top of page
Sheetkal Ke Pad
To get full expanded Kritan text click on any column of the kirtan row in below table.
Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Jayati bhanutnaya charanyugal vandey.. | NityaPad-012 | जयति भानुतनया चरणयुगल वंदे॥
जयति ब्रजराजनंदप्रिये सर्वदा देत आनंद ज्यों शरदचंदे ॥१॥
जयति सकलसुखकारिणी कृष्णमनहारिणी श्रीगोकुल निकट बहत मंदे ॥।
जाके तट निकट हरि रासमंडलरच्यो तहां नृत्यत ताता थेई थंदे ।२।।
जयति कलिंदगिरिनंदिनी देत आनंदिनी भक्तके हरत सब दुःख दंदे ॥
चित्तमें ध्यान धर मुदित ब्रजपति कहे ं जयति यमुने जयति नंदनंदे ॥३॥। | Ramkali |
Aaj sakhee raghunandan jaaye... | Part2-258 | आज सखी रघुनंदन जाये।॥
सुंदररूप नयनभर देखो गावत मंगलचार बधाये ॥१ ॥
परम कौतुहल नगर अयोध्या घरघर मोतिन चोक पुराये॥
द्वारद्वार मारग गरियारे तोरन कंचन कलश धराये ॥२ ॥
पूरण सकल सनातन कहीयत जे हरि बेद पुराननगाये ॥
महाभाग्य राजादशरथको जिहिंघर रघुपति जन्मही आये ॥३ ॥
ब्रह्मघोष मिल करत वेदध्वनि जयजय दुंदुभी देव बजाये ॥
गुणि गंधर्व चारण यश बोले भूवन च्र्दश 7 आनंद पाये ॥४ ॥
घान फूल फल चौवा चंदन बहु उपहार लोक ले आये॥
परमानंदप्रभु मन-मोहनकों ले कोसल्या गोद खिलाये ॥५ ॥ | Saarang |
Lalan uthaay deho merrie | NityaPad-272 | ललन उठाय देहो मेरी
गगरी ॥ बलबल जाऊं छबीले ढोटा ठाढे देत अचगरी ॥९॥ यमुनातीर अकेली
ठाढी दुसरो नाहिन कोऊ ॥ जासों अब कहों स्थामघन सुंदर संगबनाहि
नसोऊ ॥ २ ॥ नंदकुमार कहें नेक ठाढी रहे कछुक बात कर लीजे ॥ परमानंदप्रभु
संग मिले चल बातनके रसभीजे ॥३॥ | Saarang |
Bandey dharan girivar bhoop | radhikamukh kamal lampat mattamdhup | Part1-082 | बंदे धरन गिरिवर भूप | राधिकामुख कमल लंपट मत्तमधुप
स्वरूप ॥१॥ बंदे रसिक वर संगीत सुखनिधि । क्वनित वेणु अनूप ॥ कहि
कृष्णदास उदार उरपर लोलमाल अनूप ॥२॥ | Malav |
Navnagari pyaari tuu vrindaavanaki raani. biharin laadili | Part1-213 | नवनागरी प्यारी तू वृन्दावनकी रानी। बिहारिन लाड़िली
प्यारी तेरी कीरति जगत बखानी ॥चाल.॥ जगत में जगमग रह्यौ यश बिन
कृपा क्यों बूझही । अभिमान अंधा लोग करमठ ताहि कछुवन सूझहीं । करो कृपा
परम उदार ये मोहि बारबार सुहावहीं । बलिजाऊँ श्रीवृषभान नंदिनी सुजस तिहारौ
गावही ॥१॥ श्री नवनागरी प्यारी तेरी मोतिन माँग सवारी । बिहारन लाइ़ली
तैसी पहिरे झूमकसारी ॥चा.॥ सारी जो भीजि फुलेल में रही प्रगट बेनी
देखिये ॥ धसी सीस सुमेरतें मानों भ्रमर पाँति विसेखिये ॥ ललित कटि पर
लाल लहेंगा नीलकंचुकी कसितनी ! प्रथम जोबन जोत तनकी क्यों बने कवि पे
