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Sheetkal Ke Pad

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Kirtan Title
Page
Kirtan
Raag
Jup tapa teerath name dharam vrat .
NityaPad-003
जप तप तीरथ नेम धरम व्रत । मेरे श्रीवललभ प्रभुजी को नाम । साधन तज भज आठों जाम ॥१॥ रसना यही रटौं निसवासर । दुरित' कटें सुधरें सब काम ॥२॥| आंगन बसों जसोदासुत पद । लीलासहित सकल सुखधाम | रसिकन ये निरधार कियो है।
Bhairav
Gaauun srivallabh dhyaaun srivallabh valalbhacharanraj tunn lapataaun..
NityaPad-003
गाऊं श्रीवल्लभ ध्याऊं श्रीवललभ वललभचरणरज तन लपटाऊं॥ बललभसंतति नित्यप्रति निरखूं वललभदासन दास कहाऊं ।।१॥ कृष्णलीला सेवा नित्य करके जगत सबे तृणतुल्य धराऊं।॥। व्यासदासकी यही प्रतिज्ञा श्रीगोविंदकृपातें पाऊं ॥२॥
Bhairav
Leho kanhaiya yashumati maiya tumko chhaak pathaai ..
NityaPad-200
लेहो कन्हैया यशुमति मैया तुमको छाक पठाई ॥ व्यंजन मीठे खाटे खारे दधि ओदन लेधाई ॥। १॥ गूँजा लडडुबा उज्बलफेनी मेवा अमृत मिठाई ॥। ओटयो दूध सद्य धोरीको तामें बहुत मलाई ॥२॥ बेसनके व्यंजन बहुतेरे जो तिहारेचित भाई ॥ जोर मंडली भोजन कीजे हषीकेश बलजाई ॥। ३॥।
Saarang
Raniju dhanya janam haye aaj .. dhota bhayau sunatahi savanan
Part1-008
रानीजू धन्य जनम है आज ॥ ढोटा भयौ सुनतही सवनन फूलि गये ब्रजराज ॥१॥ धनि धनि गोप ग्वाल धनि गोकुल धन्य सकल व्रजनारी ॥ पूरी मन कामना हमारी सुंदर बदन निहारी ॥२॥ ऐसी कोऊ करै नहिं रानी तुम बिनु पूरन बात । श्री विहलगिरिधरनलाल मुख सबकोऊ देखि सिहात ॥३॥
Devgandhar
Way dekho barat jharokan deepak hari podhe oonchi chitrasari ..
Part2-065
वे देखो बरत झरोकन दीपक हरि पोढे ऊँची चित्रसारी ॥ सुंदरवदन निहारन कारण राख्योहैे बहुत यतन कर प्यारी ॥१ ॥ कंठलगाय भुजदे सिरहाने अधर अमृत पीवत सुकुमारी ॥ तनमन मिलिरी प्राणप्यारेसों नौतन छबि बाढी अतिभारी ॥२ । "कु भनदास ; दंपति सौभगसीमा जोरी भली बनी एकसारी ॥ नवनागरी राधे नवललाल श्रीगोवर्द्धनधारी ॥३ ॥
Bihag
Rahasi ghar samdhin aaee .. aeye sub sajanan
Part3-100
रहसि घर समधिन आई ॥ ए सब सजनन के मनभाई ॥ध्रु०॥ समधिनसों समधोरो कीजे कीरति यह मन आई ॥ नंद गामते महरि जसोदा समधिन न्‍्योति बुलाई ॥१॥ समधिन आई सब मन भाई निस समधी संग खेली ।| खोलि हुलास आय ढिंग बेठी मोहोरन कीसी थेली ॥२॥ अति सुरंग सारी समधिनकी लडेंगा अतिही सुढार ॥ फाटि रही सगरी समधिन की चोली जोबनभार ॥३॥ समधिनकों हाथी को भावे आछो नीको पूरो ॥ रंग रंगीलो ओर चटकीलो हाथ भरे को चूरो ॥७॥ समधिन तो दीयोई चाहे खोलि डवाकी गांठि ॥| अपने समधिनके नेगिनकों हीरा पन्ना वांठि ॥५॥ समधिन कीहे गली सांकरी समधि आवन जोग ॥| आधो बाहिर आधो भीतर बहोत बराती लोग ॥६॥| समधिनकें मेल्यो ही चाहे गलफूलन को हार ॥ काढन कहे समधिन समथीसों डोलाकेजुकहार ॥७॥ यह लीला सुरनर मुनि गाई देखत रहे लुभ्याय ॥ चिरजीवो दुलहे ओर दुलह्दिन सूरदास बलिजाय ॥८॥
Dhanashri
Vandu charan saroj tihaare .. shyam shriang kamaldal lochan
Part1-084
