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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Neh lagyo mero syaam sundarason .. tech .. aayo
Part3-073
नेह लग्यो मेरो स्याम सुंदरसों ॥ टेक ॥ आयो बसंत सबी बन फूले खेतन फूलीहै सरसों ॥ में पीरी पियाके बिरह सें निकसत प्राण अधरसों ॥ कहो जाय बंसीधर सो ॥१॥ फागुन में बहोरी खेलत हैं अपनेअपने बरसों ॥ पियके वियोण जोगन न्है निकरी धूर उडाकत करसों ॥ चली मथुरा की डगर सो ॥२॥ ऊधो जाय द्वारका में कहियो इतनी अरज मेरी हरि सो ॥ बिरह व्यथा से जियरा डरतहें जबतें गये हरि घरसों ॥ दरस देखन कोडों तरसों ॥ ३॥| सूरदास मेरी इतनी अरज है कृपासिंधु गिरिधरसों ॥| गहेरी नदीयां नाव पुरानी अबकें ऊबारो सागरसों ॥ अरज मेरी राधाबरसों ॥४७॥
Kafi
Srigovardhan kii sikhar charupar phooli navmadhuri
Part3-025
श्रीगोवर्धन की सिखर चारूपर फूली नवमाधुरी जाई ॥ मुकलित फलदल सघन मंजुरी सुमन सुसोभा बल्लेतभाई ॥१॥ कुसमित कुंज पुंज द्वुमवेली निर्झर झरत अनेक ठांई ॥| छीतस्वामि ब्रजजुबति जूथमें विहरत हैं गोकुलके राई ॥२॥
Basant
Sakhee aaj kahaa kaho tava roopaki nikai .. nakhsikhso
NityaPad-116
सखी आज कहा कहो तव रूपकी निकाई ॥ नखसिखसो अंग अंग लालगिरिधरन हित रचिपचि बिरंचि अद्भुतबनाई ॥॥१।॥| चाल अतिमराल जंघ कदलीखंभ कटिसिंघ गौरतन सुभग सींबा | उरज श्रीफलपक्व अलककेकी छटा बचन पिक मोहन कपोत ग्रीवा ॥२॥ तरल युगलोचन नील नलिन श्रीमोचन चिबरुक स्थामलबिंदु चारू लसे ॥ श्रवण तार्टंक हाटक रत्नखचितसो मधुछबि शोभित कपोलवसे ॥|३॥ अधरबंधूक थ्ुतिकुंद दशनावली ललितवर नासिका तिल प्रसूनबने ॥ निरख मुखचंद्रमा रवि संभ्रम चितचलत ततक्षण छबिकोकनदबने ॥।४॥ सकल श्रीसिंधु यह कहा भग वरणिये कोटिमुख जीभ परमित न पावे ॥ दासकुमनस्वामिनीको सुयश अंतरंग सहचरी मुदित गावे ॥५॥।
Kalyan
Tuu koo haye, houn vrajrajkumar, kahaa kahatahau, daan mogat,
Part1-258
तू को है, हों ब्रजराजकुमार, कहा कहतहौ, दान मॉगत, काहेकौ, तेरे मोरसकौ ।। कबतें लागत, जबतें तू दै, यामें कहा सुख, तेरे दरसको ॥१॥ यह न भली, भली सोई कहौ, परस न कर, करूँ रस बसको ॥ रसिकपग्रीतम पिय बचन चातुरी आतुरी. करि लीनी भावत अंग परसकौ ॥२॥
Kanharo
Jaagiye vrazarajkunwar kamal kosh phoole .. kumudini jiya
NityaPad-024
जागिये व्रज़राजकुंवर कमल कोश फूले ॥ कुमुदिनी जिय सकुच रही भूृंगलता झूले ॥९॥ तमचर खग करत रोर बोलत बनराई ॥ रांभत गौमधुर नाद वछ चपलताई ।।२॥ रवि प्रकाश विधु मलीन गावत ब्रजनारी ॥ सूर श्रीगोपाल उठे परम मंगलकारी ॥। ३॥।
Bilawal
Raajat hein vrishbhan kishori .. vraj key aangan
Part3-247
राजत हें वृषभान किशोरी ॥ ब्रज के आंगन में खेलत पियसों ऋतु वसंत के आगम होरी ॥१॥ ताल मृदंग वेणु चंग बाजे राजत सरस बांसुरी ध्वनि थोरी | अगरजबवाद कुंकुमा केसर छिरकत स्याम राधिका गोरी ॥२॥ जब हीरबक पीतपट पकरत यह रसरसिकन देत झकझोरी ॥ परमानंद चरण रजबंदित राधा स्याम बनी हें जोरी ॥३॥
