाई ॥। गोपी गोसुत गायले ओर बालक संग लाय ॥ गोप चले उत्साहसों पूजनकों गिरिराय ॥११॥ अगणित शकट जुराय साज पूजाकी साजें॥ कान परी नहीं सुनत चहूंधां बाजन बाजें ॥ ब्रज़नारिनके यूथसों चली यशोदा माय ।॥। गोधन गाय मल्हावहीं उर आनंद न समाय ॥१२ ॥ चले नंद उपनंद आदि ब्रजनंद अगाऊ॥ करत परस्पर ख्याल चले मोहन बलदाऊ ॥ वृद्ध तरुण बारे सबे त्रज घर रह्मो न कोय॥ अपनो कुल पति पूजियें महा महोत्सव होय ॥१३॥ दीनो दरशन शैल दूं शीश नवाये॥ निकट जाय प्रणाम करत अघ दूर नसाये ॥ दीपदान दे नंदजू रजनी मुख चहूं ओर॥ गायन कान जगायके बूझत नंदकिशोर ॥१४॥ आज कूहूकी राति चलो परिक्रमा कीजे॥ गिरि निश जाग भोर बलि पूजा दीजे॥ चले हरख गिरिराजकों सबे दाहिनों दे देहि॥ गोवर्द्धन गोपालकी सब गोप बलैया लेहि॥१५॥ मध्य अधिदेविक रत्न खचित गिरिराज बिराजें॥ दीपमालिका चहूं ओर अद्भुत छबिछाजें ॥ सकल निशा आनंदमें रजनी गई विहाय ॥ विधिवत्‌ पूजा कीजियें बलि उपहार मँगाय ॥१६ ॥ गावत गीत पुनीत सकल व्रजनारि सुहाये॥ अगणित बाजे विविध अखिल ब्रजराज बजाये। गिरिवर प्रथम न्हवावही मानसी गंगा नीर ॥ अगणित कलशा हेमके लेनावत धौरी क्षीर ॥१७ ॥ पुन चंदन उबटाय स्वच्छ जल गिरिहीं नववाये॥ अरगजा कुंकुम पोहोष चरच पटपीत उढाये॥ दीप बहु विधिकीये कुंडवारों धर्भोग॥ सुख समुद्र लहेरिन इन ब्रजवासिन योग ॥१८ ॥ पूजाको प्रसाद देत ग्वालन मन भाये ॥ माथें टोरा बांध पीठ थापे सरसाये ॥ नंदराय आज्ञा दई आंन खिलाओ गाय ॥ कान्ह तोकसों यों कह्यो धौरी पेहेलें खिलाय १९ ॥ कान्ह गहें पट पीत आन जब बोली धोौरी ॥ दूंकत लेहेंडे पेलि वच्छके सन्मुख दोरी ॥ छुवत वच्छ अकुलायकें डाढ समुहाय॥ भलीभली खेली कहें सब गोप श्यामकी गाय॥२०॥ खेली धूमरि गांग बुलाई काजर कारी॥ औरें अगणित झुंड सकल गोपनकी न्यारी। ! सुखपयोधि खपयोधि लहरिन बढ्यो रह्यो सकल ब्रजछाय॥ अन्नकूट विधिवत्‌ नाना पाक बनाय ॥२१॥ बहुविध व्यंजन मधुर चरपरे खाटे खारे॥ वेसनके को गिने केईक सुकवनिके न्यारे ॥ तिन मध्य पूर्यो प्रेससों नव ओदनको कोट ॥ मध्य चक्र चित्रित धर्यों गरि ओदनकी ओट ॥२२ ॥ बहुत भांत पकवान नामले कोन बखानें । गिनत न आवे पार परम रूचि धरे संधानें ॥ वासोंधी मिश्री सनी मिलि मृगमद घनसार ॥ नानाविधि मेवानके गिनत न आवबे पार ॥२३॥ दधि सिखरन संयाव सेंमई पायस प्यारी ॥ वरा मगोरी बरी तिलवरी रोचक न्यारी॥ पापर अति कोमलधथरे घृत नवनीत मँगाय । ओदयो दुध धर्यों धोरीको मिश्री पनो छनाय ॥२४ ॥ तुलसी दल दे नंद पोहोष माला पहेरावें ॥ सौरभ चंदन पीत सजल शंखोदक नावें ॥ दुहुंकर जोरें दीन व्हे ध्यान धरत ब्रजराज॥ प्रत्यक्षव्हे भोजनकरें रूप धरें गिरिराज ॥२५॥ कहत गोप समुझाय रूप गिरिराज निहारों॥ जाकें ऐसो पूत सुफल ब्रजवास तिहारो ॥ मोर पख्ौवा शिर धरे उर राजत बनमाल ॥ सब देखत भोजनकरे हो मानो श्रीगोपाल ॥२६ ॥ यथाशक्ति फल पत्र पाक ब्रजवासी लाये॥ प्रेमभक्ति प्रतिपाल परम रुचिसों वे खाये ॥ काहू अति संकोचते सजि धर राख्यो गेह॥ मांगमांग सबपें लियो प्रकट जनायो नेह ॥२७॥ शीतल परम सुवास सुखद यमुनोदक लीनों ॥ रह्मो जो शेष प्रसाद बांट ब्रजवासिन दीनों॥ बीरीदेत सँम्हारकें आपुन नंद कुमार॥ आरोगत ब्रजराज सांवरो ब्रजजन लेत उगार॥