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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Suni chully sundari puranbhag .. dhaavati gaavati geet param | Part1-013 | सुनि चली सुंदरी पूरनभाग ॥ धावति गावति गीत परम
सुख अप अपने अनुराग ॥१॥ शिथिल अलक झलकत सारिन में चंद चुंबत
मुख आय ॥ निकसे उमगि रोंमरोंमनते उर अंतरके भाय ॥२॥ जूथन आय
भवन भवनते रायरानीजूके पास ॥ श्रीविद्डलगिरिधरनलाल तुम पूजई हमारी
आस ॥ ३॥ | Devgandhar |
Musak uthaavat sees. houn daasi tum rasik siromani sakal | NityaPad-167 | मुसक उठावत सीस। हों दासी तुम रसिक सिरोमणि सकल
लोकके ईश ॥। १॥। कुल्हे सुरंग राजत हें सीस पर सखीजन देत असीस। सूरस्याम
सुख सैया पोढे जगजीवन जगदीश ॥ २॥। | Bihaag |
Matukia mohan merrie deejai. joe kachhu dathi chakhanakon chaahin | Part1-220 | मटुकिया मोहन मेरी दीजै। जो कछु दथि चाखनकों चाहीं
तो रंचक पान कर लीजै ॥१॥ उनआये घन अटक भोरही वनितन नौतन
सारी भीजै । रंग बहैगौ अवार मोहि दै हे कहा कहों जो घर कोउ खीजै ॥२॥
चतुर्भुज प्रभु हों काल्हि आइहों साँचीबात पतीजै । गिरिधरलाल प्रगट भयौ तुमा रो
दान आज अति हट नहिं कीजे ॥३॥ | Devgandhaar |
Bavajumohi duhansikhavo .. | NityaPad-187 | बावाजूमोहि दुहनसिखावो ॥
गाय एक सूधीसीमिलवो होहूँ दुहूँ बलदाऊ दुहावों ॥१॥
लईनोई मेलचरण में लाडिलों कुंवरनोवत बछराऊ ॥
पाणिपयोधर धरें धेनुको भाजन बेगहीसो उपटाऊ॥। २॥
तब नंदरानी नयनसिराये द्विज बुलाय दई दक्षिणावाहू ॥
वारफेर पीतांबर हरिपर परमानंद ग्वालपहराऊ ॥। ३।। | Bilawal |
Phool mahal baithe nandanandan phoolan tunn shobhit singar .. | NityaPad-266 | फूल महल बैठे नंदनंदन फूलन तन शोभ ित सिंगार ॥
फूलनकीं पाग फूलनकों बागो फूलन पटका सरस संवार ॥१॥
फूलनको नखशिखलों गहेनो पहेरे लालन मदन मुरार ॥
फूलनको शिरपेच बन्यो शिर 'फूलन कटि बन्यो ईजार ॥॥२॥
तेसीय बनी राधिका प्यारी फूललकी झलकत तन सारी ॥
तेसेई बने नंदकेनंदन छबि पर सूरदास बलहारी ॥३॥ | Kanharo |
Phool gulabi saaj atee sobhit taahi raajat balkrishna vihaari . | NityaPad-069 | फूल गुलाबी साज अति सोभित ताहि राजत बालकृष्ण विहारी ।
फेंटा गुलाबी पिछोरा रहो फबि फूल गुलाबी रंग अति भारी ॥ १॥
बाम भाग वृषभान नंदिनी पहेरे गुलाबी कंचुकी सारी।
फूल गुलाबी हस्तकमल में छबि पर कुंभनदास बलिहारी ॥२॥ | Saarang |
Maaran chhaand abdehu kamalanayan munn mohana || cuttipt | Part3-285 | मारण छांड अबदेहु कमलनयन मन मोहना || कटिप्ट
पीरू सुहावना ओर उपरेना लाल ॥ सीसमोर की चंद्रिका चंचल नयन
विशाल ॥१॥ कुंचित केश छबि बनी सुंदर चारूकपोल ॥ श्रुतिमंडल
कंचनमणी झलकत कुंडललोल ।|२॥ मोहन भेष भलो बन्यों मृगमद तिलक
सुभाल ॥ अलक मधुप समराजही ओर मुक्तावलि माल ॥३॥ कुंजमहलते
होंचली अपने गहेकों जात ॥ वन में सोरन कीजिये सुन्दर सामल गात ॥४॥
