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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Praatasame krishna rajeev lochan.. sanga sakhaa thaade gau mochan ..1..
NityaPad-020
प्रातसमे कृष्ण राजीव लोचन।। संग सखा ठाडे गौ मोचन ॥१॥ विकसत कमल रटत अलि सेनी ॥| उठो गोपाल गुहेंर तेरी बैनी । २।। खीन खांड घृत भोजन कीजे ॥ सद्य दूध धौरीको पीजे ॥३।। सुतहि जान जगावत रानी ॥परमानंदप्रभु सब सुखदानी ।।४॥
Bibhaas
Chhel chhabili samdhin hoe yeh chhabi cone kii
Part3-099
छेल छबिली समधिन हो यह छबि कोन की छलि लाई ॥ साच कहो हमसों समधिन तुम कोहे राम दुहाई ॥ १॥ समधिन सों समधोरो कीजे कीरति मनयों आई ॥ नंद गामतें महरि जसोदा समधिन न्योंति बुलाई ॥ २॥ गिरिधारी जूकी महतारी सबही बिधि सुखदाई ॥ ब्रजनारी गारी गावत सारी बहु पहराई ॥३॥ चंदवदन तेरो चित्तचोरे नयन घने नटरारे ॥ भारे पलकन में अति सोहे तेरे चंचल तारे ॥४॥ कज्जल रेख सहित सोहे लोचन मोचन जुललोहे ॥ हाहा नें कहेरि मोतन तोहि मेरे गरे की सोहे ॥५॥ भोंह धनुष नासा चंपकली बेसरिकी छबि न्‍्यारी ॥ मुख देखें चकचोंधि रहत तेरी बेंदीकी बलिहारी ॥६॥ अर्धचंद तेरो बेंदा बन्यो बेनी बरनी न जाई ॥ मानो इंदुपे त्रिया फनिगकी अमृत अचवन आई ॥७॥ मानो मदनकी चपल चामठी कनिक खंभ लटकाई ॥ मानों निसा पतिके सुखलूटी होत प्रात उठिधाई ॥८॥ दारच्योंद्सन हसनिचोकाकी अधरनकी अरुनाई ॥ ठोढी गाढू गढ्यो मनमेरो तेरो संगन छोड्यो जाई ॥९॥ ललित कपोल अमोल गोल गोरे गोरे चितचोरें || निरखि निरखि मुख छबि मृगनेनी रीझि रीझि तृनतोरें ॥१०॥ कानन करन फूलफवे कंठ मोतिन सरीसोहें ॥ कोन कोन उपमादीजे जु समधिन पटतर कोह़े ॥११॥ अति उतंग कुंचन पर कंचुकी खयनवनी अतिगाढी ॥ कंचन कुंभन पर मनमथने मानोंसांचे ढारी ॥१२॥ बांये कर पल्‍लवन मुद्रिका खयेनबरा अतिगोल ॥ श्रवन सिरात्त सुनत समधिन तेरे मीठे मीठे बोल ॥१३॥ कर कंकन चुरोगजदंती गजरन फोंदा सोहे॥ दुरिमुरिकें घूंघट जब काढै चितेचिते मनमोहे ॥ १ 8॥ कटिलंडणा पचरंगी तन सोहे झूमक सारी ॥ कदली खंभ जे हरिराय की पायबनी अतिभारी ॥ १ ५॥ पायल ओर बिछीयाजु छबीले नखनमहाबरिदीनों || अटकि रहे उरमें अनबट समधिन सर्व सुहरिलीनों ॥|१६॥ गति गयंद कटि किंकिनी बाजेमकर मधुर मनमीना ॥ धुनिसुनि थकित रहे मुनिमन नगर भयो आधीना ॥१७॥ सोंधे में सगवगी सदां सोहत समधिन सकुमारी ॥ मोहि रहे मकरंद बासरस भमर करें गुंजारी ॥६८॥ पानखात अलसात सखिनमें हंसत सहजहांसीरी ॥ जगमगात जोवनमदाती ओढें पावरी पीरी ॥१९॥|। चंद्रभगा चंद्रावलि ललिता हसत देदे करतारी || कोकिल केसे कंठ सबे गावति समधिन कों गारी॥|२०॥ कोमल कपोलनमें समचिनजू दसन चिन्ह किनदीने || पलकन पीक कीलीक ललित लोचन रसमसे कहां कीने ॥२१॥ हृदेनखरेख कंचुकी दरकी अंग अंग अलसाई मरगजी माल सिथल कटि पटलों पलपल लेत जुंभाई ॥२२॥ रस निधान रसरास रसिली रसिकन रसिक पियारी ॥ रसिक सबे रसबस करिलीने महामोहनी डारी ॥२३॥ सुनि सबही के ललित बचन समधिन जू तब हैंसि दीनो ॥ हावभाव द्रणकरि कटाक्ष सबहिनको मन हरिलीनो ॥२४॥ भोंहकमान तमकि तरुनी द्रग बानता कही डारे ॥ जिनके लाभे ते रसपाणे द्रगते टरे न टारे ॥२५॥ समधिनजू तुम्हारो रूपरंग रस मोपे कह्मो न जाई ॥ धन्य धन्य बिधिना बिचितन्न जिन तोसीन्रिया बनाई ॥२६॥ देत असीस स्यामघन अलि श्चववनन विनती सुनि लीजे ॥ परमउदार सदां समधिनजू हमही दरसन दीजे |॥२७॥
Dhanashri
Bandon avadh gaam .. itey raajat jaanaki barr utein shyama shyam ..1 ..
Part2-259
बन्दों अवध गाम ॥ इते राजत जानकी बर उतें श्यामा श्याम ॥१ ॥ इते सरयू वहत निर्मल उते यमुनानीर ॥ हरत कलि विष युगल मूरत जान जनकी पीर ॥२॥ इते शवरी स्वर्ग दीनो चित्रकूट बनाईं॥ उते कुब्जा रूप दीनों चन्दन चारु घिस लाई ॥३ ॥ इते खेवत सखा-तारे बेठिकें रघुराई ॥ उते कर नख भूष तारे करगहे यदुराई ॥४ ॥ इते शांर्गपाणि सोहे ललित लछमनथीर ॥ उते मुरलीकर विराजे हल गहें बलवीर ॥५ इते गौतम घरनिकीगति कीनी राम सुजान ॥ उते द्रौपदी लाजराखी द्वारका पति कान्ह ॥६ ॥ धीर सागर राम मूरत करे गीध निहाल॥ उते गज बैकुंठ पठयो दोरिकें नंदलाल ॥७ ॥ कबहु बावानंदके घर जात माखन खात॥ तनक भोजन करो विलमो कहत कौशल्या मात ॥८ ॥ भक्त हेत अवतार लीनें धरि दोऊ अवतार ॥ दास तुलसीशरण आये को उतारे पार ॥९ ॥
Saarang
Aaj nand key nandan soun aisein badh gaee raar ree .. una jhataki
Part1-256
आज नंद के नंदन सों ऐसेंई बढ़ गई रार री ॥ उन झटकी मेरी दधिकी मटुकीयां में वाही दीनी गार री ॥१॥ ललिता बीच परी झगेे में दोऊ कर लेत उसार री ॥ उन उखटी मेरी तीन शाखकी में उख़टी बाकी चार री ॥२॥ उनपें मेरी चूक बक्षाओ मोय ले पायन पार री ॥ राधाकृष्ण के झगरे न ष्णदास बलिहारी ॥३॥
Adano
Maanan deit aliri munn tero manveko karat .. piyaki
NityaPad-122
मानन देत आलीरी मन तेरो मानवेको करत ॥ पियकी आरतदेख मेरेजिय दयाहोत तेरी दृष्टि देखदेख डरत ॥। १॥ मोसो कहत कहा मेरो नदोष कछू निपट हठीली धायक्योंन अंकभरत ॥ नंददासप्रभु दूतीकें वचनसुन ऐसे अंगढरचो जेसे आंचके लगेते राग ढरत ॥२॥।
Kedaro
Thataadhin nrityat sulap sudes bhawan vrishbhan key . barnat buns
Part1-210
ठटाढ़िन नृत्यत सुलप सुदेस भवन वृषभान के । बरनत बंस निकट कीरति के पहरे अद्भुत वेस | लटकि चलत गति ललित भाल पर श्रमजल सिथिल सुकेस ॥१॥ जो पायो सो सबहि लुटायो भूखन वसन अपार । “हित अनूप” बैठारी नियरे राखी अपने द्वार ॥२॥
Gori
Gwalini daan hamaro deejai chaal chalat atee joban maati..