Sarang
Aaj raabalmein jaijaykar . pragat bhaee vrishbhan gofaken sriradha
Part1-185
आज राबलमें जयजयकार । प्रगट भई वृषभान गोफकें श्रीराधा अवतार ॥१॥ भूषण वसन शोभित अँग अंगन कंठ मनोहर हार | हाठक तन बदनारविंद छबि दुहुँ दिशि भयौ उजियार ॥२॥ सब सखियन मिलि दरें आईं गावत मंगलचार । निर्मित जोरी कुँवर मोहनकी रामदास बलिहार ॥३॥
Saarang
Jalakon gaee sughat neh bhar laaee parihai chatpati darshaki ita mohangas uta
NityaPad-271
जलकों गई सुघट नेह भर लाई परीहै चटपटी दरशकी इत मोहनगास उत गुरुजनत्रास चित्रलिखी ठाड़ी नामधरत सखी परसकी ।॥॥१॥ टूटे हार फाटेचीर नयनन बहत नीर पनघट भई भीर सुधि न कलशकी ॥ नंददास प्रभुसों ऐसी प्रीति गाढी बाढ़ी फैलपरी चायन सरस की ॥२॥
Adano
Aeye gwal mandali jore raaje kardambakhandi
NityaPad-217
ए ग्वाल मंडली जोर राजे कर्दंबखंडी मधि दुपहरीकी बिरियां बटतररावटी रची बनाय उसीरकी ॥ खटरस व्यंजन अद्भुत मनरंजन पठये नंदरनी आपडलाधरे सीस आवतकल किंकनी मंजीरकी ॥ १ ॥ सींचेप्यासे खसखानेत्रिविध समीर बहत अतर गुलाबसींचे चंदनके पंक रपटी करकी ॥ छुटतफुहारेफूंही कुसुमन बनमाल गुंही जेंवत घनस्थाम सुंदर धोंधी करत बींजनाकरके समीर की ॥१॥
Saarang
Phool key singar phoolan kii saaree paihare tunn ..
Part3-036
फूल के सिंगार फूलन की सारी पैहरे तन ॥ फूलन की कंचुकी फूलन की ओढनी, अंग अंग फूले ललना कै मन ॥ ९॥ फूलन के नवकेसरि फूलन की माला फूलन के आभरन केस गूँथे फूलन घन ॥ फूलन के हाव भाव फूलन के चोज चाउ बिबिधि बरन फूल्यों ब्रिंदाबन ॥२॥ श्रीगिरिधारि पिय के फूल नाहीं कोऊ समतूल गाबति बसंत राम मिलि जुवति जन ॥ 'कृष्णदास” बलिहारी छिनु छिनु रखवारी अखिल लोक जुबति राधिका प्रान पतिन ॥३॥
Aaj raghupati chadhe lunk gadh lainakon .. avani chanchal bhaee shesh
Part1-302
आज रघुपति चढ़े लंक गढ़ लैनकों ॥ अवनि चंचल भई शेष सुधि बुधि गईं कमठकी पीठ फट मिल गई रैनकों ॥१॥ होत अंदोल सागर सप्त दिगपाल भये भयभीत अति उड़ि चले गैनकों ॥ कहत मंदोदरी सुनहूँ दशकंध पिय लै मिलौ सीय राजीवदलनैनकों ॥२॥ वे तौ जगदीश को ईशकौ बल कहा एक बनचर आय जारि गयौ ऐनकों ॥ हरिनारायन श्यामदास के प्रभुसों बैर कर कंथ पावै न सुख चैनकों ॥३॥
Maru
Jugal russ bharey bhojan karat kunj mein
NityaPad-215
जुगल रस भरे भोजन करत कुंज में तरनि तनया तीर अति सुहायो । लेत झुक झुक कोर झपटि दोऊ हाथ तें बोहों भांति मन करत लायो॥१२॥ करत मनुहार बहु भांति मिलि सुंदरी लीजिये लाल बहुविध बनायो। दीजिये कृपा करि रसिक के दास को शेष यह परम फल मुनिन गायो ॥२॥
Saarang
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