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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Sudin sumangal jaani jasoda laal koun pahiraavati bagau ..
Pustak1-317
सुदिन सुमंगल जानि जसोदा लाल कों पहिरावति बागौ ॥ अँग-अँग भूषन ललित मनोहर लटकि जवारें पागौ ॥ व्रज-सुंदरी निरखि मन हरषतिं सगन होत मन फूलत । रूप-रासि रस-रसिक लाडिलौ देखियतु नव तन भूलत ॥ मैया देखति लेति बलैया मुख चूँवति सचु पावति । 'परमानंददास' मन हरषत सुमिरि-सुमिरि गुन गावति ॥
Saarang
Bhalenju bhalein aaye momen bhaaye pyaare ratike chinh duraaye ..
NityaPad-151
भलेंजु भलें आये मोमन भाये प्यारे रतिके चिन्ह दुराये ।। सबरस दे आये अंजन लीक लाये अधरन रंगपाये कहां जाय ठगाये ॥१॥ हौंहीं जानत और कोई नहीं जानत घड छोल बतियां बनाय तुम लाये ॥ नंददासप्रभु तुम बहुनायक हम गँवार तुम चतुर कहाये ॥ २॥।
Devgandhar
Roop mohini dhari vraj aaee. adbhut saaji singar manohar
Part1-088
रूप मोहिनि धरि ब्रज आई। अद्भुत साजि सिंगार मनोहर अमुर कंस दै पान पठाई ॥१॥ कुच बिच बाँटी लगाई कपट करी बालघातिनि परम सुहाई । बैठी हुती जसोदा मंदिर हुलरावत सुत श्याम कन्हाई ॥२॥ प्रगटी आनि जु तहाँ पूतना प्रेरित काल अवधि नियराई । आवत पिकि बैठना दीनो कुसल पूँछि अति निकट बुलाई ॥३॥ पौढ़ाये हरि सुभग पालने नंदघरनि कछू काम सिधाई । बालक लियौ उठाय दुष्टमति हरखित स्वस्तन पान कराई ॥४॥ बदन निहारी हरि प्रान हरि लीनौ परी राक्षसी जोजन ताई । सूरज दई जननी गति ताकों कृपासिंधु सुख धाम पठाई ॥५॥
Aasawari
Agamasuni riturajko phooli sub vrajanariju ..
Part3-119
आगमसुनि ऋतुराजको फूली सब ब्रजनारीजू ॥ वबरनवरन सिंगारि कियें चंदन चरचित सारी. ॥ १॥ नवनवलासी फूलकीफूल लिये भरि झोरी ॥ अरगजा चंदन वंदन अरु घसि लीनी रोरी ॥२॥ मंगल साज सबे सजे तब निकट कुंवरि के आई ॥ प्रथमहि चोस वसंतहे मन हरखित देत बधाई ॥३॥ गांवें मारि सुहावनी अति प्रमुदित नवल किसोरी ॥ संग ब्रज कुसल समाज सो फिरि आई फागुन छोरी ॥9॥| ताल मृदंग बजावहीं रूंज मुरज सहनाई ॥ डफ दुंदुभी अर झालरी जनु बाजत मदन दुह्ाई ॥५॥ सुनि सुघोख कोलाहला जिय सबहिन को सरसानों ॥ गिरधरके अनुराग सों भीजि रह्यो बरसानों ॥६॥ यह विधि साज समाजले मिलि चली रायजू की पौरी ॥ श्रीराधाजू के लेनकों उठि नंदरानी दौरी ॥७॥ प्रथमही केसरि नीरले अंग चीर सबनके वबोरे ॥ केसरि अरगजा घोरि कें सिर भरिभरि जडूवा ढोरे ॥८।॥ सोंधो सुरंग गुलालले बह साखि जवाद मिलायो ॥ आनि अचानक लाडिली हंसि महारे वदन लपटायो ॥॥ छिरक्‍यो सब मिलि धायकें छलबल सों उठि दौरी ॥ जानि कुंवरि वृषभानकी तब महरिलई भरि कौरी ॥१०॥ चुंबत चांपति प्रेमसों पुनिपुनि कंठ लगावे ॥ जो कछु आनंदजीयको मुख कहत कझ्यो नहीं आवे ॥११॥ मनिमय नाना भांति के भूषन वसन मंगाये || तब हम इनकों लेंडगी कहो गिरिचर कहां दुराये ॥ १ २॥ कछु एक ओचकचाहिकें तब महरि बदन मुसिक्यानी ॥ नागरि सब गुन आगरी बात हिये की जानी ॥१३॥ तब युवततीजन धाई के चढ़ी जाय चित्रसारी ॥ सकुचत बदन द्रावहीं हँसिगहे जाय गिरिधारी ॥ १ 8॥ घेरिलिये चहंओरतें अब छूटो कहां पलाये ॥ क्‍यों युवतिन के क्सपरे तुम कहीयत अधिक बलाये ।।१५॥ काहद्दू बातें भेदकी कहि कानेन में उठि दौरी ॥ काहू अचानक आनिके लाल लिये भरि कौरी ॥१६॥ काइ्डू नाना भांतिसों रंगचित्र कपोलनकीयो ॥ काहूमरूबट मांडिकें मथिबेंदा रोरी दीयो ।| १ ७॥ काहू नीकी भांतिसों अंजननैन बनाये ॥ सहज ही चपल कुरंगसें ढरिकाननलों आये ॥१ ८॥ काहू गहिवेनीगुद्दी रचि मोतिन मांग सुढारी || तनसुख की सोंघेसनी सुठि सारी सरस संभारी ॥ १९॥ चंपकलता चली धायकें तब चिबुक दिठोना दीनों ॥ मोहि रही सब मोडनी व्रजरूप मोहनी कीनों ॥२०।॥| नाना वरन अबीरले मनमोहन बदन लगायो ॥ पूरनचंद मानोघनमें नवइंद्र धनकसो छायो ॥२१॥ केसरि ढोरी सीसतें बहिचले खार पनारे ॥ अरगजा ओर गुलालसों भरे घरनके द्वारे ॥२२॥ सनमुख मुखहि नीहारते सुखनिरखत कोऊन अघानी ॥ गारी देत सुहावनी अतिरस सों लपटानी ॥२३॥ आगें व्हे मोहन * लिये हँसत हँसत सब आई ॥ घूंघट सो मुख ढांकिकें पणन महरिके लगाई ॥२४॥ यह कन्या काद्दू रायकी सो आप समर्पन कीनी ॥ रूप बेसगुन स्याम के यह बिधाता दीनी ॥२५॥ हरखत मन आनंदसों तुम बांटो आज बधाई ॥ विधिते रूप उजागरी हम कोन वधूले आंई ॥२६॥ विंहसि वधू को नामले तब महरि गोद बेठारी ॥ प्रमुदित अति आनंदसों विधितन गोद पसारी ॥२७॥ घूंघट ओट उतारिकें तब युवती मुरि मुसिक्यानी ॥ हँसी परस्पर नागरी तब देखत महरि लजानी ॥२८॥ हो हो होरी बोलही नाचें देकरतारी ॥ प्रमुदित करहिं कुलाहल गावें मीठी गारी ॥२५९॥ यह ब्रज होरी खेलको सब सुखते सुख न्यारो ॥ यह समाज नित माधुरीके टरत न हियते ढारबो ॥३०॥
Bilawal
Bilag kitt maanat hoe joo hamaro |
NityaPad-297
बिलग कित मानत हो जु हमारो | कहाजु भयो पाछें दुहि दीनी होतो ग्वाल तुम्हारो ॥ १॥॥ इनकी गतिहों नीके जानत सुरभी दूध देत त्योंत्योहोत अंध्यारो॥ भर दोहनी काल्‍्ह दुहि देहों तब ह॒बैहै रामदास प्रभुको पतियारो ॥२॥
Gori
Sunder syaam sujan siromani deh kahakahi
Part3-098
