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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
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Rattan jatit palka parr podhe keli karat douu milat paraspar ... | NityaPad-129 | रतन जटित पलका पर पोढे केलि करत दोऊ मिलत परस्पर ॥।
पर गये परदा ललित महल में जगमग होत अंगीठी ढींग धरि ॥१॥ रति रसकेल
बविलास हरिरस अधरामृत पीवत हे दृग भारि ।। मदनमोहन गिरधर क्रीडा विनोद
पुदित परस्पर भवर चहेल करि ॥२॥॥ | Bihaag |
Soh divaay boojhatahi mohansanchi kaho mosuun yeh baat .. chhooti | NityaPad-150 | सोह दिवाय बूझतही मोहनसांची कहो मोसूं यह बात ॥ छूटी
अलकबदन परराजत कछूईडत जुंभात ॥१॥ अंजन रेख अधरपर शोभित भूषण
वसनसिधिल सबगात || उरज चिन्ह उरपरशोभा देखियत दूरकरो अब
हियोपिराता।२॥ सुनसुन श्रवणन वचन हमारे झूठी कहत नतुमसों यहबात ॥ जाही
केतुमरंगरगेहो जासो अंगअंग लपटात ॥३॥ कहिये कहाकहत नहिं आवत जैये
तहांजहां जागेरात॥ सूरदासप्रभु निपट निलज तुम एतेपर ठाडे मुसकात ॥।४॥ | Todi |
Sakhiri mohi haridarshan kii chaay .. sambaresonpreeti | NityaPad-088 | सखीरी मोहि हरिदरशन की चाय ॥ सांबरेसोंप्रीत ि
बाढीलाखलोगरिसाय ॥।१॥
स्यामसुंदरलोललोचन देख मन ललचाय |
सूरहरिके रंगराची सीसरहा केंजाय ॥।२।। | Ramkali |
Ghuturuvan chalat shyam manee aangan maat pitaa douu dekhat | Part1-157 | घुटुरुवन चलत श्याम मनि आँगन मात पिता दोऊ देखत
री । कबुँक किलकिलात मुख हेरत कबहूँ जननी मुख पेख तरी ॥१॥ लटकत
लटकत ललित भाल पर काजर बिंदु भुव ऊपर । यह शोभा नयनन देखे जे बढ़हि
उपमा तिहुँ भूपर ॥२॥ कबहुँक दौर घुटुरूवनि टेकत गिरत उठत फिरि धावता
इतते नंद बुलाय लेत हैं उतते जननी बुलावत ॥३॥ दंपति हाउ करत आपुस
में श्याम खिलौना कीन्हौ । सूरदास प्रभु ब्रह्म सनातन सुत हित करि दोऊ
लीन्हों ॥४॥ | Aasawari |
Srirag mein kaannhh murali bajaavai | sapt sur-bhed avadhar taana | Part1-293 | श्रीराग में कान््ह मुरली बजावै | सप्त सुर-भेद अवधर तान
विकट सो गति मधुर धरि मनस्तिज-मोद उपजावै ॥| बजत नूपुर धरत चरन
अबनी, चतुर ताल चर्चरी सों ममनसि मन लावे | छीत-स्वामी' नवल
लाल गिरिवरधरन गोप-बालक-संग बन तें आबै ॥ | Shri |
Vraj jubatin nagari radha pai, milli mohan | Part3-315 | ब्रज जुबतीं नागरि राधा पै, मिलि मोहन
ले आईं ॥ लोचन आंजि, भाल बेंदी दे, पुनि-पुनि पाई पराईं ॥ बेनी गूँथि,
मांग सिर पारी, बधू-बधू कहि गाई। प्यारी हँसति देखि मोहन-मुख, जुवतीं
बने बनाई ॥ स्याम अंग कुसुंभी नइ सारी, अपनें कर पहिराई | कोऊ