२८॥ महा महोत्सव मान लीयो गिरिराज हमारो ॥ न्रजवासिन शिरछत्न सदां गोधन रखवारो ॥॥ ब्रजरानी कर आरतो लागत गिरिके पाय॥ पटभूषण न्योंच्छावर करकें ग्वालन देत बुलाय ॥२९ ॥ नंदादिक ब्रज गोप सबें जुर सन्‍्मुख आये।॥ नयन पाणि अरु ग्रीव शीश्ष गिरि चरण छुबाये॥ रामकृष्णके शीशपे देव पाणि परसाय॥ आज्ञा ले घरकों चले पदवंदन करवाय॥ ३० ॥ इंद्र उठयो अकुलाय आज क्‍यों होत अवेरो॥ ओरवेर ब्रज जाय लेहुं बलि भोग सबेरो॥ व्रजबलिकी सुध लेंनकों दीने दूत पठाय ॥ महामहोत्सव देखकें कह्ढो इंद्रसों जाय ॥३१ ॥ कोप इंद्र घन जोर सबे ब्रजलोक पठाये ॥ चहूं ओरतें घेरघेर ब्रजबोरन आये।॥ मूशलधार वरखन लग्यो ब्रज कंप्यो अकुलाय॥ कह्यो सबन व्रजराजसों अब को होय सहाय ॥३२ ॥ व्याकुल लख ब्रजवासि कान्ह गोवर्द्धन धायों ॥ वामपाणि अंगुरीन एक नख अग्न उछायों ॥ गोप लकुटिया ले रहे टेकी चहुँधां आय।॥ कोमलकर अति भारतें मति इत उत डिगि जाय ॥३३ ॥ ले कटितें कर वेणु धर्यों अधरन गिरिधारी ॥ सप्तरंध्व स्वर पूर घोर ऊंचीदे भारी॥ पर्वत दीयो उछारकें स्वरपें रह्मो ठहेराय॥ गोपनको बल देखकें फिरि गिरि थांभ्यो आय ॥३४ ॥ सात द्योस निश परी प्रबल अति जलकी धारें॥ गिरिकी छांया सकल गोप गोधन तृणचारें॥ बूंद न काहू परसहीं यह सुन अतुल प्रताप ॥ परम पुरुष यह जानकें इंद्र बढदयो संताप ॥३५ ॥ ले सुरभी ब्रज आई पांय हरिके शिरनायो ॥ तुम देवनके देव कौयो में अपनों पायो ॥ अबलोंमें जान्यों नहीं त्रज बृंदावन रूप ॥ कृषा दृष्टिसों देखियें अखिल लोकके भूष ॥ ॥३६ ॥ गिरि धरधरणि कान्ह पाणि सुरपति शिरधायों ॥ थेनु क्षीर अभिषेक मान अपराध निबारयों ॥ स्वर्ग लोकको राज दे करसों थापी पीठ ॥ अबतें यह व्रतराखियो त्नजपर अमृत दीठ ॥३७ ॥ इंद्र पठायो गेह आप ब्रज माया फेरी ॥ देव विमानन आय वरख कुसुमनकी ढेरी॥ सब कोऊ गोविंदको श्रीमुख निरखत आय ।॥ देत दान बहु नंदजू उर आनंद न समाय ॥३८ ॥ धाय यशोमति माय लालकों कंठ लगावबे।। वार बार जलपीबे चूमकर नयन छुवावे। सातबरसको सांवरों सात द्योस इकहाथ॥ गिरि धार्यो बलदेंवके सो प्रभु वैकुंठनाथ ॥३९॥ सब ब्रजवासी लोग कहत ब्रजराज दुहाई॥ जयजय शब्द उच्चार हमारो देव कन्हाई ॥ दे असीस घरकों चले ग्वाल गोप व्रजनारि ॥ व्रजजन गिरिधर रूपपे डार्यो सर्वस्व वारि ॥४० ॥
Bilawal
Bhajbhaj srivallabh padakamal..
Part2-296
भजभज श्रीवललभ पदकमल॥ भूलि कछू न वबिचारे रे मन सब को हे यहफल ।।१ ॥ विनकीने कछुसाधन तारत कर अपनोंही बल॥ रसिकजन शिर सदा विराजो श्रीत्रजपति श्रीमुख अनल ॥२॥
Sarang
Doll vichitra banyo nandanandan guhi guddi laaee phool ..
Part3-376
डोल विचित्र बन्यो नंदनंदन गुहि गुद्दि लाई फूल ॥ ब्रजनारी सिमिट सब आंई अपने अपने टूल ॥ १॥ ललिता कहे सुनों मममोहन प्रीतम प्यारी की बात || संग सहित वृषभान नंदिनी दोऊ मिल झूलो साथ ॥२॥ कोऊ एक झांझ मृदंग बजाबत कोऊ अलापत राग ॥ कोऊ मुक्तामाल खगवारो वारत मानत भाग ॥ ३॥ छबीली छटन सुर नर मुनि मोहे गंधर्व मोहे गान।। मगन भई व्रजनारी गावें मणन भये अति मान ॥ ४॥ इतनी कहों यथामति मेरी प्रभु मुकुंद विलास || राधा नंद सुबन दोऊ पर बल-बल जाये दास ॥५॥
Basant
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