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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Naidgam kii gopi barsaanain chali aanee .. maangati
Part3-113
नैदगाम की गोपी बरसानैं चलि आँई ॥ माँगति फगुवा कुँवरि पै कीरति जू लेति बुलाई ॥|१॥ इक गौरी इक साँवरी देति वृषभानु जु कों गारी ॥ झील सरस सुर गावति हैँँसि हँसि दे तब गारी ॥१५॥ नाँचति करति कुलाहल तन की दिसा बिसारी ॥ भीजि रही उर अंतर विकल भई अति भारी ॥ ३॥ लीए गुलाल अरगजा करन कनक पिचकारी ॥ तन तनसुख पहिरे अति रैंगरँग रंजित सारी ॥४॥ स्यामा जु निकसो बाहिर हम तुम खेलैं होरी ॥ कमलन मार मचाई गई वृषभानु की पौरी ॥५॥ सुनि मनमोहन धाए जहैँ जुबती समुदाई ॥ देखि नंद के लाले स्यामा जू बुधि उपाई ॥६॥ हाटक घट केसरि भरि लै मोहन सिर नावैं ॥ भए निरंतर अंतर रीझि रीझि सुख पावें ॥ ७|। सरबसु बारे बारनैं तन मन धन बिसरावैं ॥ चञोबा आदि साख मोरा मृगमद बरसावै ।|८॥ चंदन बंदन बूकाल श्रीमुख लपटाबे ॥| मोहन बदन निहारी कैं अपुनें दृगन सिरावैं ॥९॥ इक सखी उठि दौरी कीरति जु गही लींनें ॥ हम तुम खेलै फागु आजु अपुनें कर लीनें ॥१०॥ एकु सखी लै धाँई कें कुंमकुम घट भरि लींने ॥ कीरति जु पै डारति रँग रँग में अति भीने ॥११॥ फणुबा दीयै हिं बने सुनहु कीरति माई ॥ पट दुकूल आभूषन देति सबन मन भाई ॥१२॥ यह बरसानें को सुख कहति कहा बनि आबै ॥ निरखि निरखि सुर जन सबै लै पुहुपन बरखावैं ॥१ ३॥ ब्रज जुबति प्रफुलित मन निकसि देति असीसा ॥ कीरति जु तुमारी सुता जीवहु कोटी बरीसा ॥१४॥ इह्ि बिधि होरी खेलि ही ब्रज बासीन सुख पायौ ॥ फागु बडो त्यौहार हैं सबह्िन मिलि के मनायों ॥ १ ५॥ जुगल किसोर भाव तैं बनी हैं अनुपम जोरी ॥ “गोबिंद” अपुनों तन मन धन बलि बलि कींनों री ॥१६॥
Bilawal
Aalee tere aanan drig alasyut raajat rasamseri |
NityaPad-045
आली तेरे आनन दृग आलसयुत राजत रसमसेरी | नवकिशोर अंग अंग रंगरेन रसेरी ।१॥ शिथिल बसन अधर दशन नखक्षत लसेरी ॥ पीकछाप युगकपोल पिय मुख लाग हसेरी ॥ २॥। में जानें पहचाने वचन प्रीतम गुणग्रसेरी ॥। पियविहारी लाल ललित उरोजन बीच वसेरी ॥३॥
Lalit
Horry khelai laal, dhaf baajain taal, jhaanjh jhanananan
Part3-210
होरी खेलै लाल, ढफ बाजैं ताल, झांझ झनननननन ॥भ्रु०॥ चोवा, फूलेल, अबीर, अरगजा, भैँवर उड़ति भननननन | निकसे कुँवर झूमकि खेलनि को हँसति चलति ठनननननन | १॥ घर घर तें बनिता बनि आँईं भनक परे स्बनननननन ॥ कंचन की पिचकाई कर गहैं छिरकि स्यथाम तनननननन ॥२॥ केसरि कीच मची हरि आँगन उमड़ि घुमड़ि आँई घनननननन || उड़ति गुलाल अरुन भयौ अंबर लखि न जात रैंनि दिनननननन ॥३॥ एकु नाँचति, एकु गहि झक झोरति जावैं तान तनननननन ॥ 'सूर श्याम' प्रभु किसोरी रबन सँग धुरि गोकुल ब्रज गगनननननन ॥|8॥
Kaafi
Shavallabhanakon koun dekhenjije..