भनी ॥२॥ श्रीनवनागरी प्यारी तू चंद बदन मृगनयनी । बिहारन लाड़िली
तैसी हे चंपक तन पिकबैनी ॥चा.॥ बेनीजु पिक शुक नासिका सम अधरविंब
विलासनी । कनक कुंडल अलक झलकें कपोलमें मृदुहासिनी | ललित मुखमें
पान सोहै नासिका मुक्ता धरें | चिबुक साँवल बिंदुकी छबि कौन त्रिय सरवर
करें ॥ ३) श्रीनवनागरी प्यारी तेरी बेंदी जगमगताई । बिहारन लाडिली यह
छवि कबि पै वरनी न जाई ॥चा.॥ वरनी न यह छबि जाय कबिपै निरखि
श्याम सिहाइयौ । दसन दामिनी अधर राते लाल अति सुखपाइयों | गौर भाल
बिशाल लोचन वक्र अति छबि राजहीं । श्रोंह काम कमान मानों बाण मनमथ
साजहीं ॥४॥ श्रीनवनागरी प्यारी तेरी छोटी लर गज मोती । विहारन लाड़िली
तैसी बीच जंगाली पोती ॥चा.॥ पोति जो पुंज जड़ाव चौकी रही उरपर जगमगै।
अंस पर मखतूल फोंदा दृष्टि जिन गुरुजन लगै | बरा कंकन बाजू पोहोंची चूरी
चारु बिराजहीं | रतनजठित अमोल मुंदरि अंगुरिन छबि छाजहीं ॥५॥
श्रीनवनागरि प्यारी तेरे पग नूपुर झनकार । विहारन लाड़िली तैसी है मंथर चरन
बिहार ॥चा.॥ मंथर चरन बिहार यह गति राज हंसन अर्पही । जघन सघन
उरोज भारी देखि सिंध कटि डरपही । प्रथु नितंवनि किंकिनी सम निपटही नीवी
बनी । झबा झलकें देख दोऊ रीक्ि रहे साँवल धनी ॥॥६॥ श्रीनवनागरि प्यारी
तू पिय तन मुरि मुसिकानी ॥ बिहारनलाड़िली तब उन बंसी गिरत न
जानी ॥चा.॥ जानी न बंसी गिरत करतें पीत पट खस भू परयौ | रहे
इकटक चित्र जैसे पग न भूमीतें टसयौ ॥ झुकि जात कछुवन गातकी सुधि अंगअंग
शिथिल भये । परत जात सुजान सुंदर भुजा भरि भामिनि लये ॥७॥श्रीनवनागरी
प्यारी तेरे रस बसहैं जु कन्हाई । बिहारनलाड़िली लालन रहे अँगअंग लुभाई
॥चा.॥ अंगअंग लाल लुभाय राखे रसिक शिर मुकुट मनी । गुन रूपशील
सुहाग सुंदरि अरू त्रियान कवन गिनी ॥ व्रजराज नवलकिशोर के कोऊ और
चित्त न आवहीं । बलजाऊँ श्रीवृषभान नंदिनी तो हित वेणु बजावही ॥<)॥
श्रीनवनागरी प्यारी तू श्यासयनोहर बोली ॥ बिहारन लाड़िली प्यारी तू उठे चल
नवल किशोरी ॥|चा.॥ उठि चलिं नवल किशोरी राधे नवललाल बुलावहीं ॥
सुंदर श्याम सुजान सखीरी बारबार कहावहीं ॥ छाँड़ि मान सँभारी प्यारी कहाँलों
तोहि बुलावहीं । बलिजाऊँ श्रीवृषभान नंदिनी तो हित मोहि पठावहीं ॥९॥
श्रीनवनागरीप्यारी यश तुझारो मोहि भावै | बिहारन लाड़िली यह यश आपही
श्रीमुख गावै ॥चा.॥ गावैजु श्रीमुख सुयश तुहारो तुही तनमन रमरही । तुही
धन तूहि प्रान जीवन सपथ दे मोसों कही । करी विविध बिहार भामिनि एतो गहरु
न कीजिये । बलि विष्णुदास विचित्र जोरी लोचनन सुख दीजिये ॥१०॥
# राग धनाश्री ऋ नवलनागरी सुब गुन आगरी ॥सौभगसीवा॥
हरिभुजग्रीवा॥ गौरश्याम छबि पावती । श्याम छबीले मन भावती ॥ध्रु.॥
शिशुतामें हे सखीरी जोबन कियौ प्रवेश | कहा कहूँ छबिरूपकी नखशिख परमसुदेश
