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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Vasant banaai chully vraj sundari rasik raae giridhar
Part3-362
वसंत बनाई चली ब्रज सुंदरि रसिक राए गिरिधर पिय पास ॥ अँग अँग बेलि फूलि मृग नेंनी कुच उतंग मनों कमल विकास ॥१॥ कोक कला बिध कुँज सदन मैं गिरिवरधर सँग किये बिलास || कुसम पर्यक अँक भरि पौढे निरखति बलि “परमानँद' दास ॥२॥
Basant
Radha maadhau khelain horry .. ita vrajraj laadilo
Part3-268
राधा माधौ खेलैं होरी ॥ इत ब्रजराज लाड़िलो राजत, उत वृषभानु किसोरी ॥९॥ एकन के कर अगर, कुँमकुमा, एकन केसर घोरी ॥ छिरकति रतन-जटित-पिचकाई, पिय मुख पौंछत खेलत गोरी ॥२॥ इक गाबै, इक मृदंग बजावैं, एकु रबाब झाँझन की जोरी ॥ सुख सागर, आगर, ब्रिंदाबन, बरन वनस्पति मोरी ॥३॥ जित तित तें ग्वालनि उठि धाँई, मुख माँडत लै रोरी ॥ “कृष्ण जीबन लछीराम' के प्रभु प्यारे चिरजीयौ भूतल यह जोरी ॥४॥
Sarang
Hoe toson abb kahaa kahon aliri konverki bulaavatahi
NityaPad-121
हो तोसों अब कहा कहों आलीरी कोनवेरकी बुलावतही मोहि। नवलनागर नवलकुंज कबके निस जागतहें प्रीतिकीतोवरही नकछू इतनी सकुच नाहिन तोहि ॥ १॥ कहा आयुस होतहै मोकों तुमतों सुहागके भर आवेश वसोई ॥ मोहि कहा तरोई प्राणप्रीतम सुखपावें सोईतो करोरीआली गोविंद प्रभु अपने कंठराखति पोहि ॥ २॥
Nayaki
Gwalini aaptandekh merey laltandekhari bheet jyonhoy tochitraabarekhari ..bhru...
NityaPad-192
ग्वालिनी आपतनदेख मेरे लालतनदेखरी भीत ज्योंहोय तोचित्रअबरेखरी ॥भ्रु.॥ मेरोललनहै पांचही बरसको रोयकें अजहू पयपानमाँगें तूतोअतिढीठ जोवनमत्तग्वालिनी फिरतइतरात गोपालआगें | १॥| मेरे ललनकी तनकसीअंगुरि ये बडेनखनकेचिन्ह तेरें । मष्टकर हँसेंगेलोग अगवारको यह भुजाकहांपाई स्याममेरे || २॥ झुकवलीग्वालिननयनन हँसी नागरी उराहनेकेमिस अधिकप्रीतिबाढी ॥ एकसुन सूरसर्वस्वहरयो सांवरे. अनउत्तर महरिकेद्वारठाढी ॥३॥
Bilawal
Nandi suraten barsaanemein dooni bantat badhaai juu | bhaye manorath
Part1-181
नंदी सुरतें बरसानेमें दूनी बंटत बधाई जू | भये मनोरथ सबके मनके कीरत कन्या जाई जू ॥१॥ परम उदार नंदजूकी रानी हंसुली झगुली लाई जू । बाठ्यों है मोद गोद मैयाकी किलकत कुंवर कन्हाई जू ॥२॥ कीरतिरानी और नंदरानी दोऊ समधन बतराई जू | यह सगाईकी बात चलाई हित अनूप बलि जाई जू ॥३॥
Aasawari
Bansibatke nikat hari raas rachyau haye morr mukut arr odhi
Part1-348
बंसीबटके निकट हरि रास रच्यौ है मोर मुकुट अर ओढ़ि पीतपट ॥ श्रीबृंदावन कुंज सघन बन सुभग पुलिन ओर यमुनाके तट ॥१॥ आलस भरे उनींदे दोउ जन श्रीराधाजू ओर नागरनट ॥ व्यास रसिक तन मन धन फूले लेत बलैयाँ कर अँगुरिन चट ॥२॥
Adano
Dekho vrindavan koo jasvitan .. chhaayo sub parr
Part3-029