सुंदर स्याम सुजान सिरोमनि देह कहाकहि गारीजू ॥ बडे लोगके औगुन बरनत सकुच होत जिय भारी ॥ १॥ कोकरि सके पिता को निर्णय जाति पांति को जानें ॥ जिनके जिय जेसी बनि आवे तेसी भांति बखानें ॥२॥ माया कुटिल नटी तन चितयो कोन बडाईपाई ॥ उन चंचल सब जगत विगोयो जहां तहा भई हंसाई ॥|३॥ तुम पुनि प्रगट होई बारेंतें कोन भलाई कीनी ॥ मुक्तिवधू उत्तमजन लायक ले अधमनकों दीनी ॥४॥ वसि दस मास गर्भ माताके उनआसा करिजाये ॥ सोघर छांडि जीभ के लालच व्हे गये पूत पराये ॥५॥ बारेंहीतें गोकुल गोपिन के सूने ग्रह तुम डाटे ॥ है निसंक तहां पेठि रंकलों दधिके भाजन चाटे ॥६।॥| आपु कहाय बडेके ढोटा भातकृपन लों मांज्यो ॥ मान भंगपर दूजें जाचत नेंक संकोचन लाग्यो ॥७॥ लरिकाईतें गोपिन के तुम सूने भवन ढंढोरे ॥ जमुना नहात गोप कन्‍्यनके निपट निलज पटचोरे ॥८॥ बेनुबजाय विलास कियो बन बोली पराई नारी ॥ वेबातें मुनिराज सभामे व्हे निसंक विस्तारी ॥९%॥ सब कोऊ कहत नंद बाबा को घर भरच्चो रतन अमोले ॥ गरे गुंजा सिरमोर पखौबा गायन के संग डोले ॥१०॥ राज सभा को बेठन हारो कोन त्रियन संग नाचे ॥ अग्ज सहित राज मारण में कुबिजा देखत राचे || १ १॥ अपनी सहोद्रा आपुही छलकरि अर्जुन संग भजाई ॥ भोजन करि दासी सुत के घर जादों जाती लजाई ॥१२॥ लेले भजे राजन की कन्या यह धोंकोन भलाई ॥ सत्य भामाजु गोतमें व्याही उलटी चाल चलाई ॥|£१३॥ बहिन पिताकी सास कहाई नेकहु लाज न आई ॥ एते पर दीनी जु विधाता अखिल लोक ठकुराई ॥ मोहन वसीकरन चटचेटक जंत्रमंत्र सब जानें ॥ तातें भलेभले करिजाने भलेभले जममानें ॥१५॥ बरनों कहा यथा मति मेरी बेदह्दू पार न पावे ॥ दास गदाधर प्रभु की महिमा गावत हीं उरआवे ॥१६॥
Bilawal
Sakal kunwar gaukul key nikse khelan faag ..
Part3-328
सकल कुंवर गौकुल के निकसे खेलन फाग ॥ हरि हलधर मध्य नायक अंतर अति अनुराग ॥ १॥ ओलन बुका बंदन रोरी हरद जुलाल ॥| बाजत मधुरे मह॒वर मुरली ओर डफ ताल ॥२॥ कनक कलश केशर भरे कांवर किंकर कंध ॥ ओर कहाँ लग कहिये भाजन भरेहें सुगंध ॥३॥ हँसत हँसावत गावत छिरकत फिरत अबीर ॥ भीज लगे तन शोभित रंगरंग रंजित चीर ॥४॥ फूलन की कर गेंदुक करत परस्पर मार ॥ छूटत फेंट लटपटी बिखर परत घनसार ॥|५॥ कोलाहल ग्वालन को सुन गोपिका अपार ॥ टोलन टोलन निकसी कर सोल्हे शृंगार ॥ रूप माधुरी जिनकी कविपें बरणी नजाय ॥ तिन्डे सची रती रंभा पगहू परत लजाय ॥७॥ अति सरस स्वर गावत कोऊ झील कोऊ घोर ॥ तिन्हे सुन्यौ नहीं भावत बीना नाद कठोर ॥८॥ ललित गली गोकुल की होत विविध विध केल ॥ अगर सहित कुंकुम की चली धरणी पररेल ।|९|| गयो गुलाल गगन चढ भये सुर सदन सुरंग ॥ मानो खुर खेह उड़ी है सेना सजी अनंग ॥१०।॥ वन्यों वनिता वदनन पर कृष्णागर को पंक ॥ परिप्रण चंदन ते मानो च्वे च्वे चल्‍यो कलंक ॥१ १॥ छिरकत हरि ना ना रंण शोभित गोपिन गात ॥ मानो उमग्यो अंतरतें अंचल प्रेम चुचात ॥१२॥ बोले वाल बराती हमारे हरि को व्याह ॥ दुलहनि गोपा किशोरी ॥ मोहन सबको नाह ॥१ ३॥ यह सुन गोपी कोपी हलघर पकरे जाय ॥ अंजनदे दृण छाँडे मृगमद मुख लपटाय ॥१४॥ बहोर सिमिट सब सुंदरी घेरे मदन गोपाल ॥ कनकदली मंडलमें शोभित तरुण तमाल ॥१५॥ तब वृषभान किशोरी हरि भर लीने अंक ॥ कही न जात ता सुख की मानो निधि पाई रंक ॥१६॥ वरण सके को हरिके अगणित चरिज्न विचित्र ॥ जिहीं तिहीं भांत गदाधर रसना करों पवित्र ॥१७॥
