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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Maano batlalju merrie .. karo bhojan raar bhoolo houn matju | NityaPad-028 | मानो बातलालजू मेरी ।। करो भोजन रार भूलो हों मातजू
तेरी ॥१॥ दह्ों माखन दूधे मेवा परोस राखी थारी ॥ करो भोजन लाल मेरे
जाऊंहों बलहारी ॥ २॥। गोद बेठोहों जिमाऊं गाऊं तेरे गीत ।। खेलिवेकों तोहि
बोलत ग्वाल तेरे मीत ॥ ३॥। कहो ताहिं बुलाउं बैठे तेरे पास ॥ करोहों दधिमथन
उदयो सूरकमलप्रकाश ॥।४॥ मायके सुन वचन मोहन व िहँस प्रेम गोपाल ॥
कियो भोजनदियो अतिसुख रसिक नयन विशाल ॥५॥। | Bibhaas |
Kaanh ataa chadhi chung udabat houn apune aangan huu tey | Part2-240 | कान्ह अटा चढि चंग उडाबत हों अपुने आंगन हू ते
हेरो। लोचन चार भये नंदनंदन काम कटाक्ष भयो भटु मेरो ॥१ ॥
कितो रही समुझाय सखी री हटकर न मानत बहुतेरो।
“नन्ददास' प्रभु अब थोंमिले हैं एंचत डोर किथों मन मेरो ॥२ ॥ | Adano |
Phoolanaki mandali manohar baithe jahaan rasik piya pyaari. | NityaPad-256 | फूलनकी मंडली मनोहर बैठे जहां रसिक पिय प्यारी।
शोभित सव्वे साज़ नानाविधि फूलनको भवन परम रुचिकारी ॥ १॥| फूलनके
खंभ फूलनकी चोखंडी फूलनबनी सुदेश तिबारी॥ फूलनके झूमका झरोखा
फूलनके छाजे छबिभारी।।२॥ सघन फूल चहुंओर कंगूरा फूलन बंदन वार
संबारी॥ फूलनके कलशा अति शोभित फूलन रची विचित्र चित्रसारी॥।३॥
फूलनकी सेज गेंदुवा तकीया फूलनकी माला मनहारी | चतुर्भुजदास प्रफुल्लित
राधा संग फूले गोवर्धनधारी ॥४॥ | Saarang |
Khel faag phool baithe jhulat doll dahadahe naagar nayan | Part3-365 | खेल फाग फूल बैठे झुलत डोल डहडहे नागर नयन
कमल ॥ बहुत दिननके भये हें श्रमित सुख सखी संग लीने राधाकृष्ण
रस रास जबल ॥१॥ गावत राग राणिणी सों मिल कंठ सरस कोकिलाहूतें
अमल ॥ कल्याण के प्रभु गिरिधर रीझ झोटा देत हीये हरख गोरे गा त
छूटे छबि सों धवल ॥२॥ | Nat |
Maadhau juu tanaksau badan tanakse charan tanak curran parr | Part1-152 | माधौ जू तनकसौ बदन तनकसे चरन तनक करन पर
तनकसी माखन । तनकसे अधर तनकसी दतियाँ तनक हँसन हरि लेत सबन
मन ॥१॥ तनकसे कपोल तनकसी भूकुटी तनकसे बसन तनकसे आभरना
तनकही तनक सूर प्रभु रिंगत तनक कृपा कीजै राखो शरन ॥२॥ | Bilawal |
Aalee ree manini mangarh curr leeyen rahat taaki oat .. nain | Part1-318 | आली री मानिनी मानगढ़ कर लीयें रहत ताकी ओट ॥ नैन
बंदूक तामें सकुच दारू भरें बोल गोला चलाबत झक झोट ॥१॥ भौंह धनुष
तामें अंजन पनछ दीने बरूनी मारें बान तिरछी हैं चोट ॥ संधि लागि धाये नंददास