वंदु चरण सरोज तिहारे ॥ श्याम श्रीअंग कमलदल लोचन ललित त्रिभंगी प्राणपति प्यारे । जे पद पद्म सदाशिवको धन सिंधुसुता उरते नहिं टारे ॥ जे पद पद्म परसि जल पावन सुरसरी दरस कटत अघ भारे। जे पद पद्म परसि ऋषिपत्नि नुग ओर व्याध पतित बहु तारे। जे पद पद्म तात रिपु चरासत मन बच कर्म प्रहलाद सम्हारे । जे पद पद्म रमित वृंदावव अगनित प्रबल मल्‍्ल बहु मारे। जे पद पंद्म रसिक व्रज युवति सुतपत्ति तन मन धाम बिसारे । जे पद पद्म भ्रमति पांडव दल सारथी द्वै सब काज सुधारे | सूरदास तेई पद पंकज त्रिविध तापके हरन हमारे ॥
Kanharo
Goras bechan gaee bikani houn hii | chhuti gaee laaj saaj
Part1-222
गोरस बेचन गई बिकानी हों ही | छुटि गई लाज साज नंदलाल गहि ठाढ़ी चित॒वत सोंहि ॥१॥ सनमुखते ऊँचे सखी इत उत्त नेकु न नैना होंही । वर्यदास गिरिधर बस कीने वह छवि मुरि मुसक्योंही ॥२॥
Devgandhaar
Horry khelat kunj bihaari .. sanga liye kesar
Part3-322
होरी खेलत कुंज बिहारी ॥ संग लिये केसर कुंकुम भर पिय पर प्यारी डारी ॥१॥ चोबा चंदन अगर अरगजा चरचित ब्रज की नारी ॥ तक तक छिरकत मोहन कों किलक देत करतारी ॥२॥ मदन गोपाल गहे श्रीराधा हम हि देहु फगुवारी ॥ श्रीमिरिधर लाल दियो तहां सर्वस्व रामदास बलहारी ॥३॥
Kalyan
Radha rasik kunj vihaari .. khelein faag sub
Part3-305
राधा रसिक कुंज विहारी ॥ खेलें फाग सब युवतीजन कहें हो हो होरी ॥१॥ भरत परस्पर काहूको काहून सुध एसें केसें मनहरत मोहन जोरी ॥ करसों करही जोर कर कटिसो कटिटहां नारी नृत्यत कान काह्ू न सुध थोरी ॥२॥ हरिदासके स्वामीस्यामा कुंजबिहारी फिरत न्यारी न्‍्यारी॥ सब सखियनकी दृष्टि बचावत तमकत तब थोरी ॥३॥
Gouri
Douu navallal khelati basant ..| anandkand
Part3-061
दोऊ नवललाल खेलति बसंत ॥| आनंदकंद गिरिधरन चंद ॥भ्रु०॥ नवल कुंज द्रुम नवल मोर || नवल कुसुम सम मधुप सोर ॥१॥ नव लीलाँबर नवल पीतपट नवल नवल अधर मुख बीरी दंत ॥ नवरस केसरि नवल अरगजा नवल गुलाल अबीर उडंत ॥२॥ नवल गुपाल नवल ब्रज जुवबती नवल परस्पर सुख अनंत ॥ “चत्रभुजदास' दरस दृगलोभी नवल रूप गिरिधरनचंद ॥३॥
Basant
Gopkunwar liye sanga horry khele vrajnayak
Part3-172
गोपकुंवर लिये संग होरी खेले ब्रजनायक होरी ॥ इत ब्रज जुवतिजूथ मधि नायिका श्रीवृषभान किसोरी ॥१॥ मोहन संग डफ दुंदुभि सहनाई सरस धुनिजु बाजे ॥ बीच-बीच जुवति मनमोहन महुबरि मुरली राजे ॥२॥ संग स्याम मुदंग आवज झालर झांझ बजावे ॥ किननरी बीना आदि बाजे साजें मिनत न आवबे ॥|३॥ इत्त ब्रजयुवति लिये कर राजें रतन खचित पिचकाई ॥| उन करकमल कुसुम नवलासी जाबत गारी सुहाई ॥४॥ तब मनमोहन जुवतिजूथ पर विविध रंग बरखाये ॥ अति सुख सोंज फागकी लीने नव घन उनये आये ॥५॥ ललिता चन्द्रावलि मतो कर सुबल सने दे लीनो || छलबल करि गिरिधर गहिबेको यह जु मतो मन कीनो ॥६॥ सखा भेद गिरिधर ही पाये भयो जुबति मन-भायो॥ आंख आंजी जुंथी जु बेनी मृगनेनी भेख बनायो ॥७॥ फग॒ुवाके गहने मनमोहन मोतिनमाल उत्तारी ॥ बंसी झटक लई झुक प्यारी अधरन विलसनहारी ॥८॥ दीने छाँड आप भायो करि स्याम सखन में आये ॥ तब मोहन सरवर करिवेको बलदाऊ पकराये ||९॥ तब हलधर बस जुवतिनके जु केसर कलस नवाये जोड़ जोइ विधि अपनी जाके जिय तिहि तिहि भाँति नचाये ॥१०॥ कीनो बीच सुबल श्रीदामा दाऊ आन छुडाये ॥ फगणुवा देन कह्मो मनभायो ब्रजपति टेर सुनाये ॥११॥ तब ब्रजराज बसन भूषन लिये जुबतिजूथ ढिंग आये ॥ अति आनंदबदन हरख तब दिये वसन मनभाये ॥१२॥ देत असीस सकल ब्रज॒सुंदरी रसना नहीं लखी कोरी ॥ चिरजीयो मदन मोहन पिय श्यामा गौर स्याम सम जोरी ॥१३॥
Dhanashri
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