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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Maan naan keejai piya saun bhamini fagun mein peetam | Part3-359 | मान न कीजै पिय सौं भामिनि फागुन में पीतम
तौ तोय बोलन ॥ अबीर, गुलाल, कुंमकुमा, केसर मृगमद, घनसार रचि
धरे बिबिधि अमोलन ॥१९१॥ मान करि बेठी तोई लाज हू न आवति, होरी
के दिनन है घुंघट क्यों न खोलत ॥ “नंददास' प्रभु प्यारी, रूप गुन उजियारी
बाको मन तेरे आली सँग लाग्यो डोलत ॥१५॥
| Udaano |
Russ horry khele saanvaro rung bheene nandlal baal .. | Part3-204 | रस होरी खेले सांवरो रंग भीने नंदलाल बाल ॥
संग गारी निपट उघारी गावत कोन टेव पकरी गोपाल ॥१॥ चोवा चंदन
ओर अरगजा मुख मंडन धाई ले गुलाल ॥ कृष्ण जीवन लछीराम के प्रभु
प्यारे संग सखा लियें ग्वाल ॥२॥ | Kaafi |
Kheli bahu kheli gaang bulaai dhumar dhauri.. | Part2-049 | खेली बहु खेली गांग बुलाई धूमर धौरी॥
बछरापर उपरेना फेरत डाढ मेलकें दौरी ॥१ ॥
आप गोपाल कूंक मारतहें गो सुतकों भरकोरी॥
धोंधों करत लकुट करलीने मुखपर फेर पिछोरी ॥२ ॥
आनंद मुदित गोपाल ग्वा ल सब घेर करत इकठोरी ॥
चत्रभुज प्रभु गिरिधर व्रज यह सुख जुग जुग राजकरोरी ॥३॥ | Sarang |
Pragathati nagari roop nidhan . dekhi dekhi boojhat joe paraspar | Part1-175 | प्रगठटी नागरि रूप निधान । देखि देखि बूझत जो परस्पर
नहीं त्रिभुवनमें आन ॥१॥ उपमाको जे जे कहियत है ते जु भये निरमान ।
कुंभनदास लालगिरिधरकी जोरी सहज समान ॥३॥ | Devgandhar |
Houn hari sanga horry khelaungi | chova, chandan aur | Part3-264 | हों हरि संग होरी खेलौंगी | चोवा, चंदन और
अरणजा पिचकारिन रुँँग मेलोंगी ॥१॥ लोकलाज कुल कानि सबे ं तजि
पतिवृत पाँडइन पेलौंगी । 'सूरदास' स्वामी की बॉडन पकरि पकरि के
झेलोंगी ॥२॥ | Sarang |
Achavan karat ladili laal. | NityaPad-087 | अचवन करत लाडिली लाल।
कंचन झारी गहत परस्पर श्री राधा गोपाल ॥|१॥
जलमुखलेत हसत हसावत देख सखीन की ओर |
राधा माधो खेलत रसभर श्रीभट करत विचार ॥२॥ | Dhanshree |
Khelat madan mohan piya horry .. larika sanga | Part3-290 | खेलत मदन मोहन पिय होरी ॥ लरिका संग
सकल गोकुलके करत कुलाहल ब्रज की खोरी || ९॥| भवन भवनते निकसि
द्वार ब्हे अति प्रफुल्लित मन नवलकिशोरी ।| सोंधो लियें कनक वेलाभर
अरगजा कुंकुम सोंघ सघोरी ॥२॥ एक शुवालि गुलाल लियें कर एकन
लई बहुत कर रोरी ॥ एक पलास कुसुम रंग वरखत एक लियें बीरा भर
झोरी ॥३॥ वाजत ताल मृदंग झाँझ डफ विच विच मोहन मुरली ध्वनि
