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Sheetkal Ke Pad
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Kirtan Title | Page | Kirtan | Raag |
|---|---|---|---|
Aaye surat rung rasamaate .. maanon vishram nimit piya | Part2-346 | आये सुरत रंग रसमाते ॥ मानों विश्राम निमित पिय
पाये श्रमित भरे हो ताते ॥१ ॥ डगमगात मग धरत परत पण उठतम बेगि
तहाँ तें॥ मानों गज भमत्त चरन चंकारि करि गहि आनत तिहि ठांते ॥२॥
उर नख छत्त कंकन छत्त पाछें सोभित है पहिराते ॥ मदन सूभट के बान
लाग मानों निकसि गये इहि घातें ॥३ ॥ साँचे करत आपने बोलनि टरत न
मरजादा तें॥ 'सूर स्थाम' कहि गये आई है पग धारे तिहि नातें ॥४ ॥ | Suha |
Podhe rangmahal vrajnath .. rung raski karat batiyaan radhika leey | NityaPad-130 | पोढे रंगमहल ब्रजनाथ ॥ रंग रसकी करत बतियां राधिका ले
साथ ॥१॥ दोउ ओढ रजाई क्रीडत ग्रीवा भुजभर बाथ॥ परमानंदप्रभु कामआतुर
मदन कियो सनाथ ।।२॥ | Kedaro |
Radha pyaari thu atrang bharee .. merrie zaan millie mohan sou anchal | NityaPad-141 | राधा प्यारी तु अतरंग भरी ॥ मेरी जान मिली मोहन सो अंचल
पीक परी ॥१॥ छुटी लट टुटी नकबेसर मोतिनकी दुलरी ॥ हो जानत जोलो
फोज मदनकी जीत लई सग री ।।२॥| अरुन अधर मुख सघ्वास निकासत गलीत
ललीत कवरी ॥ सूरदास प्रभु नगधरके संग सुरत समुद्र तरी ॥३॥ | Bhairav |
Namo namo shribhagavat puraan mahatimir agyaanbadhyo jaba prakatbhaye jug adbhutbhan ..1.. | NityaPad-354 | नमो नमो श्रीभागवत पुराण महातिमिर अज्ञानबढ्यो जब प्रकटभये जग अद्भुतभान ॥१॥
उदित सुभग श्रीशुक उदयाचल छिपे ग्रंथ उड्डुगण नसमान ॥
जागे जीव निशिसोये अविद्या कीयो प्रकाश विमल विद्यान ॥२॥
फूले अंबुज वकक््ताश्रोताहिमकर मंदमदन अभिमान ॥
छूटगये कर्मनके बंधन मिट्यो मोह सूझे सुस्थान ॥३॥
दरस्थों भक्तिपंथ अनुरागी सूझे शब्द स्वरूप निदान॥।
देखत नहीं उलूक सकामी यद्यपि दिनकर हैं विद्यमान ॥४॥
राजत एक महा सर्वोपर बढ्यो प्रताप और न समान ॥
दामोदर हित सुरमुनि बंदित जयजय जय श्रीकृपानिधान ॥५॥ | Bihaag |
Tum binn khenl naan ruche lagaar sunder yaar hoe | Part3-326 | तुम बिन खेंल न रुचे लगार सुन्दर यार हो
तुम हो सुघर खिलवार ।| नारी सब मिल गावत आवत पिचकारीन की
मार ॥१॥ द्वार द्वार फजुवा के कारण रोक रहन ब्रजनार ॥ अंतर्यामी
आनंददाता सुरप्रभु नंदकुमार ॥२॥। | Nayaki |
Srivitthalnathjuke charansharan ..| | NityaPad-006 | श्रीविद्डलनाथजूके चरणशरणं ॥|
श्रीवल्लभनंदनं कलिदु:खखंडनं पूरणपुरुषोत्तमं त्रयतापहरणं ॥१॥
सकलदु:खदारणं भवसिंधु- तारणं जनहितलीलादेहधरणं ॥
कान्हरदासप्रभु॒ सबसुखसागरं भूतलदृढभक्तिप्रकटकरणं ॥।२॥ | Bhairav |
Mohan dekh siraane nayana .. | NityaPad-289 | मोहन देख सिराने नयना ॥