Part2-274
शवल्लभनकों कों देखेंजीजे॥ नखशिख सुन्दरता को सागर रूप सुधारस भरभर पीजे ॥॥१॥ बचन माधुरी परम मनोहर भक्त जनन सबकों सुखदीजे ॥ छीतस्वामी श्रीवल्लभजूके पदपंकज अपने उरलीजे ॥२ ॥
Ramkali
Merey ree ! munn mohan bhaai | sanjhaa samey dhenu key paachhen aavat hain
NityaPad-109
मेरे री ! मन मोहन भाई | संझा समे धेनु के पाछें आवत हैं सुखदाई।॥। सरक्षा-मंडली मध्य मनोहर मुरली मधुर बजाई | सुनत ख़बन तन की सुधि भूलि, नैन की सैन जताई ॥ कियौ प्रवेस नंद-गृह-भीतर जननी निरखि हरघाई। छीत-स्वामी' गिरिधर के ऊपर सरवसु देत लुटाई।।
Gori
Sunder badan dekhyo aaj creat mugat suhavano |
NityaPad-176
सुंदर बदन देख्यो आज क्रीट मुगट सुहावनो | मन भावनो ब्रजराज। लीयो मन आकर मुरली रही अधर पर साज ॥ १॥ कलक ओट न सही सके लछि महामनोहर तास | गोपीजन तन प्रान वारत रह्मो मन्‌ूमथ लाज ॥।२॥ सूर सुत यह नन्‍्द को श्री वललभ कुल सरताज ॥।
Bilawal
Chhavbili nagri aho roop kii aagari merau munn mohi liau..
Part1-226
छवबीली नागरी अहो रूप की आगरी मेरौ मन मोहि लीयौ॥ दधिकौ दान लैहौं प्यारी तब तोय जान देहों |।ध्रु॥॥ और सखिनकों जान दै तू सुनि न्यारी द्वै बात ॥ रह रहे ढोटा नंदके कित एतौ इतरात ॥२॥ बरजि सखा तू आपने ये करत अति अनीत ॥ दि भाजन पटकत्त हैं झटकत हैं नई रीत ॥३॥ घेरी कर ठाढ़ी करीं उतरत ही यह घाट ॥ दानके मिस लूटत हो नित अबलन की बाट ॥४॥ दान काल्हि लै आवहीं हम दान निवेरें काल ॥ बूझौ जाय नंदबावा सौं कबते है यह चाल ॥५॥ दधि माखन सबहीनकों सबै डार तुम दैहो ॥ एकौ बूँद न देहीं जो नाम दानको लैहौ ॥६॥ मिसही मिस झगरतहौ लाला दिन गयौ बनमाँझ ॥ अदल बदल मन दै लियौ हो उलटि चली घर साँझ ॥७॥ परी प्रीति गाँठि हदें छोड़ी नहीं अब जाय ॥ मुख रिस मन आनंद इत उत परत न पाय ॥८॥ दधि लीयौ सब नंदलाल दई सुख की रास॥ मन हरिकौ तब हर लियौ परी प्रेम की पास ॥९॥ ब्रजवधू मानों ध्वजा बसन हरि तन फहेरात ॥ सूरदास मदनमोहन पिय पाछें चले जात॥१०॥
Bilawal
Sriyamunaji nirakh sukh upjat, sanmukh vundavipin suhaaye,
NityaPad-014
श्रीयमुनाजी निरख सुख उपजत, सन्मुख वुंदाविपिन सुहाये, श्रीविश्रांत वललभजु की बैठक, निर्मल जल यमुना के नहाये ॥१॥ भुजतरंग सोहत अति नीके, भँवर कंकण सुहाये, ब्रजपतिकेलि कहा कवि बरने, शेष सहख्रमुख पार न पाये ॥ २॥ श्रमजल सहित अगाध महारस, लीलासिंथु तरंगन छाये, सकल सिद्धि अलौकिक दाता, जे जन तकि चरनन चित लाये ॥॥३॥। रविमंडल द्वार होय प्रकटी, गिरि कलिंद सिर तें ब्रज धाये, हरिदास' प्रभु सोभा निरखत मन क्रम वचन इनके गुण गाये ॥४॥
Bhairav
Kaha jogiaki drishti laagi kanhaiya merau roway hoe maaee .