Part1-232
ग्वालिनि दान हमारो दीजै चाल चलत अति जोबन माती॥ सुनिरी भटू दिन दिनकी यह गति किहि विधि अब जो भरै बहुभाती ॥१॥ दानदान करिकें यह ढोटा चाल चलत औरन जो सुहाती ॥ श्रीविद्लगिरिधरनलालसों मुर्मुर कहत सबै मुसिकाती ॥२॥
Bilawal
Aliri rasmondal madhya nritya karat madan mohan adhik sohan
Pustak1-351
आलीरी रासमंडल मध्य नृत्य करत मदन मोहन अधिक सोहन लाड़िली रूप निधान ॥ चलन चारु हस्तभेद मिलवत आछी भाँत-भाँत मंदहास भ्रुव बिलास लेत नयन नहीं में मान ॥१॥ दोऊ मिल राग केदारों अलापत होड़ाहोड़ी उघटत बिकट तान ॥ परमानंद निरख गोपीजन बारत हैं निज प्राण ॥२॥
Kedaro
Bahutafiri tumkaj kanhai ..
NityaPad-200
बहुतफिरी तुमकाज कन्हाई ॥ टेसटेरहों भई बावरी दोऊ भैया तुम रहे लुकाई ॥१॥ जे सबग्वाल गये घरघरको तिनसों कहि तुम छाक मेगाई।। लोनी दधि मिष्टान्न जोरकें यशुमति मेरे हाथ पठाई ॥२॥ ऐसी भूख मांझ तूलाईतेरी किहि विधि करों बडाई ॥ सूरस्थाम सब सखन पुकारत आवत क्‍यों न छाकही आई ॥। ३॥।
Saarang
Gopsaben upnand bulaaye. cone kajakon humm hankaraaye .. 1 ..
Part2-067
गोपसबें उपनंद बुलाये। कोन काजकों हम हंकराये ॥ १ ॥ सुनतहि हम सब आतुर आये॥ कंस कछू कहि मांग पठाये ॥२९॥ यह जानी अति धाये।। सब मिल कछह्मो बहुत डरपाये ॥३॥ काल्हई राज अंश आये॥ ग्वाल कहत तुरतहिं उठधाये ॥४ ॥ महेर कह्नो हम तुम डरपाये ॥ हँसहँस कहत आनन्द बढाये ।५ । हम तुमकों सुखकाज मँगाये। वारवार यह कहि दुखपाये ॥६ ॥ सूर इंद्र पूजा विसराये ॥ यह सुनत सिरसबन नवाये ॥७ ॥
Bilawal
Shobhaaj bhalibani aaee .. jalsutauparhansbirajat taparinder badhudadsai ..1..
NityaPad-157
शोभाआज भलीबनि आई ॥ जलसुतऊपरहंसबिराजत तापरइंद्र बधूददसाई ॥१॥ दधिसुतलियो दियोदधिसुतमें यह छबिदेख नंदमुसकाई ॥ नीरजसुतबाहनकोभक्षण सूरस्यामले कीर चुगाई ॥२॥
Bilawal
Greeshm ritu maadho juu key mahal mein aavan koun atee tarsat hain ..
NityaPad-244
ग्रीष्म ऋतु माधो जू के महल में आवन कों अति तरसत हैं ॥ जेठ मास में तन जुडात ज्यों माघ मास सरसत हैं ॥१॥| भवन बूंद यों छूटत फुहारे मानौं पावस ऋतु बरसत है ॥। घोरि अरगजा अंग लगावति बैठें अति हुलसत हैं ॥२॥ ना वैभव वेकुंठ जो ब्रज में श्रीवल्लभ गृह दरसत हैं ॥ 'नंददास' तहां ताप रहे क्‍यों रमा आदि पग परसत हैं ॥३॥
Saarang
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