॥१॥ ब्रजपति केलि सरोवरी शैशव जल भरपूर । प्रकटित कुच उरस्थली
शोभित जोवन सूर ॥२॥ छूटे केश मज़न समें देखि विरुद्धें अहि भोर । मोर
कुह्ु निस मेरुतें उत्तरि चले उहिं ओर ॥३॥ कंचन तन मजजन कियौ केसर हेमु
कलाय । मानहु चंदन तरोवरी नाग रहे लपटाय ॥४॥ त्रिवेणी नख खोलही
छबि बनी यह भाँत । मानों कमल मुकुलित किये बाल भरृंगनकी पाँत ॥५॥
सीस सचिकन श्याम कच दियौ श्रीमंत समार | पसरी किरन पतंगतें भई है द्विधा
त्तमहार ॥६॥ खितुला सुभग जड़ावके मणिमुक्ता छबि देत | उदय तमहार ॥६॥ खितुला सुभग जड़ावके मणिमुक्ता छवि देत | उदय भयौ घन
मध्य तें शशी मानों नक्षत्र समेत ॥७॥ केसर आड़ लिलाट है बिच सिंदुरकौ
बिंदु । चक्र तरौना नयन मृग रथ वैठ्यौ मानो इंदु ॥८॥ नवनन ऊपर हे
सखीरी यों राजत भरूभृंग | जूआ बनावत चंद्रमा चपल होत सारंग ॥९॥ चंचल
नयन विशालहै मधि झलकें घनश्याम। अंबुज दल मुखमानों दिये लघुलघु शालिग्राम
॥१ ०॥ चंपकलीसी नासिका राजत अमल उद्योस | ऊपर मुकता ज्यों लसे
परनौ भोर कण ओस ॥११॥ बेसर में मुक्तामनि दे नासा ब्रजनारि । गुरु
भुगु शनि बिच भीम है शशि समेत ग्रह चारि ॥१२॥ मुक्ता आप बिकायकें
उर बिच छिद्र कराय | अधरामृत हित तप करे अधोमुख ऊर्ध्व पाय ॥१३॥
गुंजा जैसी छबि बनी मुक्ता अति बड़ भाग | नयननकी लियें श्यामता अधरनकौ
अनुराग ॥१४॥ सुंदर सुभग कपोल हैं मुख तमोल भरपूर । कंचन संपुट दै-
पला मध्य भरथौ सिंदूर ॥१५॥ स्वेत कांति दशनावली रही तंबोल रंग भीजि।
बदन शशिमें बोये हैं मधि अनारके बीज ॥१६॥ अधरनकी छबि कहा कहूँ
सदा श्याम अनुकूल । बिंव प्रवाली राजहीं मुसकनि बरषत फूल ॥१७॥
चिबुक दिठीना जब दियौ मो मन धोखें जात | निकसत अलि सुत कंजतें मनों
भये परभात ॥१८॥ देख बदनकौ रूप सखीरी मोहन रहे लुभाय | इकटक
रहे चकोर ज्यों दृष्टि न इत उत जाय ॥ ९॥ यह मारग बन बाटिका निकसत
सहज सुभाय । मधुप कमल बन छाँडिकें संग रहे लपटाय !॥२०॥ तोहे श्याम
सोहें सखीरी बढ़ी निरंतर प्रीति । आप रहे आधीन है पाये हैं हरि जीति ॥२१॥
जहीं जहीं तू पाय धर तहीं तहीं मन साथ । तू हीं तन मन श्याम के चितवत्त तेरे
हाथ ॥२२॥ धन्य धन्य मात प्रभावती धन्य पिता वृषभान । जहँ कुल जन्मी
राधिका सुंदर चतुर सुजान ॥२३॥ मदनमोहन मोहे सखीरी अति प्रवीन
नैंदलाल। सूरदास गावे सदा हो कीरत विषद विशाल ॥२४॥ | Bilawal |
Apane curr chandan sakhee piya anga lagawat .. | NityaPad-302 | अपने कर चंदन सखी पिय अंग लगावत ॥
हरस्ब्रित बदन सदन अपने निज कर बिंजनी ढुरावत॥।१॥
शीतल भोग राग गुन कहि कहि कर मनुहार लिवाबत। द्वारकेस'
प्रभु रिप्ल विवश भये नेह नई उपजावत ॥ २॥ | Kanharo |
Nrityamaan rasrang kaanh sanga ghoshnar gidgidtatheithei | Part1-345 | नृत्यमान रासरंग कान्ह संग घोषनार गिडगिडततथेईथेई