थोरी ॥ मधुर वचन हँस कहत परस्पर गोविंद प्रभु लीनों चितचोरी ॥|४॥ | Gouri |
Nijajan nirakh nirakh sub phoole.. | Part2-325 | निजजन निरख निरख सब फूले॥
श्रीलक्षमणगृह आज भलोदिन श्रीवल्लभ पलना झूले ॥१ ॥ जो सुख नंद
यशोदा आंगन गोपीजन मिल निरख्यो॥ सो अब देवी जनके आंखन
निरख कमल पद हरख्यो ॥२ ॥ देत दान कंचन पट भूषण याचक भये
अजाची ॥ कृष्णदास आशा विधना सब कीनी मनकी सांची ॥।३ ॥। | Bilawal |
Gorey angaguwali gokulgamki ..shabhru0.. lahar | Part3-151 | गोरे अंगगुवालि गोकुलगामकी ॥शभ्रु०॥ लहर
लहर जोबना करेहो थहर थहरकरेदेह || छतियां धुकर पुकर करे वाकोनयो
रसिकसों नेह ॥१॥ कुबटाको पानीभरे गोरी नवि नवि लेजू लेय ॥| घूंघट
दाबेदांतसों ये गर्व न उत्तरदेय ॥२॥ पहरे नौतन चूनरी लावनि लईसकोरि ॥
अरग थरणसिर गागरी बहचितेचली मुखमारि ॥३॥ चालचले गजहंसकी
ऊंची नीची दीठ ॥ ओढनके मिस मुरकिकें नेंक हरिडे दिखारे पीठ ॥॥४॥
ठमकि चले मुरिमुरि हसे गोपी फिरि फिरि ठाडी होय ॥ घायलसी घूमत
फिरे याको मर्म न जानें कोय ॥५॥ तिलक बन््यों अंगिया बनी वाकी पायल
की झनकार ॥ बडेबगरतें नीकसी श्याम खरे दरबार ॥६॥ | Dhanashri |
Kheechari bhor hii ruchi daine . parat hita sou preet sajani karat haye dram | NityaPad-079 | खीचरी भोर ही रुचि देन । परत हित सो प्रीत सजनी करत हे द्रम
बेन ॥१॥ प्रान पति दृग पूतरी मय उभे सब सुख ऐन ।। गोरस रुचि सों लेत भोगी
बलित आलस नैन ॥२॥ चलत इत उतत नेह पूरित कलकटाच्छन सेन ।। स्वाद
भेदी अघस अंगन पुनि जगाबत मेन ॥३॥। सीत हेमंत प्रीत पोष सहचरी दे चेन |
वृन्दावन हितरूप अचवन लगत बीरी लेन ॥४॥ | Aasawari |
Jahaan gagan gati gerg kaho | yeh baalik avtaar purush haye | Part1-137 | जहाँ गगन गति गर्ग कहो | यह बालिक अवतार पुरुष है
कृष्ण नाम आनंद लक्मौ ॥१॥ द्रोण धरा वसु परम तपोधन पुत्र नाम नि रभय
करी । ते तुम नंद यशोदा दोउ वर माँग्यौ सुत देहु हरी ॥२॥ कहै नैंदराय
सबनके आगें सकल मनोरथ पूरन करे | परमानंददासकौ ठाकुर गोकुल की आपदा
हरे... ॥३॥ | Ramkali |
Palana shyam jhulaavat janani .. sutaki lait balaay jasoda | Part1-091 | पलना श्याम झुलावत जननी ॥ सुतकी लेत बलाय जसोदा
हँसिवेकी छबि जात न बरनी ॥१)। अंग अंग के भाव अवलोकत पॉयन सरस
पूँघरुँ बजनी । अति अनुराग परस्पर गावत प्रफूलित बदन नंदजूकी घरनी ॥२॥
किलकि किलकि प्रभुभुजा पसारत अंकन लेत यशोदा गवनी । सूरदास बड़भाग्य
महरिके पूरन भई पुरातन करनी ॥२॥ | Ramkali |
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