देखो वृंदावन को जसवितान ॥ छायो सब पर वरतनपुरान ॥ ध्र०॥ जाकों वरनि वेद रहे मोनधारि ॥ करें ध्यान मान अभिमान टार ॥ ताकों गहत सकल मिलि ब्रजकी नारि ॥ मुख मांडिदेत होरी की गारि ॥ १॥ जाकों रिझवतहें सब नाचिगाय ॥ करें वेद युक्ति नाना उपाय ॥ ताके आंजतलोचन दृगनमाय ॥ छांडेनचाय हाहा खवाय ॥२॥ जाके भजत नामतजि कामकेत ॥ भव सागर को वर जानिसेत ॥ दुःख नास करत सुख कोनिकेत ॥ ताकों हँसिहँसिहँसि ग्वालिन गुलचादेत ॥३॥ जाकेक्स करें सनिसव प्रमान ॥ डरें लोकपाल सब देतमान ॥ सो तो राधावस करे मुरलीगान ॥ सूरदास प्रभु कंतकान्ह ॥४॥
Basant
Rangan rung hoe hoe horry khelein ladillo vrajraj
Part3-344
रंगन रंग हो हो होरी खेलें लाडिलो ब्रजराज को ॥ सांवरे गात कमल दल लोचन नायक प्रेम समाज को ॥१॥ प्रथमहीं ऋतु वसंत बिलसे हुलसे होरी डांडो रोप्थो ॥ मानों फाग प्राण जीवन धन आनंदित सब ब्रज ओप्यो ॥२॥ मृगमद मलय कपूर अगर केसर ब्रजपति बहु घोर धरे ॥ सरस सुगंध संवार संग दीये रंगन कंचन कलश भरे ॥३॥ प्रेम भरी खिलवारन के हित सुख के साज सिंगार कियें ॥ भाग्य अपार जसोदा मैया बार-बार जल वार पियें ॥४॥ भई हे रंगीली भीर द्वारन प्रीतम दरशन कारनें ॥ अब बन ठन निकसे मंदिर तें कोटि मदन कीये वारनें ॥५॥ फेंट भराय लई जननीपें आज्ञा लई ब्रज ईंशतें ॥ नंदराय तब रत्न पेंच रचि बांध्यो गिरिधर शीशतें ॥६॥ तापर मोर चंद्रका सोहे ग्रीव ढरन लहकात हैं | मदन जीत को बानो मानों रूप ध्वजा फहरात हें ॥७॥ तेसेई सखा संग रंग भीने हरख परस्पर मन मोहे ॥ वरण वरण युवतिन के कमल मानों अंबर दिन मणि संग सोह़े ॥८॥ आनंद भर बाजे बाजत हैं नाचन मधु मंगल रंग किये ॥ हरि की हसन दशनन की किरण नयनन की ढरन मन मोहि लिये ॥९॥ कोऊ द्वारे कोई चढ अटा कोऊ खिरकिन वदन सुहाये ॥ गोकुल चंद्रमा देखन कों मानो चंद्र विमानन चढ चढ आये ॥१०|| अबीर गुलाल उडाय चले देखत जेसें सब कोऊ हरखे ॥ छिरकत फिरत छेल नवरंगी कहा कहिये रस नव घन बरखे ॥११॥ राधा दृष्टि परत नहीं मोहन निरख नयन मन घूमें हों ॥ सनन्‍्मुख ह्लै पिय कल्पतरूवर महाभाग्य रस फल झूमेहो ॥१२॥ प्रमदा गण मणि स्यामा रसिक शिरोमणि सों खेलन आई ॥ दुद्दंदिश शोभा उमग रंग मच्यो ॥ मान वेणु ध्वनि लाई ॥१३॥ नयनन बेनन खेलत वधू गेंदुक नवलासिन मार मची ॥ कमल नयन कर ले पिचकाई मृग नयनन सेनन भ्रृंड नची ॥ १ ४॥ छिरकी छेल छबीली भांतन मन हरणी जोबन बारी || सब अंग छींट बनी पिय वसनन फुलीं छबि फुलवारीं ॥१५॥ पहोप पराण उडाय दाव रचि अछन अछन नेरे आंई ॥ दौर दामिनीं घन घेरच्ो पिय बात बनीं सब मन भाई ॥६६॥ कोऊ मुख मांडत दे गल बइयाँ कोऊ पोंछत आछी छबि सों | अलकन आ्रोहन मूल रंग रह्यो शोभा कह्िय न जाय कबि सो ॥१७॥ कोऊ रचि रुचि पान खवावत पुलकित अधरन परस कियें ॥ कोऊ भुज गह्डि डहकाय फगुवा माँगत पिय नयनन चैन दिये ॥१८॥ राधा नामरि श्याम सुंदर पर प्रीत उमंग केसर ढोरी ॥ महा मनोहर ताकों राजा अभिषेक किये कहें हो हो होरी ॥१९॥ सरस्वती सहित महामुनि मोहे यह शोभा दंपति हेरे ॥ कह्टि भगवान छित रामराय प्रभु हँस चितवन वसी मन मेरे ॥२०॥
Bihaag
Aajkoshungar subhagsanware gopaljuko kahat nabanaavabe dekhenhin banaaven ..