नवबिलासनी ॥ बदनजोति मोहत नभ सघन चंद रूपरस बामबाहु नाथ अँस
ईषद हासनी ॥१॥ बीच बीच सुरतकेलि जानों तमाल कनकबेलि अरुझ रही
अंगअंग बिगतबासनी ॥ कृष्णदास प्रभु गिरिधर अधरामृत रंगराची भुवि बिलास
मत्त मदन गर्वनासिनी ॥२॥ | Kanharo |
Jaba jaanyon vraj.. utar gaee sub garya khumari ..1.. | Part2-090 | जब जान्यों ब्रज॥ उतर गई सब गर्य खुमारी ॥१॥
व्याकुल भयो डर्यों जिय भारी॥ अनजानें कीनी अधिकारी ॥२ ॥
बैठ रहेतें नहि बनि आबे॥ ऐसो को अब मोहि बचावे ॥३ ॥
वारवार यह कहि पछितावे। जाओ शरण विलंब नहि भावे ॥४ ॥
जाय परो चरणन शिरधारो ॥ के मारो के मोहि उगारो ॥५ ॥
अमरन कह्ो करो असवारी॥ ऐराबतकों लेहु हंकारी ॥६ ॥
सूर शरण सुरपति चलल्यो धाई ॥ लिये अमरंगण संग लगाई ॥७ ॥ | Bilawal |
Dekho dadhisuttamen dadhijaat | aeka achambhau suniye sajani pipumein | Part1-158 | देखो दधिसुत्तमें दधिजात | एक अचंभौ सुनिए सजनी पिपुमें
रिपुजु समात ॥१॥ त्ापर कीर कीर पर पंकज पंकज के द्वै पात । सुंदर बदन
बिलोक श्यामकौ चिते नंद मुसिकात ॥२॥ अति अचरज भयौ पशुपालैं फूले
अंग न मात । ऐसौ ध्यान धै जो हरिकौ तिनहिं सूर बलिजात ॥३॥ | Jetashri |
Bhor bhayo jagoho lalana kahaa tum ajahu rahey hoe soy .. | NityaPad-023 | भोर भयो जागोहो ललना कहा तुम अजहू रहे हो सोय ॥
पीओ धार अपनी धोरीकी जासों देह बल होय ।॥।१॥ बेनी गुहूं देठं दृण अंजन
मीसबिंदुका मुख धोय ॥! हसत वदन सुख सदन निहानों नान्ही नान््ही द तियां
दोय ॥२॥ टेरत ग्वाल बाल खेलनकों गोरंभनहूं होय ।| द्रजजन सब ठाडी मुख
देखत अति आतुर सब कोय ॥३॥ उठ बैठे लए गोद यशोदा सुंदर सुत तिहं
लोय॥ रसिक प्रीतम लागे गरें जननीपें मांगत रोटी रोय ॥४॥। | Ramkali |
Hoe hoe horry kii kaddi, nava dulhin kaunani | Part3-226 | हो हो होरी कि कद्डि, नव दुलहिन कौननि
में भवननि, मै दुरि-दुरि हो || निपट सुसील झील की टेरनि, गाबति हँसति
दै तारी मुरि-मुरि हो ॥१॥ सब तैं सरस देखिये सुंदरि, निरखि स्वरूप,
परति रतिपति झुरि-झुरि हो ॥ “कृष्ण जीबन लछीराम'” के प्रभु आवति
रंग भीने, अति दुरि-दुरि हो ॥२॥ | Kafi |
Praatasmein srimukh dekhanko sevakjan thaade singhdwar . jaya | NityaPad-008 | प्रातसमें श्रीमुख देखनको सेवकजन ठाडे सिंघद्वार । जय
जय जय श्रीवल्लभनंदन दरशन दीजे परमउदार ॥ १॥ सौभगसीमा सुंदरता शोभा
मेघगंभीर गिरा मृदु धार ॥ निरखत नयनन मोह्यो मनन््मथ श्रवणन सुनत वचन
अपार ॥२॥ नयनमंगल श्रवणन मंगल यश पुरुषोत्तमलीला अवतार ॥ जन
भगवान पिय कुंजविहारी अगणितमहिमा अगम अपार ॥। ३॥ | Bibhaas |
Page 1 of 1
bottom of page