भुज गहति, कहति कछु कोऊ, कोऊ गहि चिबुक उठाई ॥ एक अधर गहि
सुभग अंगुरियनि, बोलत नहीं कन्हाई ॥ नीलांबर गहि खूंट चूनरी, हॉँसि-
हँसि गाँठि जुराई ॥ जुबती हँसति देतिं कर तारी, भई स्याम ! मन भाई ॥
कनक-कलस अरगजा घोरि कै, हरिके सिर ढरकाई ॥ नंद सुनत, हँस
महरि पठाई, जसुमति धाई आई ॥ पट-मेवा दे श्याम छुड़ायौो, सूरदास
बलि जाई ॥ | Shri Hatee |
Tuu naan maanan deit aliri munn tero | NityaPad-324 | तू न मानन देत आलीरी मन तेरो
मानवेकों करत ॥ पियकी आरतदेख मेरेजिय दयाहोत तेरी दृष्टि देखदेख
डरत।॥।१॥ मोलों कहत कहा मेरो नदोष कछू निपटहटीली धाथ क्यों न अंकभरत॥
नंददासप्रभु दूतीके वचनसुन ऐसे अंगढरयो जैसे आंचके लगेतें राँग ढरत । । २॥ | Kedaro |
Navkishore navkishori bunny haye bichitra jory shobha sindhu | Part1-357 | नवकिशोर नवकिशोरी बनी है बिचित्र जोरी शोभा सिंधु
प्रदनमोहन रूपरास भामिनी ॥ राजत तन गौर एयाम प्यारी पिय भाग बाम
नवघन गिरिधरन अंगअंग मानों दामिनी ॥१॥ पेहैरें पट पीयरो भूषण भूषित
मनोहर अंग गजवर गोपाल नागर नागरी गजगामिनी ॥ दास चत्रभुज दंपति
उपमाकों नाहि कोउ काम मूरति कमल लोचन मृगनयनी कामिनी ॥२॥ | Bihagaro |
Srigiridharlal kii baanik oopar aaj sakhee | Part3-022 | श्रीगिरिधरलाल की बानिक ऊपर आज सखी
तृन टूटेरी || चोबा चंदन अगर कुंकुमा पिचकाइन रंगछूटेरी ॥१॥ लालके
नैेन रणमगे देखियत अंगअनंगन लूटेरी ॥ कृष्णदास धनि धन्य राधिका
अधर सुधारस घाूँटेरी ॥२॥ | Basant |
Sakhee vraj gokul mangalchar .. jasumati poot saanvaro janamyi | Part1-016 | सखी ब्रज गोकुल मंगलचार ॥ जसुमति पूत सांवरो जनम्यी
ब्रजजन प्राण आधार ॥१॥ नंदराय प्रमुदित नरनारी दथिं बरखत सुखसार ॥
ब्रजाधीश प्रभु गावत बहुधुनि बेद न पावत पार ॥२॥ | Devgandhar |
Avsar bair bair nahin aave... tech | | NityaPad-371 | अवसर बेर बेर नहिं आवे।॥ टेक |
जो जाने तो करले भलाई जन्म जन्म सुख पावे ॥१॥
सुतदारा अंजलीको पानी, घटत वेर नहिं लावे छुटय्यो
तन धन कोन कामको, कृपण कहाजु कहावे ॥ २।।
जाको मन लाग्यो श्रीकृष्णसुं ताकूं अन्य न भावे।
सूरदास प्रभु आनंद सागर, प्रेम धरी क्यों न गावे ॥३॥ | Bihaag |
Saanche bhaye aae parbhaat | nand-nandan ! rajani kahaan jaage ? | NityaPad-151 | साँचे भए आए परभात | नंद-नंदन ! रजनी कहां जागे ?
कहिये साँवलगात ! पीक कपोलनि लगी तुम्हारें, जावक भाल लखात।
उर हि विराजित बिन-गुन माला, मो तन लखि सकुचात |
भली करी, अब तहीं पगु धारौ जहाँ बिताई रात। 'छीत-स्वामी' गिरिधर ! काहे को झूठीं सौहें खात ॥। | Devgandhar |
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