Raayaso
Gopalke vedh karnakau keejai . gurubal tithi bal nakshatra baar
Part1-138
गोपालके वेध कर्णकौ कीजै । गुरुबल तिथि बल नक्षत्र बार बल शुभ घरी बिचार लीजै ॥१॥ गणिक निपुण द्वै चारि बैठिकें मततौ विचास्थौ नीकौ । मुहूरत जामें दोष रहित सुखसागर छ्वै जीकौ ॥२॥ दियौ मनोरथ सब सुखदाता चीते मनोरथ पाये । नारी सीमंतनी गीत गवाये दिये भूषण मन माये ॥३॥ जसुमति माय गोद ले बैठी लाल देखि मन हरखे । शुची माता के गोद बैठिके मूँदि श्रवन मन करखे ॥४॥ कनिक सूची ले श्रवन को दीनी बेधत बार न लागी । बाल रुदन जब करन लग्यौ रोहिनी मात लै भागी ॥५॥ चुचकारत चुंबत चौंपत हिय लेहुँ बलैयाँ तेरी | देत दान नैंदराय विप्रनकों कहे परमानेंद हेरी ॥
Saarang
Joe koee shree yamuna naam sambhaare, taako daras paras kouu karahin
NityaPad-014
जो कोई श्री यमुना नाम संभारे, ताको दरस परस कोऊ करहीं वाही को वे तारे ॥१॥ भक्त की महिमा बरनि न सके यम हा हा करि हारे, “चतुर्भुज' प्रभु गिरिधरन लालको नितप्रति वदन निहारे ॥२॥।
Bhairav
Nenk chitev chaleri laalan sakhee leey jugaye chitchor.. kabaki
NityaPad-140
नेंक चितेव चलेरी लालन सखी ले जुगए चितचोर।। कबकि द्वारेठाडी चितवत पियको मुसकक्‍्यानी मुखमोर ।।९॥ हो दधि मथन करत जो भवन में उचक चले ब्रज़राज किशोर ॥ लटपटी पाग केस विलुलित सखी ना जानों कहांतें उठि आये मेरे भोर || २॥| सबनिश जागे पग धरत डगमगे खसिखसि परत पीत पट छोर ॥ गोविंद प्रभुकी लखिन जात एसी व चतुर नागरी कोर ॥३॥
Aasawari
Milahin naagar nabal giridhar sujaankaun ..
Pustak1-358
मिलहिं नागर नबल गिरिधर सुजानकौं ॥ सुंदरी कनक तन साजि भूषन बसन कुंज के महल चल बेग तज मान कौ ।॥१॥ तरनि तनया तीर परम रमनीय बन बिहर संग करहिं बस सब गुन निधानकों ।। राग केदार सुन श्रवण बड़भागिनी निरख नटवर रसिक मुरली कल गानकौं ॥२॥ चत्रभुज दास प्रभु चतुर चूड़ामणि करत अभिलाष तुव अधर मधु पानकौं ॥ अर्पि सरबस कुसुम सेज सखी बैठ तू भेंट सुंदर सुभग अंगअंग सुठानकों ॥३॥
Kedaro
Arrie merrie maaee laraauun hularaaoon haal ree . aggar chandankau
Part1-109
अरी मेरी माई लराऊँ हुलराऊँ हाल री । अगर चंदनकौ पालना घड़ायौ बिच बिच हीरा मोत्ती लाल री ॥१॥ सखी सहेली मंगल गा4ें बाँधो बंदनवार री । क्ृष्णणीवन लछीरामके प्रभु माई वारोंगी मोतिन माल री ॥२॥
Devgandhar
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