प्रभु छूल्यौ हठ तूल्यों है री कामकोट ॥२॥ | Saarang |
Janani jagawat utho kananhaaee .. prakatyo tarani kiran gann | NityaPad-020 | जननी जगावत उठो कनन््हाई ॥ प्रकट्यो तरणि किरण गण
छाई।॥१॥ आवो चंद्र बदन दिखराई ॥ वारबार जननी बलजाई ।। २॥। सखा द्वार
सब तुमहि बुलावत ॥ तुम कारण हम द्वारे आवत ।।३॥ सूरस्थाम उठ दरशन
दीन्हो ॥ माता देख मुदित मन कीन्हो ॥४॥ | Bhairav |
Haye banamen raas rachyaun banbari .. | Pustak1-356 | हे बनमें रास रच्यौं बनबारी ॥
यमुनापुलिन मल्लिका फूली शरदरैन उजियारी ॥१॥
मंडल बीच एयामघन सुंदर राजत गोप कुमारी ॥
प्रकटत कला अनेक रूप तिहिं अवसर लाल बिहारी ॥२॥
शीश मुकुट कुंडल की झलकन अलक बनी घुँघरारी ॥
कंबु कंठ ग्रीवा की डोलन छीन लंक लैहै कारी ॥३॥
धायधाय झपटत उर लपटत उरप तिरप गति न्यारी ॥
नृत्यत हँसत मयूर मंडली लागत शोभा भारी ॥४॥
बेणुनाद ध्वनि सुन सुरनर मुनि तनकी दशा बिसारी॥
श्रीविद्डललगिरिधरनलाल की बानिक पर बलिहारी ॥५॥ | Bihaagro |
Inturia daar dey ray lunger dheeth kanhai .. terau kouu kahaa karaigo | Part1-244 | इंटुरिया डार दे रे लंगर ढीठ कन्हाई ॥ तेरौ कोऊ कहा करैगो
हमें घर खीजेंगी माई ॥१॥ कौन हवाल कियौ हरि मेसे भल्ती करी मेरी दथि
खाई ॥ चतुर्भुज प्रभु गिरिधरन चाह तुम मेरी मन लियो है चुराई ॥२॥ | Saarang |
Bunn tein aavat sthaam gandani key paachhain mukut maathe dharein, | NityaPad-284 | बन तें आवत स्थाम गांडनि के पाछैं मुकुट माथे धरें,
खोरि चंदन करें, वनमाल गरें, भेषु नटवर काछें ॥
करत मुरली-नाद मोहत अखिल विश्व, धरत धरनी चरन मंद-मंद पाछेँ ।
छीत स्वामी नवल लालगिरिवरधर-रूप देखि मोहित सब ब्रज की बाल, गोप - वधू बाछें ॥ | Gori |
Mohan praat hii khelati horry .. chova, chandan, | Part3-077 | मोहन प्रात हि खेलति होरी ॥ चोवा, चंदन,
क'ुँमकुमा, केसरि, अबीर, लिऐं भरे झोरी ॥१॥ कंचन की पिचकाई भरि
भरि छिरकीं सकल किसोरी ॥ मुख माँडति गारी दे भाँडति, गद्गि राखति
बर जोरी ॥२॥ बाजत ताल मृदंग अधौटी बिच मुरली थुनि थोरी ॥ 'छीत
स्वामि! गिरिधर सँग क्रिड़ति यह बिघधि सब मिलि गोरी ॥३॥ | Bhairav |
Lalke vadanpar aarti vaaruun.. | NityaPad-313 | लालके वदनपर आरती वारूँ॥
चारु चितवन करों साज नीकी युक््ति वाती अगणित घृत कपूरकी बारूं ॥।१॥
संखधुनी भेरी मृदंग झालर झांझताल घंटावाजे बहुत विस्तारूं ॥
गाऊं गुन स्थामस्थामा रसनको स्वाद रसपरम हरखत चमर करडारूँ ॥ २॥।
कोटि उद्योत रविकांति अंगअंग छबि सकल भूलोकको तिमिर टारूँ॥|
दासकुंभन पिय लालगिरिधरनको रूपदेख नयन भर भर निहारूँ ॥।३॥ | Iman |
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