NityaPad-156
आजकोशूंगार सुभगसांवरे गोपालजूको कहत नबनआवबे देखेंहीं बनआवें ॥ भूषनवसनभांतिभांति अंग अंग छबि कहीनजात लटपटी सुदेशपाग चित्तकोचुरावें ॥१॥ मकरकुंडल तिलकभाल कस्तूरी अतिरसाल चितबनलोचनविशाल. कोटिकामलजावें ॥ कंठसरी बनमाल फ़ेटाकटिछोरनछबि निरखतत्रिभुवनत्रिया धीरनमनलावें।। २॥ मेरेसंगचलनिहार ठाढ़ेहरिकुंजद्धार हितकीचितबातकहूं जोतेरेजियभावें ॥ चतुर्भुजप्रभु गिरिधर नखसिखसुंदरसुजान बडभागिनताहिगिनो सुजातहीलपटावें ॥। ३।।
Devgandhar
Sheetal
NityaPad-248
शीतल उसीर गृह कुंज में ता मध्य श्याम श्याभा सखीजन । जारी झरोखा संवार कोउ ठाडी फूल्यो हे सुवास सुधावन ॥१॥ कमल बरन दोउ अरगजा आंग सोहे झीनी घाग सारी श्याम छबि पाई अलकन । व्रजाधीश प्रभु केलि जल यंत्र फूही जल बरखत मानों सुर कुसुमन ॥२॥
Saarang
Paradesani naari akeli .. binn raghunath aur naheen kouu maat
Part1-297
परदेसनि नारि अकेली ॥ बिन रघुनाथ और नहीं कोऊ मात पिता न सहेली ॥१॥ रावण रूप धरतच्नौं तपसीकौ कितमें भिक्षा मेली ॥। आज्ञा नहीं हीन मति मेरी रामरेख पद पेली ॥२॥ विरह ताप तन अधिक जरावत जैसें द्रम बन बेली ॥ सूरदास प्रभु बेगि न मिलिहें प्राण जात हैं खेली ॥॥३॥
Maru
Tihari dhaadhi srilachamanraj. tihaare poot bhaye
Part2-331
तिहारी ढाढी श्रीलछमनराज। तिहारे पूत भये पुरुषोत्तम सुफल भये मेरे काज ॥१ ॥ तिहारे पितर भये जे पहेले महापुरुष अबतार | तिलंग तिलक ट्विज जग्यनारायन किने जग्य अपार ॥२ ॥ ताके हा भये गंगाधर कौने बहुत सोमयाग | तिनके गनपति सोमजग्य करि वे | बड़े सोहाग ॥३ ॥ ताके श्रीवललभ अम्निहोत्री तब पितु अति कृपाल। तिहारे पूत आचारज वलल्‍लभ बदन अनल बीजपाल ॥४॥ दैवी जीव उद्धारन कारन मायावाद निवार। श्री भागवत स्वरूप बताये सेवा पृष्टि प्रकार ॥५ ॥ इनके पूत होयके दोऊ श्रीहलधर गोपकुमार। गोपीनाथ विट्ठल पुरुषोत्तम तिहि गोकुल उजियार ॥६ ॥ श्री विड्डल को सात होई सुत ते सब आप समान। सुतके युत नाती पाँति सब दीपत दीप प्रमान ॥७ ॥ नरनारी जे सरन आये हैं ते सब किये सनाथ । नाम सुनाये भक्ति देके पकरे दृढ़ करि हाथ ॥८ ॥ तब सुतके गुन रूप बखाने तोहु न आवबे पार। गोकुलपति मुख्य व्है वहनि वपु आकृति सीतल सार ॥९ ॥ हों ढाढी तिहारे घरको तब सुत कौरत करों गान। पर्यो रहूँ हरिवदन विलोकुं मागूं न भिच्छा आन ॥१० ॥ तुम हो परम उदार दानेश्वर हों मांगु सो दीजो। ढाढिन मेरी इनकी चेरी मोहे चेरो करि लीजो ॥॥९१ ॥ निसदिन भक्ति करों तव सुतकी इतनी पूजहु आस | जनम जनम नित लीला निरखूं बलि-बलि वलल्‍लभदास ॥१२ |
Maru
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