उर अंचल क्रित गहत हो दूर भये कहो बात ॥| अपने जिय ही विचारिये
जो परे कुहू की रात ॥५॥ सांज परीदिन आंथयो अरुझाई किहिंकाम ॥
सेंत मेंत क्यों पाइये पाके मीठे आम ॥६॥ नंदराय के लाडिले बोलत मीठे
बोल ॥ रहिहो के जाय पुकारिहो ना कंचुकी बंद खोल ॥७॥ परमानंद
प्रभु यों रमी ज्यों दंपति रति हेत ॥ सुरत समागम रस रह्यो नदी यमुना
के रेत ॥८॥ | Gouri |
Dekhatfiregwalinidware | tabayahabuddhi rachee apneman bheetar | NityaPad-185 | देखतफिरेग्वालिनिद्वारे | तबयहबुद्धि रची अपनेमन भीतर
डाक परोपिछवारे | १॥। सूने भवनकहूंकोउनाहीं मानोयाहीकोराज ॥
भांडेधरत उघारतमूंदत दधिमाखन के काज ॥२॥ रैनजमाय धरबोहोगोरस परयो
स्यामकेहाथ ॥ लेलैखात अकेलेआपुन सखानहीं कोउसाथ ।|३॥ आहट सुन
युवतीघर आई देख्योनंदकुमार ॥ सूरस्याममंदिर अंधियारो निरखेवारंबार ॥४॥। | Bilawal |
Dekhiri dekhi rituraj aagam sakhee sakal bunn | Part3-061 | दे खिरी देखि ऋतुराज आगम सखी सकल बन
फूल आनंद छायो ॥ ताल कदली धुजा उमगि अति फरहरे संग सब आपुनी
फौज लायो ॥१॥ कोकिला कीर गुनंगान आंगे करें भ्रम भेरी लीए संग
आयो ॥ घुरत निसान घनघोर मोरन कीयो करत पिक सब्द गज अति
सुहायो ॥२॥ फिरत तहां हंस पदचर चकोरन बहु सैल रथ चमक चढि
धमक धायो ॥ उडत वारन बहु कुंमकुमा केसारे तियनके कुचन तकि
तमकरायो ॥३॥ पंच ले बान चहुँ ओर छाए प्रथम चांपले आपु हाथन
चलायो ॥ दोर कर सोर धप धाय लरति अति घेरि चहूं ओर गढमान
ढायो ॥४॥ परी खलबली सब नारि उर मदनकी मिलन मन स्याम अंचल
फिरायो ॥ जीति सब सुभट “कृष्णदास' ब्रिंदा विपिन आय गिरिधरन कौं
सीस नायो ॥५॥ | Basant |
Srivallabh rome rome russ jhalake .. | NityaPad-355 | श्रीवललभ रोम रोम रस झलके ।।
भरे समुद्र अनेकन रस के कृपा लहेर ऊर हलके ॥। १॥
जे जे जा रस के अधिकारी भरत संभारी न छलके।।
रामदास पद कमल महारस चाखन को जीय ललके ॥ २॥
| Bihaag |
Tum summ or naan koee sreejmunaji ..| | NityaPad-011 | तुम सम ओर न कोई श्रीजमुनाजी ॥|
करो कृपा मोहि दीन जानकें निज ब्रजवासो होई ॥१॥
राखो चरण शरन तरणितनया जन्म आपदा खोई ।|
यह संसार स्वारथकों सबविध सुत्बंधु सगो न कोई ॥।२॥।
प्रेमभजनमेंकरत विध्नता संत संतापे सोई |
ताको संग मोहि सपने न दीजे मांगत नयन भररोई ॥३॥
गरलपान डारत अमृतमें विषयारससों मोई |
रसिक कहै दीन होयमांगू लहर समुद्र समोई ॥४॥। | Ramkali |
Chand govind gopi taaraagan baney raasmein banwari .. mukh prataap | Part1-334 | चंद गोविंद गोपी तारागण बने रासमें बनवारी ॥ मुख प्रताप
रंजित वृंदावन नव युवति जनसुखकारी ॥१॥ कमल नयन कमनीय मनोहर
मनहरनी गोकुलनारी हस्त कमल पर गलित कुसुमदल नृत्य मान प्रीतम
प्यारी ॥३॥॥ रसमय रास रसिकनी भामिनी अति रसाल बने बिहारी ॥
क्ृष्णदास प्रभु रसिक शिरोमणि रसिकराय गिरिवरधारी ॥३॥ | Malav |
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