रजनी मुख आवत सुरभिनसंग मधुर बजावत वेना ॥१॥
ग्वालमंडली मध्यविराजत सुंदरताको ऐना ॥
आसकरण प्रभु मोहननागर वारूंकोटि छबिमैना ॥२॥ | Hameer |
Khelat giridhar piya sanga horry .. huns-sutaa tata | Part3-272 | खेलत गिरिधर पिय सँग होरी ॥ हंस-सुता तट
सघन कुंज मधि, मिलि आँई ब्रज गोरी ॥१॥ राजतस नव ब्रजराज कुंवर
बर, सँग नव वृषभानु किसोरी ॥| आलस बलित कटाच्छन चितवत, सकुचि
हँसत मुख मोरी ॥|२॥ सहचरि गुन गावत प्रफुलित मन, निररितर निरस्त
छबि ओरी ॥ कबह्|ुँक विहँसि सबै मिलि बोलत, हो हो हो हो होरी ॥३॥
ताल मृदँग मुख चंग बजावत, औ बीना धुनि थोरी ॥ उपजत रंग कहत
नहिं आवत, नाँचति उमँँगि किसोरी ॥४॥ केसर मृग-मद, मलय, अरणजा
घसि भाजन भरि घोरी ॥ अबीर जुलाल बंदन औ बूका साजि धरो तिंहिं
ठोरी ॥५॥ प्यारी अपने कर सौंधी लै पिय अँग लावत बौरी ॥ अरगजा,
बागो, छिरकि सँवारति, सिथिल पाग ढरकौंरी ॥६॥ केसर रंग चित्रता
उपर, सहित गुलाल करचोरी ॥ चित्र कपोलन करि हैँंसि बीरी देति लेति
मुख जोरी ॥७॥ बूका, बंदन आई सन््मुख न्है उड़वति भरि भरि झोरी ॥
ता धुंधरि मधि पिय लखि औसर भाँमिनि लई भरि कौरी ॥८॥ रीझि परसपर
श्रीमुख्त विकसत, अंतर भाव बढ्यौंरी || सखी वृंद रस जुगल विलोकत,
विवस भई मति भोरी ॥९॥ जात नाहीं बरन्यों ता छिंनु मधि जो रस सबनि
लझ्ो री ॥ श्री बल्लभ श्रीविद्टल पद बल रसना कछूक कह्यौँ री ॥१०॥ | Nat |
Piyapyari kunjamahalmein podhe .. | NityaPad-339 | पियप्यारी कुंजमहलमें पोढे ॥
अंगसों अंगमिलाय परस्पर अलकें छुटी मौढें ॥१॥॥
कोककला रसरीत प्रवीणअति एकेकतें दोढे ॥
सूर सुरतसंग्राम जीत दोऊ पीत पिछोरी ओढे ॥ २॥ | Kedaro |
Hoe hoe horry khele nandako navarangi laalaa .. | Part3-138 | हो हो होरी खेले नंदको नवरंगी लाला ॥
अबीर भरिभरि झोरीहाथन पिचका रंगन बोरी तेसीये रंगीली ब्रजकी बाला ॥ १॥
मूरति धरें अनंग गावत तान तरंग ताल मृदंग मिलि बजावे बीनाबेनु रसाला ॥
नंदद ास प्रभु प्यारीके खेलत रंग रहो छबि बाढी छूटीडे अलक टूटीहे माला ॥२॥ | Todi |
Saurabh madhvi saras suhai... | NityaPad-258 | सौरभ माधवी सरस सुहाई।॥
फूलनके फोंदा रचि गूंथें फूलनकी मालाजु बनाई ॥ १ ॥ फूलनके कंकण बाजूबंध
फूलनकी चोकी ढरकाई ४ फूले रहत सदा मंडल में फूली सखा राधा ढिंग
आई ॥२॥ हँस हँस कहत लाल गिरिधरसों फूलनकी मंडलीजु बनाई ॥ चतुर्भुज
प्रभु गिरिधरनलालकी- अंगअंग छबि वरणी न जाई ॥३॥ | Saarang |
Rooshi kai khelati mohan radha horry .. ita hii | Part3-343 | रूषि कै खेलति मोहन राधा होरी ॥ इत हि
गोपिका बनि-बनि आँई उत ग्वाल मंडली चाँचरि जोरी ॥१॥ पिय प्यारी
पै प्यारी पिय पै डारति अबीर गुलाल की झोरी ॥ 'कृष्णदास” बलि जाई
जुगल पै स्यामा स्याम की बनी हैं जोरी ॥२॥ | Kedaro |
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