Part1-116
कह जोगियाकी दृष्टि लागी कन्हैया मेरौ रोवे हो माई । घरघर पूँछतत फिरत जसोदा दूध पीवे ना सोवै ॥१॥ कहाँ गये जोगी नंदभवन ब्रजमें फिरि फिरि हारे । फन जोगिया कों ढूँढ़ि निकासी सुतकौ ताप निवारै॥२॥ चलिरे जोगी नंदभवनमें जसुभति मात बुलावें । लटकत लटकत शंकर आवें मनमें मोद बढ़ावें ॥३॥ आये जोगी नंदभवनमें राईलौन कर लीनौ । वारि फेरि लालनके ऊंपर हाथ शीशपै दीनौ ॥४॥ रोग दोष सब दूरि गयो है किलक हँसे नंदलाला | मयन भई नंदजूकी रानी दीनी मोतिन माला ॥५॥ रहो रहो जोगी नंदभवनमें ब्रजमें बासौ कीजै जब जब मेरी लाला रोवे तबतब दरशन दीजै ॥६॥ तुम तो जोगी परम मनोहर तुमको बेद बखानें । बूढ़ो बाबू नाम हमारी सूर श्याम मोहि जानें ॥७॥
Aasawari
Srivallabh guna gaathn..
Part2-285
श्रीवल्लभ गुन गाठं॥ निरखत सुंदर स्वरूप बरखत हरि रस अनुप द्विज बर कुल भूप सदां बलि बलि जाउं ॥१॥ निगम अगम कहेत जाहि सुरि नर मुनि न लहे ताहि सकल कला गुन निधान पूरन उर लाउं॥ गोविंद प्रभु नंद नंदन लक्षमण सुत जगत बंदन सुमरण त्रय ताप हरण चरण रेणु पाउं ॥२ ॥
Bilawal
Laal saanvaren hoe saisiye bihaarani gori .. taa chhinuki bali
Pustak1-345
लाल साँवरें हो सैसीये बिहारनि गोरी ॥ ता छीनुकी बलि जाऊँ सखीरी जा कर करत निहोरी ॥१॥ कंकण मणि मर्कत मणि प्रगटि बरसांनौ नंदगाँउ रे ॥ दिधना रचित न होय श्रीभट राधा मोहन नाउरे ॥२॥
Bihaag
Houn vraj mognauju vraj taja anat naan jaauun ..dhru... badade
Part1-116
हों ब्रज मॉगनौजू ब्रज तज अनत न जाऊँ ॥ध्रु.॥ बड़डे भूषति भूतल महियाँ दाता सूर सुजान | कर न पसारों सीस न नाऊँ या व्रजके अभिमान ॥१॥ सुरपति नरपति नागलोकपति मेरे रंक समान । भाँति भाँति मेरी आशा पूजी यै ब्रज जन जिजमान ॥|२॥ मैं व्रत करि करि देव मनाये अपनी घरनी संयूत । दियौ विधाता सब सुखदाता गोकुलपतिके पूत ॥२॥ हों अपनी मनभायौ लैहों कित बौरावत बात । औरनकों धन घन ज्यों बरखत मो देखत हँस जात ॥४॥ अष्टसिद्धि नवनिधि मेरे मंदिर तुब प्रताप ब्रज ईश । कहत कल्यान मुकुंद तात करकमल धरी मम शीश ॥५॥
Dhanashri
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